Breaking News 
bhaskar Web English


HomeVichaar Vichaar

ठोस कार्रवाई के लिए अब और विलंब उचित नहीं

मुंबई में चली लाइव टेलीविजन नौटंकी ने आतंकवाद से निपटने में देश की असफलता को त्रासदीपूर्ण तरीके से नाटकीय बना दिया। किसी भी आम देश, जो वैश्विक स्तर की चाह भी न रखता हो, उसमें भी वित्तीय केंद्र को लगातार हमलों के बावजूद अरक्षित छोड़ दिया जाए, यह समझ से परे है। भारत अपनी आबादी के संयोजन, आंतरिक सांप्रदायिक कमजोरियों और सीमाओं में सुराख के कारण आतंकवाद के लिहाज से असुरक्षित है।

इसके अलावा बैरी पड़ोसी भी है जो कश्मीर पर दावा जताने, भारत की इस्लामिक जगत के साथ संधियों को बाधित करने और इस धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए इसके खिलाफ द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजहबी कार्ड का इस्तेमाल करता रहता है। कश्मीरी मुसलमानों के साथ किए गए कथित अन्याय को फलस्तीनियों और इराकियों के साथ जोड़कर पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद के लिए उम्माह में व्यापक स्वीकार्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान के कश्मीर राग ने उसकी घरेलू अतिवादी महजबी ताकतों में भारत को लेकर शत्रुता के भाव को पोषित किया। ये ताकतें भारत में आतंकी ऑपरेशनों के लिए आदमी मुहैया कराती हैं। वे ऐसी मुख्य ताकतों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हिंदू भारत को दुश्मन के तौर पर देखती हैं।

हमें निशाना बनाने वाले आतंकवाद के मूल में अफगानिस्तान भी शामिल है। अफगानिस्तान से सोवियत रूस की सेनाओं को खदेड़ने के लिए अमेरिका द्वारा कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों की लामबंदी के फलस्वरूप कश्मीर में आतंकवाद का उदय हुआ। नॉदर्न एलायंस को हमारा शुरुआती समर्थन, अफगानिस्तान में हमारी बढ़ती मौजूदगी, करजई सरकार की बदनसीबी, पाकिस्तानी सहयोग के साथ तालिबान का पुनरुत्थान पाकिस्तान के कबीलाई इलाकों में बढ़ती अराजकता और अमेरिका के साथ हमारे सुधरते संबंधों ने हमारे लिए जिहादी खतरे को बढ़ा दिया। काबुल में हमारे दूतावास में धमाका करना इसकी जबरदस्त चेतावनी थी।

वैसे धार्मिक अतिवादियों की बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय हित को चुनावी चिंताओं से ऊपर रखा जाना चाहिए। हमें अपने कानूनों में संशोधन करने, ऐसे खतरों से निपटने के लिए केंद्रीय तंत्र बनाने और अपनी सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों को परिष्कृत, भौतिक व मानवीय संसाधनों से लैस करने की जरूरत है।

अमेरिका और बाकी देश अपनी सामरिक जरूरतों के चलते चाहते हैं कि हम पाकिस्तान के साथ अपने मतभेद सुलझा लें। यह दबाव मुंबई के बाद और बढ़ेगा। पाकिस्तान के साथ दोस्ती के तार्किक कारणों को पाकिस्तान में अलग नजरिए से देखा जाता है। हम यथास्थिति बनाए रखते हुए समाधान देखते हैं, जबकि पाकिस्तान इसे बदलना चाहता है। जहां हम अपने हित में पाकिस्तान में स्थिरता चाहते हैं, वहीं पाकिस्तान भारत को तोड़ना चाहता है। हमें पाकिस्तान की अपेक्षा शक्तिशाली देश बताते हुए उसे रियायत देने के उपदेश दिए जाते हैं। यदि ऐसा है तो फिर सफल अमेरिकी नीति में इसके तमाम विरोधियों को रियायतें दी जाना चाहिए।

मुंबई में हुआ आतंकी हमला हमारे लिए चेतावनी की आखिरी घंटी होना चाहिए। यह हमला भारत को नीचा दिखाने के इरादे से किया गया। इसका मकसद भारत की आर्थिक उन्नति को रोकने और इसे पाकिस्तान की तरह अस्त-व्यस्त हालत में लाने का था। ऐसे दुस्साहसी और पेशेवर ऑपरेशन के लिए काफी सतर्कतापूर्वक तैयारी की जरूरत होती है जो पाकिस्तान में एजेंसी की जानकारी के बिना तो कतई संभव नहीं हो सकता।

हमने पाकिस्तान को भी अपनी तरह आतंकवाद का शिकार बताकर गंभीर चूक की है। पाकिस्तान सरकार आतंकवादी हमलों में अपनी किसी भी तरह की भूमिका से इनकार करने के लिए इसी बात का सहारा ले रही है। पाक राष्ट्रपति के असामान्य ढंग से दिए गए मैत्रीपूर्ण वक्तव्यों का कोई मतलब तभी होगा जबकि इसकी सरकार भारत को निशाना बनाने वाले जिहादी संगठनों को खत्म कर दे, मुख्य वांछित अपराधियों को हमें सौंप दे और गंभीर खुफिया जानकारियों को साझा करे।

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ को बुलाने का हमारा प्रयास बताता है कि हमें अब भी आतंकवाद पर पाकिस्तान की सहभागिता का भरोसा है। दोस्तों की पीठ में छुरा भोंकने में माहिर देश अपने दुश्मनों के साथ भी ईमानदार नहीं रहेगा।

‘सबूत’ पर जोर देने संबंधी पाकिस्तान का हालिया वक्तव्य बताता है कि इसका रवैया बदलने वाला नहीं है। मुंबई में हुआ आतंकी हमला एक निर्णायक क्षण होना चाहिए। हमें अपनी राजनीति की दिशा-दशा फिर से तय करने, सर्वसम्मति बनाने, संस्थागत सुधार करने, कानूनों को सख्त बनाने, अपनी जीवनचर्या को सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से ढालने और सीमा पर नियंत्रण व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। बदलाव के इस एजेंडे के लिए लीडरशिप की जरूरत है। यह पाकिस्तान के साथ आमतौर पर होने वाला व्यवहार नहीं हो सकता, अन्यथा हमारे यहां ऐसे और भी आतंकी हमले हो सकते हैं।
-लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: