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दृष्टिकोण. प्रिय पाठको, इस आत्मतुष्टि के लिए मुझे क्षमा करें, लेकिन मैं यह लेख एक पेशेवर पत्रकार के साथ-साथ आक्रोशित और दु:खी भारतीय नागरिक व दक्षिण मुंबईकर की हैसियत से भी लिख रहा हूं। पिछले दिनों इस शहर (जहां मैंने अपनी युवावस्था का सुनहरा दौर गुजारा) को आतंकियों के हाथों तहस-नहस होते देख मेरा दिल चीत्कार कर उठा।
मैंने खुद को असहाय और छला हुआ महसूस किया, मानो किसी ने हमारी पुरानी शांत, सुरक्षित मुंबई की शुचिता भंग कर दी हो। हर आतंकी स्थल को देखकर पुरानी यादें ताजा हो उठीं, मृतकों की सूची में ऐसे नाम थे जिनके साथ मैं बड़ा हुआ। आतंक का दायरा फैलते हुए घर के बिलकुल करीब आ गया- मेरी मां कोलाबा में नरीमन हाउस से महज एक ब्लॉक दूर रहती हैं। यह ऐसा इलाका है जो इस महानगर में परंपरागत तौर पर सबसे सुरक्षित माना जाता है।
इन 72 खूनी घंटों के दौरान मानो स्मृतियों का पूरा संसार हिल गया। लियोपोल्ड कैफे जहां मैंने हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पहली बार बीयर पी थी। कोलाबा बाजार, जहां की संकरी गलियों में आपको शहर के बेहतरीन चिकन रोल्स व पैटीज मिल सकती हैं। मैट्रो जंक्शन, जहां आप नई फिल्म देखने के लिए कक्षा छोड़कर आते रहे हों। वीटी स्टेशन जहां से होकर आप रोज काम पर जाते हों। ओबेरॉय होटल, नरीमन प्वाइंट के परिदृश्य पर उभरने वाली शुरुआती गगनचुंबी इमारतों में से एक। और आखिरकार निस्संदेह रूप से ताज होटल।
ताज के बगैर मुंबई वैसी ही है, जैसे मुकुट बगैर कोई सम्राट। ताज का अनुभव सिर्फ अमीर और चर्चित लोगों तक ही नहीं है, यह मुंबई की शिष्ट, सार्वभौमिक पहचान का प्रतीक है, जो बेशक विशिष्टतावादी है, लेकिन इसमें एक सहजता झलकती है जो इस शहर के लिए बहुत कीमती है। 26/११ ने जीवन को खास ढंग से प्रभावित किया है। हर ग्रेनेड एक दूसरे दौर की मासूमियत को धमाके से उड़ा रहा था। इसमें जिन अपनों को खोया है, उन्हें कैसे भूल सकते हैं।
अशोक काम्टे, सेंट जेवियर्स में पढ़े ८५ के बैच के एक पुलिस अधिकारी जिनका जिस्म फौलाद का और दिल किसी बच्चे की तरह कोमल था। सुनील पारेख, एक सफल व्यवसायी, स्कूल में दो साल सीनियर, अपनी बीवी के साथ आतंकियों की गोली का निशाना बन गए, जब वे ओबेरॉय में डिनर ले रहे थे। हमेशा मुस्कराने वाली सबीना सहगल सैकिया, जिनके साथ मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया में काम करने का मौका मिला।
मैं अकेला नहीं हूं, इस पुरानी मुंबई से जुड़े ज्यादातर लोग इस आतंकी हमले से गहरे तक प्रभावित हुए हैं। साउथ मुंबई किसी लिहाज से ऐसी पनाहगाह थी जहां आप खुद को सुरक्षित महसूस करें, जहां ज्यादातर लोगों ने अब तक टीवी पर ही दूर किसी कोने में हुए आतंकी हमले को देखा था। अब अपने घर के बरामदे में बैठकर एनएसजी कमांडोज से हवाई रास्ते से उतरते देख और लगातार बंदूक से निकल रही गोलियों की आवाज सुनने के बाद आप इस सच्चई से मुंह नहीं मोड़ सकते कि आतंकवाद आपके घर तक आ गया। इसी वजह से 12 मार्च 1993 को हुए मुंबई में आतंकवादी हमले से 26/11 बिलकुल अलग है।
