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हम ‘भगवान’ भरोसे

भोपाल. मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद हम कितने सुरक्षित? क्या हमारी पुलिस इन आतंकियों से निपटने में सक्षम है। भास्कर की पड़ताल बताती है कि जितने अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत है, उसका 25 फीसदी भी पुलिस बल के पास नहीं है।

पिछले कई वषरें में पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर करोड़ों रुपए मिले पर न तो थाने अत्याधुनिक हुए, न नए शस्त्र आए और न ही हमारे अधिकारियों को आधुनिकतम ट्रेनिंग मिली है। सिर्फ बड़े अधिकारियों की गाड़ियां बदलीं और थानों के नए भवन बन गए। सूत्र बताते हैं कि थ्री नॉट थ्री से इसलिए काम चलाया जा रहा है क्योंकि प्रदेश में इसके कारतूस बड़ी मात्रा में खरीद रखे हैं। इनके खत्म होने तक थ्री नॉट थ्री का इस्तेमाल किया जाता रहेगा। अफसरों का यह भी तर्क है कि सभी जवानों को एके-56 या 47 या ‘इनसास’ कंपनी की राइफल नहीं दी जा सकती।

त्रिखा कमेटी की अनुशंसा का हश्र
पुलिस सुधार के लिए राज्य सरकार ने एमसी त्रिखा की अध्यक्षता में 1994 में कमेटी बनाई थी। उसने करीब नौ साल काम किया और 27 खंडों की लंबी रिपोर्ट वर्ष 2000 में पेश की। जब उसे अमल करने की बारी आई तो सरकार ने ऐसी अनुशंसाओं को लागू करने में दिलचस्पी दिखाई जिनमें कोई खर्च नहीं होना था। कमेटी ने ट्रेनिंग, वीआईपी सुरक्षा और संसाधनों को लेकर कई अनुशंसाएं की थीं।

नहीं बनाया पुलिस एक्ट
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी प्रदेश सरकार ने अभी तक पुलिस एक्ट नहीं बनाया है। देशभर में छत्तीसगढ़ और कुछ अन्य राज्यों ने ही इसे लागू किया है। राज्य सरकार ने आतंकवाद से निपटने के लिए मकोका जैसा मध्यप्रदेश संगठित अपराध एवं उच्छेदक गतिविधियां प्रतिशेध अधिनियम बनाकर केंद्र सरकार को बीते वर्ष 2007 में भेजा है, जिस पर अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ।

प्रशिक्षित हैं पर अभ्यास नहीं
एक आला पुलिस अफसर बताते हैं, मप्र में 200 से ज्यादा पुलिस जवान कमांडो प्रशिक्षण प्राप्त हैं, लेकिन वे एक टीम के रूप में नहीं हैं। इनमें नक्सलियों से निपटने की ट्रेनिंग प्राप्त करीब 30 कमांडो हैं। दूसरे एनएसजी प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों की पदस्थापनाएं विभिन्न बटालियनों, जिला पुलिस और दूसरी शाखाओं में हैं।

इसी तरह प्रशिक्षण प्राप्त कमांडो के नियमित अभ्यास की व्यवस्था भी नहीं है। अपर मुख्य सचिव (गृह) विनोद चौधरी कहते हैं कि वैसे तो पूरे बल को नियमित रूप से ड्रिल परेड करना चाहिए और कमांडो प्रशिक्षण लेने वालों को तो इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पूर्व महानिदेशक लोकायुक्त अरुण गुटरू के मुताबिक अब सिपाही की भूमिका पहले से काफी बदल गई है। उसे प्रशिक्षित कर हर संदिग्ध व्यक्ति से संयमित रहकर पूछताछ करने का गुर सिखाया जाना चाहिए, जिससे गड़बड़ी फैलाने वालों में डर पैदा हो।

