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भोपाल. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने खंडहरों में तब्दील मांडू के लालमहल और सदियों पहले उजाड़ हो चुके उसके विशाल उद्यान का वैभव लौटाने की कोशिश शुरू की है। मध्यप्रदेश के 292 संरक्षित स्मारकों में यह एएसआई के हाथों में इस समय सबसे बड़ा काम है, जिस पर करीब 80 लाख रुपए खर्च होंगे। इसके साथ ही परमार राजाओं के इस इतिहासप्रसिद्घ शहर को वल्र्ड हेरिटेज सिटी के रूप में भी सामने लाने की तैयारी की जा रही है।
मांडू में ऐसी अनगिनत इमारतें हैं, जो इतिहास के अनेक समृद्घ दौर की साक्षी हैं। कई इमारतों के निर्माण और विकास के बारे में तो कोई जानकारी तक नहीं है। लालमहल इन्हीं में से एक गुमनाम लेकिन बुलंद इतिहास का नमूना है। यह शाही परिसर के बाहर मलिक मुगीथ की मस्जिद और दाई की बहन के मकबरे से सटी इमारत है। कारवां सराय भी इसके पास ही है। एएसआई की एक खास टीम लालमहल के असली रूप को कागजों पर उतार रही है। टीम ने एक सर्वे में पाया है कि आज अलग-अलग नजर आने वाले पैलेस, मस्जिद और मकबरा कभी एक ही विशाल परिसर का हिस्सा रहे होंगे। लालमहल का गार्डन अपने समय में बेहद खूबसूरत रहा होगा। पत्थरों, मिट्टी और घास में दफन इसके अवशेष आकर्षक जल सरंचनाओं के हैं। अब इस पूरे परिसर के वैभव को पुनर्जीवित किया जा रहा है।
उत्सव का शहर: आज का मांडू भले ही अनगिनत खंडहरों व टीलों का उजाड़ पर्यटन केंद्र हो, लेकिन अतीत में मंडपदुर्ग के नाम से विख्यात यह नगर आज के किसी भी विकसित शहर की टक्कर का रहा है। इतिहासकार डॉ. शशिकांत भट्ट बताते हैं कि परमार राजाओं के समय यह संस्कृत का महत्वपूर्ण केंद्र था। यहां राजा भोज की बनवाई संस्कृत की विद्यापीठ और थिएटर था। 10-12 वीं सदी में यहां के समृद्घ जैन समुदाय के उत्सवों के वर्णन किताबों में खूब मिलते हैं। इसीलिए इसे उत्सवों का शहर भी कहा जाता था। लेकिन सन् 1401 में दिलावर खां गौरी के पहले स्वतंत्र सुलतान घोषित होते ही प्राचीन मंडपदुर्ग इतिहास की करवटों में खो गया।
वल्र्ड हेरिटेज सिटी: मप्र में अभी खजुराहो के मंदिर, सांची के स्तूप और भीमबैठिका ही वल्र्ड हेरिटेज में शुमार हैं। खजुराहो को 1988, सांची को 1989 और भीमबैठिका के शैलचित्रों को 2003 में विश्व विरासत के रूप में मान्यता मिली थी। नए साल में भोजपुर के मंदिर का प्रस्ताव यूनेस्को को भेजा जाने वाला है और इसके बाद मांडू की बारी है।
खंडहरों की दो कहानियां
हमारी कोशिश मांडू को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर चमकाने की है। सब कुछ ठीक रहा तो अगले कुछ सालों में मांडू वल्र्ड हेरिटेज सिटी के रूप में सामने होगा। भोजपुर के बाद यूनेस्को के समक्ष इसका प्रस्ताव भेजा जाने वाला है।
-एसएस गुप्ता, उप अधीक्षण पुरातत्वविद्, एएसआई, भोपाल।
मांडू की अधिकांश प्रसिद्घ इमारतों के इतिहास की दो कहानियां हैं। एक उसकी मूल कहानी और दूसरी सुलतानों के समय किए गए बदलाव की। मौजूदा मांडू के खंडहर व्यापक बदलाव की नींव पर खड़े हैं।
-डॉ. शशिकांत भट्ट, निदेशक, मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी, इंदौर।