तब शहर के अलग-अलग हिस्सों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने हमें स्तब्ध और भयभीत कर दिया। तब हमें लगा कि शहर में आतंकवाद खास बस्तियों से निकलकर फूटा। हम दाऊद के बारे में तो जानते थे, लेकिन हमें यह नहीं पता था कि आरडीएक्स क्या बला है। हमने धमाकों को दंगों के प्रतिकार के रूप में देखा, हिंसा और प्रतिहिंसा का एक चक्र शुरू हो गया जिसके जल्द ही थमने की हम कामना करते थे। पंद्रह वर्ष के बाद बार-बार हमले के पश्चात बम धमाकों को अंजाम देने वाले आतताइयों ने खुद को 90 के शुरुआती दौर से बदलकर अब बेहद डरावने पिशाच के रूप में तब्दील कर लिया है। इक्कीसवीं सदी में इस घातक और आतताई शक्ति ने दिखा दिया है कि यह अपनी मर्जी से जब और जहां चाहे हमले कर सकती है और तथाकथित उभरता हुआ भारत कुछ नहीं कर सकता।
1993 में जब आरडीएक्स तटीय इलाकों पर उतरा था तो माना गया कि यह दुर्भाग्यजनक ढंग से सुरक्षा में चूक है। अब हम जानते हैं कि यह कोई भूल नहीं थी। निष्ठुर राजनेताओं, बेढंग नौकरशाहों और अशक्त पुलिस बल ने मिलकर ऐसा लचर और भ्रष्टाचार में लिप्त तंत्र बनाया है जो प्रशिक्षित और जबर्दस्त तरीके से प्रेरित आतंकवादियों से लोहा लेने में अक्षम है।
खुफिया तंत्र की विफलता किसी एक पार्टी या सरकार की बात नहीं है, यह तो पुराने ढंग से चली आ रही नौकरशाही का प्रतिरूप है जो अंतरराष्ट्रीय जिहादियों से निपटने के मामले में बिलकुल कारगर साबित नहीं होती। मिसाल के तौर पर आतंकी हमले के कई घंटों बाद राज्य सरकार को गृह मंत्रालय से एनएसजी कमांडो भेजने के लिए औपचारिक आग्रह करने की जरूरत क्यों पड़ती है? वह आपदा प्रबंधन कमेटी कहां है, जिसके तुरंत सक्रिय होने की जरूरत है? और आतंकवाद से संबंधित किसी केस की जांच-पड़ताल कर रहे अधिकारी से यह उम्मीद क्यों की जाती है कि वह सड़क पर जाकर एके-47 जैसे अत्याधुनिक हथियार से लैस आतंकवादियों से लोहा ले?
आज देश का हर नागरिक ये सवाल पूछ रहा है। मोमबत्तियां जलाने या एसएमएस की मुहिम जैसे प्रयास भले ही अप्रभावी लगें, लेकिन मीडिया के इस दौर में जागरूक नागरिकता की ताकत को कम करके नहीं आंक सकते। अब एक नया वोट बैंक तैयार है, आक्रोशित और स्पष्टवादी लोगों का वोट बैंक, जिसमें से कई भारत के सपनों को आगे ले जाने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। किसी भी राजनेता के लिए इस शहरी मतदाता को नजरअंदाज करना और सिर्फ ग्रामीण जनता पर निर्भर रहना असंभव है। 26/11 ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि भारत का उच्च-मध्यवर्ग अपनी सुविधा के खोल से बाहर निकले। आवाजों को सुना जा रहा है और गेटवे ऑफ इंडिया धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है। ताज के मलबे से होकर अब भारतीय कुलीन वर्ग आखिरकार परिपक्व हो जाए।
-लेखक आईबीएन नेटवर्क के प्रमुख संपादक हैं।