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पानी का अभाव पैदा करने और उससे निपटने का दुष्चक्र

सरकार वर्षो से फाइलों में बंद पार्वती-कालीसिंध चंबल जोड़ योजना के क्रियान्वयन की बात कह रही है। वर्षो पूर्व इस परियोजना की लागत 200 करोड़ के बराबर आंकी गई थी। इस समय तो इसकी लागत तीन गुना अर्थात् 600 करोड़ के लगभग होने का अनुमान सहज में ही लगाया जा सकता है। इस योजना के माध्यम से सीहोर, गुना, राजगढ़ और शाजापुर जिलों से वर्षा के पानी को प्राप्त करने वाली पार्वती, कालीसिंध और नेवज (कालीसिंध की सहायक नदी) के पानी से मालवा में सिंचाई सुविधाएं निर्मित करने और कुछ पानी को गांधीसागर में डालने की योजना प्रस्तावित है।

इस संदर्भ में अनेक प्रश्न उठते हैं, प्रथम तो यह कि डग-डग नीर वाले मालवा में अमठवाड़ जैसे गरीब इलाके से पानी की भीख मांगने की आवश्यकता क्यों पड़ गई? द्वितीय और उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पार्वती, नेवज और कालीसिंध में इतना पानी है कि जिस क्षेत्र में वे बहती हैं उसकी सिंचाई पेयजल आदि की पूर्ति के बाद भी 1540 एम.सी.एम. अतिरिक्त पानी उपलब्ध है जिसे मालवा में सिंचाई और गांधी सागर में डालने की बात कही जा रही है। वैसे प्रश्न और भी हैं जैसे इन नदियों के पानी को मालवा पठार तक पहुंचाने के लिए ऊपर उठाना पड़ेगा, उसके लिए बिजली कहां से उपलब्ध होगी?

आजादी के बाद चंबल के पानी के दोहन के लिए चंबल घाटी विकास योजना बनी जिसमें राजस्थान और मध्यप्रदेश की बराबर की भागीदारी थी। इस योजना के जरिए मालवा से बहकर चंबल में आए औसतन 4000 एम.सी.एम. पानी को बांध में संग्रहित कर आगे कोटा, बारां, बूंदी और मध्यप्रदेश के श्योपुर, मुरैना और भिंड जिले में सिंचाई सुविधाएं निर्मित की गईं।

1973 से 74 से 2003 से 04 तक के आंकड़ों का विश्लेषण से स्पष्ट है कि राजस्थान ने अपने यहां पेयजल, सिंचाई उद्योगों के लिए औसतन 3000 एम.सी.एम. पानी का उपयोग किया, मध्यप्रदेश को तो सिंचाई हेतु 1000 एम.सी.एम. पानी ही मिला। कोटा, बारां और बूंदी में वर्षा से मालवा के बराबर पानी प्राप्त होता है, इन जिलों को वर्षा के पानी के अलावा मालवा का पानी भी मिलने लगा।

परिणाम यह हुआ कि इन जिलों में अत्यधिक पानी की मांग करने वाली गन्ना, बासमती, चावल, सब्जियां आदि की खेती कर किसान मालामाल होने लगे। उधर, वर्षा के सतही पानी से वंचित मालवा के किसानों का एकमात्र आसरा भू-जल स्रोत ही बचे। भारी राशि खर्च कर अत्यंत गहराई से पानी उलीच कर खेती करने लगे। भू-जल के इस एकांगी दोहन से उनके एक-तिहाई कुएं सूख गए और डग-डग नीर वाले मालवा में पानी की भारी मारा-मारी होने लगी।

पानी के अभाव से उत्पन्न होते असंतोष पर छींटे डालने के लिए पार्वती, नेवज, कालीसिंध से 1540 एम.सी.एम. पानी मांगने, यहां लाने की योजना प्रस्तावित है। इस पानी में से 740 एम.सी.एम. पानी तो गांधीसागर में डाला जाएगा। शेष से मालवा में सिंचाई की जा सकेगी। प्रश्न यह है कि क्या पार्वती, नेवज और कालीसिंध में 1540 एम.सी.एम. पानी अतिरिक्त उपलब्ध है?

सिंचाई आयोग के अनुसार देश में सतही योजनाओं अर्थात् नहरों, तालाबों से 30 प्रतिशत और भू-जल स्रोतों से 30 प्रतिशत कृषि भूमि पर सिंचाई की जा सकती है। सीहोर, गुना, राजगढ़ और शाजापुर जिलों में कुल मिलाकर 18.57 लाख हेक्टेयर भूमि पर कृषि की जाती है। इसका 30 प्रतिशत अर्थात् 5.6 लाख हेक्टेयर सतही स्रोतों से सिंचित किया जाना चाहिए। वर्तमान में तो इन स्रोतों से मात्र 60 हजार हेक्टेयर ही सिंचित होता है। अत: 30 प्रतिशत के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए 5 लाख हेक्टेयर पर सिंचाई सुविधाएं निर्मित करना होगी।

इसके लिए इन नदियों से 3000 एम.सी.एम. पानी प्राप्त करना होगा। इस समय भी इन नदियों में 1540 एस.सी.एम. पानी ही अतिरिक्त उपलब्ध है। स्पष्ट है कि पार्वती, कालीसिंध, चंबल नदी जोड़ परियोजना पूर्णरूपेण भ्रामक मान्यताओं पर आधारित है तथा क्षेत्रीय विषमताओं को जन्म देने वाली है।

योजनाओं के भ्रामक स्वरूप के कारण पहले ही मालवा में पानी के अभाव और कोटा, बारां और बूंदी जिलों में आवश्यकता से अधिक पानी की पूर्ति की स्थिति निर्मित हुई। अब मालवा में गांधीसागर जनित पानी के अभाव की स्थिति से निपटने के लिए गुना, राजगढ़ और सीहोर से पानी की मांग हो रही है परंतु इस परियोजना के फलस्वरूप जब ये जिले ही पानी के भारी अभाव से पीड़ित होंगे तो पानी कहां से आयात करेंगे? क्या हमारी शक्ति एक क्षेत्र में पानी के अभाव की स्थिति से निपटने और इस अभाव से निपटने की प्रक्रिया में दूसरे क्षेत्र में अभाव की स्थिति निर्मित करने तथा फिर उसमें अभाव की स्थिति से निपटने के लिए तीसरे क्षेत्र में अभाव की स्थिति निर्मित करने और निपटने जैसे दुष्चक्र में फंसने की ही रहेगी। इस परियोजना पर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
(लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं)





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