हमारी पुलिस अभी 19वीं सदी की है, जिसे 21वीं सदी का बनाना जरूरी है। नेताओं का हुक्म बजाने वाली पुलिस नहीं चाहिए। राजनेता यह चाहते हैं कि उनके लोगों को कोई पकड़े नहीं और वे चुनाव जिताएं। आजकल पुलिस वाले वरिष्ठ अफसरों और नेताओं की गाड़ियों के दरवाजे खोलते देखे जाते हैं।
- केएस ढिल्लन, पंजाब के पूर्व डीजीपी

वित्त विभाग पुलिस को संसाधन उपलब्ध कराने में कितनी रुचि लेता है, इसका उदाहरण जीआरपी में सन 1981 में पुलिस बल वृद्धि के प्रस्ताव में देखने को मिलता है। तीन चरण के इस प्रस्ताव को पूरा होने में 18 साल लगे। पहला चरण डीआईजी रेलवे पुलिस के कार्यकाल में 1981 में पूरा कराया और जब डीजीपी बना तो तीसरा चरण सन 1999 में पूरा हो सका। इस बीच किसी ने इसकी सुध नहीं ली।
- सुभाषचंद्र त्रिपाठी, पूर्व पुलिस महानिदेशक

पुलिस सुधार के लिए पांच साल में क्या मिला : वर्ष 2008-09 में

- पुलिस आधुनिकीकरण के लिए 40 करोड़ रुपए
- इंटरनेट क्राइम रोकने के लिए एक करोड़ रुपए
- बड़े शहरों में सुरक्षा के लिए डेढ़ करोड़ रुपए
- पुलिस ट्रेनिंग काम्प्लेक्स के लिए ढाई करोड़ रुपए

वर्ष 2007-08 में
- पुलिस आधुनिकीकरण के लिए 40 करोड़ रुपए
- वायरलैस और कम्प्यूटरीकरण के लिए 37 करोड़ 21 लाख 88 हजार रुपए

वर्ष 2006-07 में
- पुलिस आधुनिकीकरण के लिए 40 करोड़ रुपए
- वायरलैस और कम्प्यूटरीकरण के लिए 35 करोड़ दो लाख 88 हजार रुपए

वर्ष 2005-06
- पुलिस आधुनिकीकरण के लिए 52 करोड़ 21 लाख 48 हजार रुपए
- वायरलैस एवं कम्प्यूटरीकरण के लिए 33 करोड़ 78 लाख 54 हजार रुपए

वर्ष 2004-05
- पुलिस की सुविधाओं में इजाफे के लिए 122 करोड़ रुपए
- डीएनए लैब और एफएसएल लैब के लिए दो करोड़ रुपए

अभी ये प्रदेश की पुलिस के पास
>> एके-56, इनसॉस, एमपी-5 और आटोमैटिक राइफल्स 7.62 हैं। ये राइफल्स भी जरुरत के अनुपात से सिर्फ 25 फीसदी की संख्या में हैं। ठ्ठ थ्री-नॉट-थ्री के कारतूस अब बनना तो बंद हो गए, मगर मप्र पुलिस के पास अभी-भी बड़ी मात्रा में इनका स्टॉक है। ठ्ठ आम नागरिकों के लिए प्रतिबंधित 9.9 पिस्टल और .38 रिवॉल्वर। ठ्ठ बुलेट प्रूफ जैकेट और चार पहिया गाड़ियां।
>> हर रेंज में एक-एक और पुलिस मुख्यालय में बम डिस्पोजल स्क्वाड। कहां-कहां हैं प्रदेश के कमांडो
>> हॉक फोर्स और एसटीएफ ।
>> एसएएफ की विभिन्न बटालियन।

प्रयास कर रहे हैं
आतंकवादियों की गतिविधियों पर नजर रखने और उनसे निपटने के लिए एटीसी का गठन किया गया है। प्रदेश के सभी शहरों पर पुलिस की खुफिया नजरें हैं। हाई अलर्ट घोषित है। पुलिस को आधुनिक संसाधनों से लैस करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
- हिम्मत कोठारी, गृहमंत्री





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