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इंदौर. शिक्षण सत्र 2008-09 स्कूली छात्रों के लिए शुरुआत से ही बिगड़ा हुआ रहा। पहले बच्चों को किताबें नहीं मिलीं, बाद में शिक्षक प्रशिक्षण और शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में लगे रहे। इसके बाद बारी आई विधानसभा चुनाव की। इन सबसे सरकारी स्कूलों में जिस तरह शिक्षण कार्य प्रभावित हुआ है, उससे साफ है इस साल इसका प्रभाव सीधे परिणामों पर नजर आएगा, खासकर बोर्ड परीक्षाओं पर।
चुनावी ड्यूटी और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन में उलझे शिक्षकों की मुसीबत यह है कि उन्हें किसी भी तरह कोर्स पूरा करना है वहीं प्राचार्यो पर दबाव है कि स्कूल का परिणाम न केवल अच्छा रहे बल्कि पिछले साल की तुलना में बढ़े भी। इस सबके बीच छात्र-छात्रा रोज स्कूल पहुंचे भी पर उन्हें पढ़ाने के लिए या तो उनके शिक्षक मौजूद नहीं थे या फिर आधा पाठ किसी एक ने पढ़ाया तो आधा दूसरे ने। इस स्थिति से परेशान न केवल विद्यार्थी हैं बल्कि शिक्षक, प्राचार्य और अधिकारी भी स्वीकारते हैं कि विपरीत प्रभाव तो होगा।