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चुनावी राजनीति में 24 घंटे बहुत लम्बा समय

समर शेष है. शोर थमते ही शुरू होता है जोर। वोटों को पाने के लिए। तोड़ने के लिए। जोड़ने के लिए। हमारे अगले पांच साल किसके जिम्मे होंगे, यह तय करने के लिए अब मात्र 24 घंटे बचे हैं। बहुत कम समय है यह। लेकिन राजनीति के लिए नहीं। खासकर चुनावी राजनीति के लिए तो यह बहुत लम्बा समय माना जाता है। सब कुछ बदल सकता है, इस एक दिन में। और बदलते रहे हैं राजनीतिज्ञ, वे जिनमें जुनून था।

इंदिरा गांधी की कभी न सोची जा सकने वाली हार के दो पहलू हैं- दोनों आखिरी 24 घंटे के। गांव के चौपाल पर बैठे बड़े-बुजुर्ग यह बतियाते सुने गए कि ‘बेचारा राजनारायण, कहां उस ताकतवर प्रधानमंत्री से लड़ रहा है, जिसने सारे देश को जेल में डाल दिया..।’ वहीं समझ में आ गया कि ‘बेचारा’ मानकर सहानुभूति का वोट और ‘जेल’ के जिक्र वाली नाराजगी का फायदा राजनारायण को मिलेगा।

उधर, इंदिरा गांधी ने अपनी हार का विश्लेषण महात्मा बुद्ध का किस्सा सुनाकर किया- जिसका निचोड़ संभवत: उसके बाद से कांग्रेस की चुनावी राजनीति का जैसे संविधान ही बन गया। बुद्ध एक गांव में गए जहां अकाल पड़ने से कुएं सूख गए थे। उन्होंने उपाय बताया कि रात को प्रत्येक परिवार एक लोटा दूध बाहरी कुएं में डाले। सुबह मुस्कराते बुद्ध सबको दिखा रहे थे- कोई भी दूध डालने नहीं पहुंचा। क्योंकि हरेक मानकर चल रहा था कि बुद्ध की बात कौन टाल सकता है? मैं दूध नहीं भी डालूंगा तो किसे पता चलेगा? इंदिरा ने कहा था कि कांग्रेस के हर कार्यकर्ता ने सोचा- आखिरी दिन मैं नहीं भी मेहनत करूंगा तो क्या हो जाएगा? ‘मेरे हर समर्थक, प्रशंसक और परिवार के परिवार कांग्रेसी वोटरों ने भी सोचा- हर कोई मुझे ही तो वोट डालेगा। गए ही नहीं वोट डालने।’

चुनाव में कितना भी लंबा समय प्रचार के लिए मिले- आखिरी 24 घंटे ही हार-जीत तय करते हैं। ताकि ऐनवक्त पर वे सेंधमारी कर सकें। उनसे बात कर सकें- जो वोटों को जुटाने में मदद करेंगे। उनसे ‘सौदे’ कर सकें- जो वोटों को बदलने में माहिर समझे जाते हों। उन्हें मना सकें जो रूठ गए हों। उन्हें डरा सकें जो किसी और के डर से डरे हुए हों। उन्हें समझा सकें जो उलझ गए हों। उन्हें खरीद सकें जो बिकने की बोली का इंतजार कर रहे हों- और उनके सामने बिछ जाएं, दंडवत हों और गिड़गिड़ा सकें- जो ऊपर सुझाए किसी तरह की श्रेणी में न आते हों।

हमें इस 24 घंटे की खतरनाक राजनीति से बचना है। हमें सालभर पढ़ाई कर परिश्रम से परीक्षा देने वालों और ऐनवक्त वन-डे सीरीज से पास होने की कोशिश वालों में अंतर करना है। क्योंकि हमारा वोट हमारा भविष्य है। लेकिन राजनीति का जुनून कुछ अलग ही है। सत्ता हाथ से फिसल कैसे जाए? सत्ता से बाहर आखिर कितने साल बैठें?

यह तो हुई सरकार की बात। अकेले प्रत्याशी के दांव इससे भी ऊंचे और अलग हैं। इसे स्थानीय सत्ता कहते हैं। दबदबा। ताकत। पैसा। ..और राजनीतिक कॅरिअर। और न जाने क्या-क्या! वैसे हर नेता भ्रष्ट नहीं होता, लेकिन हर नेता सत्ता होता है। विधानसभा के रमणीय, चित्ताकर्षक गलियारे, वो रुतबा, वो मजमा, वो अर्जियां लिए लोगों की भीड़, वो तबादलों की डिजायर, वो थानों पर पुलिस को उसकी और अपनी हैसियत दिखाने का मजा। हम शासित। वे शासक। इसलिए इन 24 घंटों को खूब संभालकर रखिएगा। ‘कम बुराई’ शब्द का ध्यान लगातार करना होगा।





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