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संकट के दौर में तीन भव्य फिल्में

परदे के पीछे. rab 12 दिसंबर को आदित्य चोपड़ा की शाहरुख खान अभिनीत ‘रब न बना दी जोड़ी,’ 24 दिसंबर को आमिर अभिनीत ‘गजनी’ और 21 जनवरी को अक्षय कुमार अभिनीत ‘चांदनी चौक टू चाइना’ पर फिल्म उद्योग का भविष्य टिका हुआ है।

विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के कारण लंदन स्टॉक पर ऊंचा खेल खेलने वाली फिल्म कंपनियों ने अब महंगे दामों में खरीदी बंद कर दी है अर्थात सुपर सितारों को 30 करोड़ रुपए प्रति फिल्म मिलना अब संभव नहीं है। विपुल शाह की फिल्म ‘लंदन ड्रीम्स’ के बारे में सगर्व कहा जाता था कि प्रदर्शन अधिकार 120 करोड़ रुपए में बिक रहे हैं, अब 60 करोड़ रुपए भी मिलना मुश्किल हो रहा है। इसी तरह सलमान अभिनीत फिल्म ‘वीर’ पर अब 80 करोड़ रुपए खर्च करना कठिन होगा।

मल्टीप्लैक्स में दर्शकों की गिरती हुई संख्या को अनदेखा करने वाले फिल्म उद्योग को मुंबई धमाकों के बाद के आंकड़ों ने हिलाकर रख दिया। आतंकवादी मल्टीप्लैक्स पर आक्रमण कर सकते हैं, इस भय के कारण मनोरंजन उद्योग के हाथों से तोते उड़ गए हैं। राष्ट्रीय संकट के समय मनोरंजन की किसे परवाह हो सकती है। भव्य फिल्मों के सैटेलाइट अधिकार ऊंचे दामों पर बिकते रहे हैं परंतु मंदी के कारण बड़ी कंपनियों के विज्ञापन बजट घटेंगे जिसका सीधा प्रभाव सैटेलाइट अधिकारों पर पड़ेगा।

कम टीआरपी पाने वाले सीरियल खारिज कर दिए जा रहे हैं और कुछ चैनल बंद भी हो सकते हैं। मुंबई आक्रमण के समय न्यूज चैनलों की टीआरपी 28 तक जा पहुंची थी। कुछ क्षेत्रों से यह चिंता जताई जा रही है कि आक्रमण का आंखों देखा हाल पाकिस्तान में बैठे मास्टर माइंड देखकर मोबाइल पर अपने साथियों को निर्देश दे रहे थे। हमारी राष्ट्रीय घबराहट और चिंता उनके घिनौने हृदय को सुख पहुंचा रही थी।

जनता को पूरा सच जानने का अधिकार है परंतु अगर यही माध्यम शत्रु के हाथ भी लग रहा था तो राष्ट्र की सुरक्षा के कारण इसे रोकना चाहिए था। दरअसल त्रासदी का तर्कसम्मत अध्ययन अभी होना बाकी है। कुछ गर्म दिमाग वालों की इच्छा थी कि उसी समय पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर भारतीय फौज को आक्रमण करना था। ऐसा सोचने वाले आर्थिक मंदी के दौर में युद्ध की कीमत को अनदेखा करते हैं और आज दुनिया के तमाम देश हमारे साथ हैं। युद्ध करने पर कई बातें बिगड़ सकती थीं। जोश आवश्यक है परंतु होश की कीमत पर नहीं। आतंकवादी शक्तियों को बहुत हताशा होती है जब उनकी अमानवीय हरकतों के बावजूद देश में सांप्रदायिक भाईचारा बना रहता है और यही देश की असली शक्ति है।

बहरहाल, फिल्म उद्योग अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। किफायती ढंग से बनी सार्थक फिल्में ही उसे बचा सकती हैं। विगत लगभग 100 वष्रो में फिल्म उद्योग पर इस तरह के संकट कई बार आए हैं और वह हर बार बच निकला है। इस बार भी बचेगा, इसमें कोई संदेह नहीं। मल्टीप्लैक्स मालिकों को टिकट दर कम करनी चाहिए और एकल ठाठिया को अधिक सहूलियतें पैदा करनी चाहिए। दरअसल मनोरंजन कर ही समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि व्यापक चोरी के बाद थोड़ा ही धन सरकारी खजाने में पहुंच पाता है।





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