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भोपाल. उद्योगों और विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़े वनों के बदले सरकार द्वारा वसूली गई करोड़ों रुपए की राशि कामचलाऊ ‘कंपंसेटरी एफोरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लॉनिंग अथॉरिटी’ (केम्पा) के पास बेकार पड़ी है। इसका कहां और क्या उपयोग होगा यह भी सरकार तय नहीं कर पा रही है।
वनों के गैर-वनीय उपयोग पर अंकुश लगाने की मंशा से शुद्ध वर्तमान मूल्य (नेट प्रजेंट वेल्यू, एनपीवी) वसूला जाता है। इसके तहत केंद्र के पास सभी राज्यों का करीब 6000 करोड़ रुपया जमा है। राज्यों की मांग है कि इस राशि को उनके वन क्षेत्र की बेहतरी में लगाया जाना चाहिए, लेकिन केंद्र इसे अपनी ‘ग्रीनिंग इंडिया’ परियोजना में इस्तेमाल करने पर जोर दे रहा है। इस विशाल राशि के उपयोग को लेकर संसद में एक विधेयक भी लंबित है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के तहत मई-06 में तदर्थ ‘केम्पा’ का गठन किया गया था। मध्यप्रदेश के वनों की कीमत के रूप में केम्पा के पास अक्टूबर-08 तक 418.64 करोड़ रुपए जमा हैं। यह राशि 656 परियोजनाओं से वसूली गई है। विभिन्न स्तर के वनों के लिए तय की गई 4.38 लाख से लेकर 10.43 लाख रूपए प्रति हैक्टेयर की दर से यह राशि अभी वसूली जा रही है।
राज्य सरकार ने इस राशि के उपयोग को लेकर केंद्र को लिखा था, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में राज्य की विशाल वन संपदा के संरक्षण के लिए इस राशि को लौटाने का मुद्दा उठाया था, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। केंद्र ने राशि के उपयोग के लिए बने कानून के मसौदे को संसद के बीते सत्र में आखिरी दिन पेश किया था, लेकिन समय की कमी के चलते इस पर चर्चा नहीं हो पाई।
मुख्य वन संरक्षक (भू-प्रबंधन) शरद तिवारी ने दैनिक भास्कर को बताया कि एनपीवी लागू होने के पहले 1998 से राज्य में ‘प्रत्याशा मूल्य’ की तरह उद्योगों और विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित किए जाने वाले वन की कीमत वसूली जाती थी। मध्यप्रदेश ऐसा करने वाला पहला राज्य था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसी दर को लागू किया था।
क्या है एनपीवी?
यह उद्योगों, खदानों, सड़कों, बांधों और विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की जाने वाली वनभूमि का मूल्य है। इसमें वैकल्पिक वनीकरण, कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट आदि के खर्च भी शामिल रहते हैं। अधिसूचित वन क्षेत्रों के अलावा दस्तावेजों में वन की तरह दर्ज जमीन और प्रति एकड़ में 250 पेड़ वाली निजी जमीन पर भी एनपीवी लागू होता है।
‘वन केवल पेड़ नहीं होते। इनमें ऑक्सीजन, पानी सोखने की क्षमता तथा धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य भी जुड़े होते हैं। अधिग्रहिता के पहले इन सबका एनपीवी जोड़ा जाना चाहिए।’
—हिमांशु उपाध्याय, वन विशेषज्ञ, एकेडमी ऑफ माउन्टेन इन्वायरोनिक्स, दिल्ली