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बुराइयों पर रचनाओं से किया कटाक्ष

जालंधर. यह जरूरी नहीं कि महिलाओं को पहचान बनाने के लिए कोई जॉब ही करनी पड़े। घर में बैठकर क्रिएटिव वर्क से भी वे समाज में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं। इसके अलावा समाज में फैली बुराइयों को खत्म करने में भी वे महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। यह कहना है लेखकों की कतार में अपनी पहचान बनाने के लिए कोशिश कर रही लेखिका जूही शर्मा का।

2005 से लेखन के क्षेत्र में योगदान दे रहीं जूही समाज में फैली बुराइयों खासकर कन्या भ्रूण हत्या पर अपनी रचनाओं के माध्यम से कटाक्ष करती रहती हैं। उन्हें यह शौक विरासत में मिला है, उनके दादा प्रीतम दत्त शास्त्री भी लेखक थे। इससे उनमें भी रचना का शौक पैदा हो गया। जूही ने एचएमवी से अपनी ग्रैजुएशन पूरी की है और अब वह डीएवी से एमए इंग्लिश कर रही हैं। जूही की कविताओं की पहली किताब इंग्लिश में ‘स्प्रैडिंग डिजायर्स’ भी प्रकाशित हो चुकी है। इस किताब को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्टूडैंट्स को रिसर्च वर्क के लिए रैफर किया गया है।

जूही शिव कुमार बटालवी की कलम से काफी प्रभावित हैं, जबकि इंग्लिश में वह राबर्ट फ्रास्ट की सोच को काफी पसंद करती हैं। उनकी अगली किताब पंजाबी में ‘उडारी सोचां दी’ जल्द ही प्रकाशित होने वाली है। उन्हें स्क्रिप्ट राइटिंग का भी शौक है। इसी वजह से उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित नाटक भी लिखा है, जिसका प्रसारण दूरदर्शन जालंधर से जल्दी होगा। वह आगरा और अंबाला में हुए तीसरे और चौथे इंटरनैशनल राइटर फैस्टिवल में अपनी रचनाएं पेश कर चुकी हैं।

आगरा में उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या पर नाटक भी पेश किया था। वह आगे चलकर एक सफल गीतकार बनना चाहती हैं। अपनी रचनाओं के बारे में वह कहती हैं कि उन्होंने हमेशा इनमें मानवीय पहलू को पेश किया है। वह औरतों की समस्याओं को उजागर कर उन्हें खुद इन समस्याओं से लड़ने के लिए प्रेरित करना चाहती हैं।

उनका मानना है कि औरतों को जो अधिकार दिए गए हैं, उनका सही तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए, जबकि कुछ इसका गलत प्रयोग भी करती हैं। उनका कहना है कि लाइफ में बैलेंस जरूरी है अगर औरत कहीं बाहर काम करती है तो उसे घर की जिम्मेदारी को भी उसी निष्ठा से निभाना चाहिए।





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