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अहमदाबाद. देश में आतंकी हमलों और विस्फोटों की खबरों का लोगों के दिलो-दिमाग पर इतना गहरा असर हो रहा है कि उन्हें मनोचित्सिकों से इलाज कराना पड़ रही है। ‘पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर’ नामक बीमारी से पीड़ित होकर ऐसे लोग धमाके की आवाज सुनकर ही सिहर जाते हैं।
धमाके का अंदेशा और बीमारी: मीडिया ने आतंकियों का अगला निशाना अहमदाबाद होने को अंदेशा जताया, यहां के लोगों के मन में भय और सिहरन दौड़ गई। मुंबई की घटना के बाद ही यहां के विस्फोट प्रभावित लोगों में करीब 30 फीसदी को मनोचित्सिकों से उपचार कराना पड़ रह रहा है। दरअसल, उनके मन में इस बात से दहशत है कि क्या अहमदाबाद में फिर बम ब्लॉस्ट होंगे? ऐसे में हमारा क्या होगा? मनोचिकित्सक डॉ. हंसल भचेच के अनुसार, इन परिस्थितियों में लोग अक्सर ‘पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर’ बीमारी से पीड़ित हो जाते हैं।
लेकिन सभी इस बीमारी से पीड़ित नहीं होते। बकौल डा भचेच, अत्यधिक भावुक और ऐसे लोग जिन्हें घर में प्यार नहीं मिलता, उन पर इस तरह की घटनाएं ज्यादा असर डालती हैं। खासकर, यदि कोई व्यक्ति प्राकृतिक आपदा या विस्फोट आदि की घटना से प्रभावित हुआ हो और उस सदमें से उबर नहीं आ पाया हो तो मुंबई जैसी घटना उनके जख्मों को ताजा कर देती है। इस कारण उनके मस्तिष्क पर गंभीर असर होता है।
उन्होंने बताया कि ऐसे मरीजों में बेचैनी बढ़ जाती है, इससे कई लोगों में एंटी-एंजायटी पैदा होने लगती है। मनोचिकित्सकों द्वारा ऐसे लोगों की काउंसलिंग की जाती है। उन्हें योग, ध्यान और व्यायाम की सलाह दी जाती है।
‘जिन लोगों ने हाल ही में मुंबई की घटनाओं को लगातार टीवी पर देखा है, उनमें घबराहट, उदासी, निराशा और असुरक्षा के भाव पैदा हो गए हैं। यदि उनकी यह स्थिति अधिक समय तक रहे तो तत्काल उनका इलाज कराना चाहिए।’
-डा. धर्मेश पटेल, मनोचिकित्सक