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दृष्टिकोण. तीन-चार दिन में सारा मामला ही उलट गया है। मुंबई को लेकर पाकिस्तान की जनता और सरकार में भारत के लिए जबर्दस्त हमदर्दी पैदा हुई थी, लेकिन अब वहां युद्ध का माहौल बन गया है। पाकिस्तान के परस्पर विरोधी दलों ने भी एकजुट होकर भारत का मुकाबला करने का संकल्प किया है। कल तक जो तालिबान, अलकायदा और जमाते-दावा के छापामार पाकिस्तानी सरकार की नाक में दम किए हुए थे, वे सरकार के साथ आ खड़े हुए हैं और सरकार उन्हें ‘देशभक्त’ कह रही है।
जो आसिफ अली जरदारी और यूसुफ रजा गिलानी भारत के साथ पूर्ण सहयोग का वादा कर रहे थे, वे अब कह रहे हैं कि मुंबई हमले के आतंकवादी पाकिस्तानी ही नहीं हैं। यदि वे पाकिस्तानी हैं भी, तो उनका सरकार से कोई संबंध नहीं है। भारत द्वारा सौंपी गई २क् प्रमुख आतंकवादियों की सूची पर जरदारी की प्रतिक्रिया विचित्र है। वे कहते हैं कि हम उन्हें भारत को नहीं सौंपेंगे। हम खुद उन पर मुकदमा चलाएंगे। मुशर्रफ और जरदारी में क्या फर्क रह गया है? यही बात मुशर्रफ ने आगरा में कही थी।
आखिर जरदारी ने यह शीर्षासन क्यों किया? जरदारी से आशा थी कि वे पाकिस्तानी आतंकवादियों के खात्मे के लिए प्रभावी कदम उठाएंगे, क्योंकि वे खुद भयंकर भुक्तभोगी हैं, लेकिन उन्हें फौज और आईएसआई ने रातोरात पलटी मारने को मजबूर कर दिया। उन्हें बताया गया होगा कि यदि दाऊद इब्राहिम, मौलाना अजहर, हाफिज मुहम्मद सईद जैसे लोग भारतीय पुलिस के शिकंजे में फंस गए, तो वे पिछले १५ साल की सारी हकीकत बयान कर देंगे। मुशर्रफ और नवाज शरीफ तो क्या, बेनजीर भुट्टो के भी नाम उछलेंगे। पाकिस्तान का कौन-सा बड़ा नेता या फौजी है, जिसने आतंकवादियों की पीठ न ठोकी हो। कुल मिलाकर पूरा पाकिस्तान ही नंगा हो जाएगा।
सारी दुनिया को पता चल जाएगा कि पाकिस्तान के कुछ कट्टरपंथी तत्व ही नहीं, पूरा पाकिस्तान ही आतंकवादी राष्ट्र है। विश्व-समाज की नजरों में इस तरह गिरने से बेहतर है कि आसिफ जरदारी अपनी बात से ही मुकर जाएं। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि आसिफ जरदारी और उनके प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी खुदमुख्तार नेता नहीं हैं। वे फौज और गुप्तचर सेवा की कठपुतली हैं। जरदारी से कोई पूछे कि ९/११ के आरोपी सैकड़ों पाकिस्तानियों और अफगानों को ग्वांटेनामो क्यों भेजा गया है? उन्हें अमेरिका के हवाले क्यों किया गया है? उन पर पाकिस्तान में ही मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया?
