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दृष्टिकोण. मुझे कभी इतने एमएमएस, ई-मेल्स, फोन कॉल्स नहीं आए। आज हर कोई बेहद आक्रोशित है। सब चाहते हैं कि तुरंत कुछ किया जाए। खोई जिंदगियों के प्रतिदान में और ६क् घंटों तक आतंकियों के चंगुल में रही इस मायानगरी मुंबई की गरिमा को बहाल करने के लिए जरूर कुछ करना होगा।
हम जैसे मुंबईकरों के लिए साउथ बॉम्बे शहर का दिल है और ताज इसकी विशिष्ट कला, संस्कृति, वास्तुशिल्प और विरासत की बुलंदियों का प्रतीक है। कैफे लियोपोल्ड एक बेहतरीन कैफे है जहां हम अकसर अपने सीमापार से आने वाले मित्रों के साथ जाते हैं। नरीमन प्वाइंट स्थित ओबेरॉय होटल दुनिया के बेहतरीन बिजनेस होटलों में से एक है, जिस पर हमें गर्व है।
इन्हें इस तरह उजड़ते हुए देखना हमें पल-पल सालता रहा। मुझे आपसे यह सब कहने की जरूरत नहीं है। आक्रोश से भरे ब्लॉग्स पढ़ लीजिए। संपादकीय पढ़ लीजिए। टीवी पर टिप्पणीकारों को सुन लीजिए। सबसे जरूरी बात, आप अपने दिल की आवाज सुन लीजिए। आपका दिल भी आपसे वही कहेगा, जो आज हर मुंबईकर कह रहा है। बस, अब बहुत हो चुका। अब पानी सिर से ऊपर गुजर चुका है।
इसके खलनायक भी प्रत्यक्ष हैं। ये वही नेता हैं जिन्होंने इस शहर को लूटा और हमारे लिए कुछ नहीं किया। वे अपने पसंदीदा बिल्डरों को उपहारस्वरूप ज्यादा से ज्यादा जमीन लुटाने के हिसाब-किताब में ही काफी व्यस्त हैं। वे राजनीतिक तिकड़में भिड़ाने, झुग्गियों को हड़पने में व्यस्त हैं। उन्हें बंदूकधारी सुरक्षा मिली है, उनके आने-जाने से ट्रैफिक रुक जाता है और उनकी कारों पर लगी लाल बत्ती उन्हें शान का एहसास कराती है। वे आधुनिक भारत के सबसे तिरस्कृत अवसरवादियों में से हैं। यहां तक कि इस संकट की घड़ी में भी वे इतने व्यस्त थे कि उन्हें समय से सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कहने की सुध भी नहीं आई।
यह बेहद शर्मनाक है कि हमें इतने बंधकों, इतनी मासूम जिंदगियों को खोना पड़ा, सिर्फ इस वजह से कि विलासराव और शिवराज पाटील को दो घंटे पहले आतंकवादियों के खिलाफ सुरक्षाकर्मियों को मोर्चे पर तैनात करना जरूरी नहीं लगा। खुफिया एजेंसियों से लेकर स्थानीय नागरिक समूहों द्वारा बार-बार दी गई चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया। भले ही यह देर से उठाया गया कदम हो, लेकिन सच यह है कि अपनी पोशाक के प्रति अतिरिक्त रूप से सजग, तुरंत निर्णय नहीं लेने वाले गृहमंत्री को आखिरकार कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाना केंद्र सरकार के लिए अपनी छवि को बचाने का प्रयास है। निवर्तमान गृहमंत्री शिवराज पाटील भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में अब तक के सबसे अक्षम गृहमंत्री रहे। राष्ट्रीय संकट के दौरान भी तीन बार अपनी वेश-भूषा बदलने के कारण मीडिया में ‘वस्त्र-पुरुष’ के नाम से उनका उपहास भी किया गया।
इसके अलावा जिन दो और नेताओं के खिलाफ जनता के मन में सबसे ज्यादा आक्रोश है, वे हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख और उनके डिप्टी रहे आर.आर. पाटील। इनमें से कोई जब भी टीवी पर नजर आया, लोग भड़क उठे। विलासराव के पास तो कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा। वे निपट असफलता का प्रतीक हैं। उन्होंने सिर्फ अपनी पार्टी को ही नीचा नहीं दिखाया, मुंबई भी उनके नाम पर शर्मिदा है और यदि उन्हें तुरंत अपदस्थ नहीं किया जाता, तो कांग्रेस फिर शायद कभी जनता का भरोसा दोबारा हासिल नहीं कर पाए। लोग उन्हें बहुत झेल चुके हैं। लोगों ने उनकी अयोग्यता, बिल्डरों और राज ठाकरे के प्रति खास अनुराग, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और शहर में तथाकथित ‘बाहरी’ लोगों की जलालत को रोकने में अक्षमता को काफी बर्दाश्त किया है। उनका खेल अब खत्म हो चुका है।
अब उन्हें जाना चाहिए। यदि आर.आर. पाटील के बाद अब विलासराव से भी इस्तीफा नहीं लिया जा सकता तो कांग्रेस-एनसीपी को राजनीति से हट जाना चाहिए। जनता की नफरत के निशाने पर तीसरे नेता राज ठाकरे हैं। पल-पल फैल रहे एक एसएमएस में उनका मजाक बनाया गया है। आखिरकार, जब स्थानीय सत्ता कारगर तरीके से इस संकट से निपटने में नाकाम रही, तो किसने आकर मुंबई को मुक्त कराया? जिन ‘बाहरी’ लोगों को राज ठाकरे मुंबई से खदेड़ना चाहते थे; वही मैरीन कमांडो, एनएसजी कमांडो, सेना की टुकड़ियों के रूप में आतंकवादियों से मुकाबला करने के लिए आए और मुंबई की लाज बचाई।
राजनेताओं को लेकर लोगों के मन में किस कदर गुस्सा है, इसकी एक झलक तब मिली जब शहीद कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने संवेदना जताने आए केरल के मुख्यमंत्री को अपने घर में नहीं घुसने दिया। यही बेहतर है कि ये नेता कुछ दिनों तक जनता के सामने न आएं। भारतीय तिरंगा शान से लहरा रहा है, ऐसे में कोई क्षेत्रवादी या सांप्रदायिक बयानबाजी न हो तो बेहतर है। मुंबई अब सिर्फ महाराष्ट्र की राजधानी नहीं रही, यह अब भारत की आतंकवाद के खिलाफ बहादुरी की जंग का प्रतीक बन गई है। कोई एक समुदाय इस शहर पर अपना दावा नहीं ठोंक सकता। यह सभी भारतीयों की है। उन्होंने इसे वापस जीता है।
इसी वजह से किसी ने भी नरेंद्र मोदी की बातों पर ध्यान नहीं दिया। किसी की भी अब विभेदक राजनीति में दिलचस्पी नहीं है। हेमंत करकरे की बेवा ने इसकी सटीक अभिव्यक्ति तब कर दी, जब उन्होंने दो-टूक लहजे में नरेंद्र मोदी द्वारा एक करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की पेशकश ठुकरा दी। मुंडे तब टीवी कमेंटेटर्स के निशाने पर आ गए, जब उन्हें आतंकियों की घेरेबंदी के दौरान नरीमन हाउस के नजदीक पहुंच राजनीतिक वक्तव्य देने की कोशिश की।
यहां सिर्फ उन्हीं का स्वागत है जो मदद का हाथ बढ़ा सकें, अपने संकीर्ण व भ्रामक राजनीतिक उद्देश्यों से परे देख सकें और मुंबई व देश में विश्वास-बहाली के लिए काम कर सकें। नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी देने वाले, उनका संबल बढ़ाने वाले, उन्हें राहत देने वाले ही यहां के नए हीरो होंगे। पुरानी गैंग कोई मायने नहीं रखती। आधुनिक भारत को एक अद्यतन नीति चाहिए, जो मौजूदा दौर की आपदाओं से निपट सके। राजनीतिक तिकड़मों का दौर अब खत्म हो चुका है। इसी तरह जाति, संप्रदाय, क्षेत्र और मजहब के नाम पर होने वाली विभेदक राजनीति का वक्त भी पूरा हो गया है। ऐसे लोगों को खदेड़ बाहर करें जो मुंबई त्रासदी को अपने फायदे के लिए भुनाना चाहते हैं।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार हैं।