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नजरें बागियों और निर्दलीयों पर

भोपाल. प्रदेश के प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा-कांग्रेस ऊपरी तौर पर भले ही अपनी-अपनी सरकार बनाने का दावा कर रहे हों, लेकिन बहुमत नहीं मिलने पर उनकी रणनीति क्या होगी? इसको लेकर दोनों दलों में विचार मंथन जारी है। पार्टी नेताओं की निगाहें बसपा, सपा, भाजश, गोंगपा और निर्दलीयों पर टिकी हैं। विशेषकर उन बागियों पर जिनकी विचारधारा उनसे मेल खाती है। तीसरी ताकत के रूप में उभर रहे छोटे राजनीतिक दलों के बीच भारतीय जनशक्ति पार्टी की भूमिका अहम हो सकती है। 219 प्रत्याशियों को लेकर मैदान में उतरी भाजश में भाजपा और कांग्रेस दोनों के बागी मौजूद हैं।

भाजपा छोड़ भाजश में गए
दक्षिण-पश्चिम भोपाल से चुनाव लड़ रहे शेलेंद्र प्रधान, सेंवढ़ा से रसालसिंह, दतिया से अवधेश नायक, नरसिंहपुर से जालमसिंह पटेल, गोटेगांव से हाकमसिंह चढ़ार, छतरपुर से रतनचंद फुलवानी, पन्ना से सुधीर अग्रवाल और सागर से मुकेश जैन प्रमुख हैं।

कांग्रेस से पल्ला झाड़ा
पवई विधानसभा सीट के प्रत्याशी मुकेश नायक, शिवपुरी के गणोश गौतम, बंडा से कांग्रेस नेता लक्ष्मीनारायण यादव के बेटे सुधीर यादव, सिलवानी से देवेंद्र पटेल, पृथ्वीपुर से श्रीराम कुशवाह प्रमुख हैं।

थामा अन्य दलों का दामन
छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा से मनमोहन शाह बट्टी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) की जगह राष्ट्रीय गोंडवाना पार्टी से लड़ रहे हैं। बालाघाट जिले के परसवाड़ा से दरबूसिंह उईके गोंगपा छोड़कर गोंडवाना मुक्ति सेना से मैदान में हैं। सिवनी जिले की लखनादौन सीट से रामगुलाम उईके गोंगपा के बजाए निर्दलीय के रूप में खड़े हैं। इसी तरह कांग्रेस और भाजपा के अन्य बागी बसपा और सपा से भी मैदान में हैं।

नहीं लागू होगा दलबदल कानून
भाजश मान्यता प्राप्त दल नहीं है, इसलिए उसके प्रत्याशी जीतने के बाद भी निर्दलीय होंगे। विधानसभा सचिवालय सूत्रों के मुताबिक ऐसी स्थिति में अगर वे किसी अन्य दल को सहयोग करते हैं या उसकी सदस्यता लेते हैं तो उन पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा।

कमोबेश यही हाल अन्य छोटे दलों का है। कांग्रेस-भाजपा से बगाबत कर कुछ नेता सपा-बसपा का दामन थाम चुके हैं, लेकिन उन्हें दलीय अनुशासन का पालन करना होगा। अन्यथा उनकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है।

कुनबे को संभालना चुनौती
गौरतलब है कि भाजश के प्रत्याशी टिकट के लिए भाजश और कांग्रेस छोड़कर आए हैं इसलिए जीतने के बाद उन्हें प्रतिबद्धता के साथ अपने कुनबे से जोड़ कर रखना भाजश संगठन के लिए बड़ी चुनौती होगी। अन्य बागियों की तरह कांग्रेस-भाजपा को अपने पुराने साथियों से मदद का भरोसा है।





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