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मुंबई में हुए आतंकवादी हमले ने देश को गुस्से से भर दिया है। आतंकवादी आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से में जानलेवा वारदात कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि अब आतंकवाद के खिलाफ व्यापक और निर्णायक जंग छेड़ दी जानी चाहिए।
हर बार की ही तरह इस बार भी मुंबई हमले को चंद खानापूरी और कुछ इस्तीफे लेकर भुला नहीं दिया जाना चाहिए। मुंबई में हुए खौफनाक हमले के बाद ज्यादातर शहरों के लोग सहम गए हैं और अपने इर्दगिर्द खतरा महसूस करने लगे हैं। खुफिया चेतावनी के बाद भी हमला टालने के लिए सरकार के स्तर पर कोई कार्रवाई न किए जाने से भी लोगों में आक्रोश है और इसके लिए केंद्र और महाराष्ट्र के गृहमंत्रियों की छुट्टी किए जाने भर से उन्हें संतोष नहीं हुआ है।
भास्कर ने ओपिनियन पोल के जरिए जब लोगों का मन टटोला तो ये निष्कर्ष सामने आए। ‘आतंकवाद के खिलाफ उठाएं अपनी आवाज’ मुहिम के तहत हमने पाठकों से अहम बिंदुओं पर एसएमएस के जरिए उनकी राय मांगी थी जिसका हमें जबर्दस्त रेसपांस मिला।
खुद को सुरक्षित नहीं मानते
हमले को टाल पाने में सरकार और संस्थाओं की नाकामी ने लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। यह पूछे जाने पर क्या आप अपने शहर में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं, करीब 70 फीसदी लोगों का जवाब ना है। महज 15 प्रतिशत लोग मानते हैं कि उनके शहर को कोई खतरा नहीं है तो इतने ही लोगों को पता नहीं कि कल क्या होगा।
केंद्र और राज्य दोनों ही जिम्मेदार
जनता का आक्रोश आतंकवादियों के प्रति जितना है, सत्ता और नेताओं से उससे कम नहीं है। खतरे की घंटी बजने के बाद भी सभी हाथ पर हाथ धरे बैठे न रहते तो आतंकी वारदात से बचा जा सकता था। मुंबई में आतंकी हमले को रोकने में विफल रहने के लिए कौन जिम्मेदार है, इस सवाल के जवाब में करीब 60 फीसदी लोगों ने केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों को जिम्मेदार ठहराया है। जबकि 20 फीसदी लोग केंद्र और करीब इतने ही राज्य सरकार को हमला न रोक पाने के लिए जिम्मेदार मानते हैं।
इस्तीफे काफी नहीं
आतंकवाद से निपटने के लिए पुख्ता तंत्र की जरूरत भी लोगों को महसूस हो रही है और वे हर स्तर पर जवाबदेही की उम्मीद करते हैं। सरकारों के खिलाफ पैदा आक्रोश अभी ठंडा नहीं पड़ा है। करीब 95 फीसदी लोग मुंबई में आतंकी हमले की सजा के तौर पर केंद्र व महाराष्ट्र के गृहमंत्रियों का इस्तीफा काफी नहीं मानते हैं।
अब आर या पार
कभी जयपुर, कभी दिल्ली, कभी मुंबई. जनता चाहती है कि खूनखराबे का यह सिलसिला अब हमेशा के लिए बंद होना चाहिए। आतंकवादियों के खिलाफ अब सरकार को आर-पार की लड़ाई का बिगुल बजा देना चाहिए। 92 फीसदी ऐसी निर्णायक जंग की पैरवी करते हैं तो पांच फीसदी इसे ठीक नहीं मानते हैं।