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मूल्य मंत्र. आज के दौर में सफलता अर्जित करने के लिए यही सिखाया जाता है कि अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए जब जिससे जैसा व्यवहार करना हो किया जाए और आगे बढ़ा जाए। शत्रुता और मित्रता के मामले में अध्यात्म एक अलग दृष्टि से विचार करने को कहता है। अध्यात्म भी मानता है कि दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती।
देश, काल और परिस्थिति मनुष्य को इनके प्रति बदलने पर मजबूर कर देती हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि कहती है शत्रु-मित्र भाव के मूल में क्या है यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है। आज का दोस्त कल दुश्मन हो सकता है और दुश्मन भविष्य का दोस्त बन सकता है। यह उलट-पलट जीवन की सहजता को समाप्त करती है।
सफलता का मजा उसे सहजता से पाने में है। राग-द्वेष एक-दूसरे का शीर्षासन है। जिस भी व्यक्ति को बोध हो जाता है वह यह जान जाता है कि मैं सिर्फ करने वाला हूं कराने वाला कोई और है। फिर किसी से भी राग और द्वेष क्यों रखा जाए? राग, द्वेष से परे की स्थिति पाने के लिए एक भीतरी प्रक्रिया से गुजरना होता है।
हम तय कर लें कि हमें जो भी करना है वह पूरी निष्ठा, ईमानदारी और सद्भाव से करना है। इससे यह होगा कि हमारी रुचि अपनी ही रेखा को बड़ी करने में रहेगी। हमारा सारा ध्यान अपनी विजय पर हो, हम जितना अपनी विजय पर केंद्रित हैं हम उतने ही सुनिश्चित हैं और दूसरे की पराजय उसी में समाहित है। दिक्कत तब होती है जब हम शत्रु मित्र भाव से अपनी सारी ऊर्जा दूसरे की पराजय में लगा देते हैं और अपनी विजय को भी खोने लगते हैं। आवेश, आक्रोश, द्वेष और शत्रुभाव से किसी को हराया जा सकता है, लेकिन किसी को जीतना होगा तो मूल्य कुछ और होंगे, हराना होगा तो दांव-पेंच कुछ और।
- लेखक जीवन प्रबंधन के गुरु हैं।