मुंबई का हमला भारत और पाकिस्तान को जोड़ने वाला सुदृढ़ सेतु बन सकता था, लेकिन अब यही मामला दोनों देशों को मुठभेड़ की मुद्रा में ला खड़ा कर रहा है। इसकी काफी-कुछ जिम्मेदारी टीवी चैनलों की भी है। अति उत्साही चैनली पत्रकार अपनी बात इस तरह से कहते हैं कि उसका उल्टा असर पड़ता है। पाकिस्तान के आतंकवादियों का वर्णन करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें आम पाकिस्तानी नागरिकों और सरकार की टांग-खिचाई करने के बजाय पाकिस्तान के सिर्फ ‘आतंकवादी तत्वों’ पर ध्यान देना चाहिए था।
हमारे विदेश मंत्री के काफी संयत बयान का भी पाकिस्तान में यही मतलब लगाया कि भारत अब हमला बोलने वाला है। विदेश मंत्री थोड़ा और चुप रह जाते, तो बेहतर होता। शायद भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सरकारें मिलकर ‘आतंकवादी तत्वों’ के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा खड़ा कर लेतीं। अमेरिका इस मोर्चे का डटकर समर्थन करता, लेकिन भारतीय मीडिया की सहज असावधानी के जवाब में पाकिस्तान के अनेक अत्यंत संयत पत्रकारों ने भी भारत-विरोधी अभियान छेड़ दिया है। वे मुंबई हमले को हिंदू-यहूदी साजिश बता रहे हैं। यह रवैया पाकिस्तान का भयंकर नुकसान करेगा। दुनिया के देशों में उसकी छवि चूर-चूर हो रही है।
अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस ने साफ-साफ कहा है कि अगर ये आतंकवादी बिलकुल गैर-सरकारी हैं, तो भी जिम्मेदारी तो राज्य की ही है, क्योंकि वे उसकी जमीन पर रहकर साजिश करते हैं। राइस के बयान से यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका को अब कोई शक नहीं रह गया है। अमेरिकी सेनापति एडमिरल माइक मुलेन ने भी इस्लामाबाद पहुंचकर राइस की ही तरह पाकिस्तानी नेताओं को सलाह दी है कि वे भारत के साथ सहयोग करें और पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी अड्डों को जड़ से उखाडें़।
पाकिस्तान के सेनापति परवेज कियानी ने अमेरिकियों को यह पु़िड़या दी है कि यदि वे भारत-पाक सीमा पर अपनी फौज सक्रिय करेंगे, तो पाक-अफगान सीमा पर चल रहे युद्ध में पिट जाएंगे। दूसरे शब्दों में अमेरिका भारत पर दबाव डाले कि वह पाकिस्तान के विरुद्ध कोई फौजी कार्रवाई न कर डाले। सच्चई तो यह है कि भारत पाकिस्तान के विरुद्ध कोई युद्ध नहीं छेड़ना चाहता है और न ही इस काम के लिए अमेरिका भारत को उकसाएगा, लेकिन यदि भारत सरकार मुंबई हमले पर सिर्फ जबानी जमा-खर्च करती रही, तो चुनाव के पहले ही उसका सूपड़ा साफ हो जाएगा। वह भारतीय जनता के अपूर्व क्रोध का शिकार बन जाएगी।
तो भारत सरकार क्या करे? उसे मुंबई-हमले का पूर्ण अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहिए? सुरक्षा परिषद से उसकी निंदा करवाना चाहिए और पाकिस्तान को मजबूर करना चाहिए कि वह आंतकवादी अड्डों पर सीधा हमला करे या संयुक्त राष्ट्र तदर्थ सेना को सीधा हमला करने दे? सितंबर २क्क्१ में अफगानिस्तान में घुसते समय अमेरिका ने जो माहौल खड़ा किया था, वैसा ही माहौल विश्व में पैदा किया जाए? भारत आए रूस के राष्ट्रपति का हम पूर्ण समर्थन लें। रूसी डूमा (संसद) ने भारत के पक्ष में सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान-की-मून ने भी भारत के प्रति सहानुभूति जताई है। दुनिया के सभी प्रमुख देशों ने आतंकवाद के उन्मूलन की अपील की है। यह मौका है कि आतंकवाद को भारत-पाक मामला बनाने के बजाय विश्व-मुद्दा बनाया जाए और पाकिस्तान के आतंकवादी अड्डों पर विश्व-मोर्चे से हमला करवाया जाए। आर्थिक और सामरिक दुर्दशा में फंसी पाकिस्तानी सरकार विश्व-दबाव के आगे झुके बिना नहीं रहेगी। यदि भारत सीधा हमला करेगा, तो पाकिस्तान फौज के पीछे एकजुट हो जाएगा और खुद आतंकवाद की हिमायत करेगा। आतंकवाद से मुक्त होने के लिए पाकिस्तानी जनता उसी तरह छटपटा रही है, जिस तरह भारतीय जनता।
-लेखक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषक हैं।