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मकसद का मतदान

जवाहर नगर. वुमन भास्कर की पहल पर शहर की जागरुक महिलाएं जवाहर नगर के एक पोलिंग बूथ पर इकट्ठी हुई। सबने मन में मतदान करने का जबरदस्त उत्साह था। जिसमें मुंबई की आतंकी घटनाओं का गहरा असर था। इस बार उनके मकसद को नई सोच मिली थी। उन्होंने कहा कि बालिग होने के साथ ही वोट देना शुरू कर दिया था।

घर के काम में भले ही घरवालों की मर्जी चलती है, लेकिन वोट पर ठप्पा लगाने के मालिक तो हम खुद हैं। मासा, दादोसा, काकोसा किसी का भी दबाव नहीं मंजूर। वादे पूरे करने वाले नेता नहीं हैं, फिर भी विकल्प तो तलाशना ही है। मुंबई जैसी दूसरी आतंकवादी घटनाओं के पीछे नेताओं की लापरवाही नहीं तो और क्या है? इसलिए वक्त आ गया है कि अब हममें से ही किसी को शुरुआत करनी होगी। बच्चों में ऐसे राजनीतिक संस्कार डालने होंगे, जिससे हम अपने देश में सुरक्षित रह सकें। उन्हें राजनीति में भेजना पड़ेगा। गंभीर अभिव्यक्ति के साथ महिलाओं ने वोट के अधिकार का प्रयोग कर दूसरों को भी प्रेरित किया।

चलेगी अपनी मर्जी
बिजनेसवुमन सुशीला बैद 33 साल से मतदान कर रही हैं। गुरुवार को सुबह उठकर स्नान-पूजा किए बगैर ही पति के साथ वोट डालने चली गईं। उन्होंने शादी के बाद ससुराल में पहली बार मतदान करने की घटना सुनाई। सुशीला कहती हैं, परिवार में सभी दूसरी पार्टी को वोट देने के पक्षधर थे। मेरी अलग पसंद थी। मासा को पता चलने पर उन्होंने दबाव डाला कि इस बार पार्टी बदल दूं। मैंने उनसे कहा, ‘मासा ठप्पा तो बठई लगा सूं जठ म लगाणो है’। वैसे भी वोट किसे दिया किसको पता चलता है? अब सही प्रत्याशी को देखकर वोट देती हूं।

जीत में मेरा वोट भी था
ललिता रायजादा 18 साल में एक बार भी वोट के अधिकार का इस्तेमाल करने से चूकी नहीं। वे बताती हैं, कोलकाता में ससुराल है। मेरे पति और मैं अलग-अलग पार्टी को वोट करते हैं। ससुराल में पहली बार वोट करने की बारी आई तो सारे विपक्षी पार्टी के समर्थक थे। अपनी राय उनसे जुदा थी। तुम्हारे एक वोट से वो नेता नहीं जीतेगा। रिजल्ट आने के बाद मेरे पसंद का नेता ही जीता। तब मैंने सबसे कहा कि उसके इस वोट में मेरा एक वोट भी शामिल था, जिसने उसे जिताया।

सुबह फटाफट काम किए
लीना ओझा वोटिंग को लेकर इतनी उत्सुक थीं कि सुबह जल्दी उठकर घर के सारे काम निपटा लिए। खाना भी बना लिया। तब उनके पति को उन्हें बताया कि आज हमारी छुट्टी है। तुम्हें इसलिए नहीं बताया कि फटाफट सारे काम कर लो, फिर साथ चलेंगे वोट डालने। आज का दिन किसी राष्ट्रीय पर्व से कम नहीं। वोट करके ही जागरुक नागरिक होने का परिचय दे सकते हैं।

आतंक का जबाव देने वाला नेता मिलेगा
रुचि गोयल अपनी फ्रैंड्स को लेकर दोपहर 12:00 बजे मतदान केन्द्र पहुंच र्गई। उन्होंने कहा वोट तो हर बार देते ही हैं, लेकिन मुंबई में हुए आतंकी घटनाओं ने इस बार झकझोर दिया। दूसरी महिलाओं को वोट करने के लिए प्रेरित किया। आतंक का जबाव देने वाले नेता तो ढूंढ़ने ही पड़ेंगे।

बेटे-बहू को वोट डलवाकर ही भेजा
वोट के मामले में पति को कहती हूं, आपके कहने से वोट नहीं देना। यहां अपनी पसंद ही चलेगी। 32 साल से वोट देते-देते वोट के महत्व को बखूबी समझती हूं। आज मेरे बेटे- बहू दिल्ली जा रहे थे। वे वोट करने के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था, वोट करने से क्या फायदा? अच्छे लोग तो राजनीति में आने से रहे। लेकिन मैंने उन्हें जिद करके रोका और वोट डलवाकर ही दिल्ली भेजा।

अच्छे नेता कम हैं पर..
अखिल भारतीय महिला मंडल की अध्यक्ष सौभाग बैद कहती हैं, अपनी पसंद की सरकार चुनने के लिए ही मताधिकार मिला है। आचार्य महाप्रज्ञ का कहना है, निष्पक्ष, ईमानदार, चरित्रवान नेता को वोट दो। ऐसे नेताओं की कमी है, पर वोट देना भी जरूरी है।

इंदिरा जैसा नेता चाहिए
मैना नाहदा का बाल विवाह हुआ था। घरवालों के कहे मुताबिक वोट दिया, पर वोट दिया जरूर। वे कहती हैं, एक बार कमर में बहुत दर्द था। कुर्सी पर बैठाकर वोट डालने के लिए ले जाया गया। सरिता डागा और विजया डागा इंदिरा गांधी की जबरदस्त फैन हैं। वे कहती हैं, इंदिरा जैसा नेता ही देश को चाहिए। तभी देश आतंकवाद का मुकाबला कर सकेगा। उनके जैसे लौह नेता हमें कब मिलेंगे?





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