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जिंदगी लिखकर उड़ गए प्राण

जयपुर. स्थान : मानसरोवर, मौका : सगाई समारोह का आमतौर पर गंभीर रहने वाले 73 वर्षीय लक्ष्मीचंद शर्मा बुधवार को और दिनों की तुलना में काफी अलग तरह से पेश आ रहे थे। अपने साले के बेटे की सगाई में पुत्र एडीजे महेन्द्र शर्मा के साथ आए शर्मा सभी छोटे-बड़ो से दिल्लगी और ठिठौली कर रहे थे।

कविता लेखन से उनका कोई ज्यादा वास्ता नहीं था, लेकिन इस सगाई समारोह में वे अपने सभी रिश्तेदारों पर कविता में अपने मनोभाव व्यक्त कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने अपने सुसराल पक्ष के प्रमुख लोगों के बारे में चार-चार पक्तियां लिखीं। उन्होंने वर-वधू को कुछ इस तरह आशीर्वाद दिया।

‘कंकन बंधन घोड़ी चढ़न, आज है अति हर्ष,
लूंठी लाग लगाम ल्यां, जीवै जोड़ी सौ बरस।’
उन्होंने शादी की तारीख और परिवार को स्पष्ट किया।
‘दो शून्य छ पांच नवमी, मृगसिर शुक्र रविवार,
विकास वैजयंती विवाह, वंश विष्णु विस्तार।’
उन्होंने अपने एक रिश्तेदार की सुंदरता का इस तरह वर्णन किया।
‘सुंदर मुखड़ा देख्या घणा, नहीं आपकी होड़,
ब्रrाजी फुरसत गढ़ी, ठाकुर आयो छोड़।’

सभी उनके इस बदले हुए अंदाज पर हैरानीभरी खुशी जता रहे थे, लेकिन यह मंजर थोड़ीदेर बाद ही गहरी टीस मे बदल गया। अचानक वे लोगों के पास से उठे और एक कुर्सी पर बैठ गए। कुर्सी पर बैठे-बैठे ही उन्होंने अपने एक रिश्तेदार को कहा कि नींद आ रही है। इतना कहते-कहते ही एक रिश्तेदार के कंधे पर सिर रख दिया..और प्राण छोड़ दिए।





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