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संपादकीय. केंद्रीय गृहमंत्री दो साल पहले यह आशंका जता चुके थे कि आतंकवादी समुद्री सीमा का इस्तेमाल कर सकते हैं और मुंबई पर हमले के लिए वही रास्ता उन्होंने इस्तेमाल भी किया, लेकिन समुद्री सीमा की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद नहीं किया जा सका।
हजारों किलोमीटर लंबी हमारी समुद्री सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति यह है कि हमारे पास न तो समुद्र में गश्त के लिए आवश्यक गश्ती जहाज हैं और न विमान। ऐसे कानून बदस्तूर कायम हैं कि यदि जंग नहीं हो रही हो, तो समुद्र तट से बारह मील तक किसी मर्चेट जहाज को रोककर तलाशी लेने का अधिकार हमारे तटरक्षक बलों को नहीं है। उनके अधिकार इतने सीमित हैं कि शक के आधार पर यदि उन्होंने किसी मर्चेट शिप की तलाशी ली और उसे पांच-सात घंटे तक रुकना पड़ा तो वह कम-से कम पांच-दस करोड़ रुपए के नुकसान का दावा ठोंक देगा। तटरक्षक बल व नौसेना को तलाशी के अधिकार सिर्फ जंग के वक्त मिलते हैं, शांति काल में नहीं, जबकि मुंबई में आतंकी हमले शांति काल में हुए हैं।
अपनी सुरक्षा को लेकर चौकस तमाम देशों में बंदरगाहों की सुरक्षा की जिम्मेदारी नौसेना और तटरक्षक बलों के पास होती है, लेकिन हमारे यहां यह जिम्मेदारी बंदरगाह अथॉरिटी के पास है। इसलिए भारतीय नौसेना व तटरक्षक बल दुश्मन देश के समुद्री हमले से तो मुकाबला कर सकते हैं, लेकिन आतंकवादी हमले के समय कुछ नहीं कर सकते। जिस भारतीय समुद्री सीमा में हर रोज तीन लाख छोटे-बड़े जहाज और बोट्स आते-जाते हों और रात को ऐसा लगता हो मानो समुद्र में दीवाली है, वहां बेहतर और सटीक खुफिया तंत्र के बिना कैसे काम चल सकता है? दूसरा सवाल यह है कि हमारे तटरक्षक बल के पास जब सिर्फ पचीस फीसदी ही जरूरी संसाधन उपलब्ध हैं, तब उनसे कैसे बेहतर परिणाम की उम्मीद की जा सकती है?
हालांकि तीन साल पहले मैरीन पुलिस का गठन किया गया और इसके लिए जो 220 बोट इस साल तक आ जाना चाहिए थी, उनका अभी तक अता-पता नहीं है। महज 75 जहाज और 44 विमानों के बल पर विशाल समुद्री तटों की रक्षा कैसे की जा सकती है?
अमेरिका ने तो पेट्रियट कानून बनाकर अपने तटरक्षक बलों को इतना अधिकार दिया है कि वह समुद्र में दो सौ मील के घेरे में शक के आधार पर किसी भी जहाज की तलाशी ले सकते हैं या वापस लौटने को मजबूर कर सकते हैं, लेकिन हमारे यहां लंबे समय से मर्चेट जहाजों को रोकने व तलाशी लेने का अधिकार मांगा जा रहा है, जिस पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है। जब तक तलाशी के अधिकारों के साथ नौसेना और तटरक्षक बलों को पूरे संसाधन नहीं उपलब्ध कराए जाएंगे, तब तक समुद्री सीमा की सुरक्षा को पूरी तरह फूलप्रूफ बनाना मुमकिन नहीं है।