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हाथ नहीं तो क्या, जज्बा तो है

रायपुर. amar विकृति के कारण दोनों हाथों के बगैर जन्म लिए अमर यादव (18) के दिल में पिता की उपेक्षा ने वह आग भर दी कि वह जीना सीख गया। अपने कपड़े भी खुद धोता है और फर्राटे से लूना भी चलाता है। इतना ही नहीं पैरों से कलम भी चलाना जानता है। सड़क पर उसे लूना चलाता देख लोग आश्चर्य से दांतों तले अंगुलियां दबा लेते हैं।

बनारस में जन्मा अमर बताता है कि उसकी पैदाइश पर शुरू में तो घर के लोगों की सहानुभूति मिली, लेकिन जैसे-जैसे बड़ा हुआ, पिता ने नाकारा समझकर उपेक्षा शुरू कर दी। तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़ा होने के बावजूद जब पिता का सहयोग मिलना बंद हो गया, तो 14 साल की उम्र में घर छोड़ना ही मुनासिब समझा। इतना जरूर था कि इस दौरान 5वीं तक की पढ़ाई कर ली और हाथ ना होने के बावजूद साइकिल चलाना सीख लिया। अमर बताता है कि चार साल पहले रायपुर आया और लगभग दो साल रेलवे स्टेशन पर भटका। उसके बाद कलिंग नगर गुढ़ियारी में किराए का मकान लेकर रहने लगा।

मकान का किराया है 600 रुपए महीना। आय का जरिया बनी भिक्षावृत्ति। सुबह 6 से 11 बजे तक स्टेशन के ओवरब्रिज में बैठकर भिक्षा मांगता है और इसके बाद दिनभर घर पर रहता है। शाम को किसी भी ट्रेन में बैठकर भाटापारा तक निकल जाता है। उसके बाद रात में लौटता है। इस दौरान लगभग 300 रुपए इकट्ठे हो जाते हैं।

साइकिल चलाना जानता था, इसलिए लूना खरीदने की इच्छा हुई। कुछ महीने पहले ही 2000 रुपए में सेकेंड हैंड लूना (क्रमांक एमपी 26-6914) खरीदी। शुरू में तो स्टेशन के साइकिल स्टैंड पर लूना रखने के लिए शुल्क देना पड़ता था, लेकिन अब कोई यह नहीं मांगता। सहानुभूति होने के कारण जीआरपी और आरपीएफ वाले भी मदद करते हैं। वह कहता है कि रुपए इकट्ठे कर खुद की एक किराना दुकान खोलना है, ताकि भीख न मांगना पड़े।





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