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नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने जालसाजी के मामले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार और मौजूदा अध्यक्ष शशांक मनोहर के खिलाफ कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देश पर शुरू की गई कार्रवाई पर अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी। इसके साथ ही मामले के 4 अन्य आरोपी बोर्ड के उपाध्यक्ष चिरायु अमीन, सचिव एन. श्रीनिवासन, पूर्व सचिव निरंजन शाह और वरिष्ठ पदाधिकारी रत्नाकर शेट्टी के खिलाफ कार्रवाई पर भी रोक लग गई।
मुख्य न्यायाधीश के जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम की पीठ ने शुक्रवार को प्रतिवादी जगमोहन डालमिया को निर्देश दिया कि वे इन पूर्व और मौजूदा बोर्ड अधिकारियों की याचिका पर अपना जवाब दायर करें।कलकत्ता उच्च न्यायालय ने झूठा हलफनामा दायर करने के मामले में पवार और 5 अन्य के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया था।
इन सब पर आरोप है कि उन्होंने पूर्व अध्यक्ष डालमिया के निष्कासन को जायज ठहराने के लिए झूठा हलफनामा दायर कर कोर्ट को गुमराह किया। डालमिया को 1996 के विश्व कप के कोष में हेराफेरी करने के आरोप में 16 दिसंबर 2006 को बीसीसीआई से निष्कासित कर दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों सालिसिटर जनरल जीई. वाहनवती, फॉलीएस. नरीमन, मुकुल रोहतगी, अभिषेक मनु सिंघवी और आर. नरीमन ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि उच्च न्यायालय ने उनके मुवक्किलों का पक्ष जाने बिना आदेश जारी कर दिया। यह जानने के लिए कोई जांच नहीं की गई कि क्या वास्तव में इनके खिलाफ पहली नजर में जालसाजी का मामला बनता है।
डालमिया के वकीलों के. वेणुगोपाल और अलताफ अहमद ने कहा कि उनके मुवक्किल को बीसीसीआई के जिस नियम के तहत निष्कासित किया गया, वे उनके निष्कासन के समय लागू ही नहीं था। उन्होंने कहा कि बीसीसीआई के नियमों में 29 सितंबर 2000 को किए गए इस संशोधन को 2007 में पंजीकृत कराया गया।
दूसरी ओर, बीसीसीआई के नियमों के अनुसार ही इस संशोधन को पंजीकृत कराने की समय सीमा 28 मार्च 2001 को खत्म हो चुकी थी। वेणुगोपाल ने कहा कि चूंकि यह संशोधन पहले ही निरस्त हो चुका था इसलिए इसके तहत डालमिया का निष्कासन लागू नहीं होता। इस बीच वेणुगोपाल ने डालमिया की ओर से नोटिस स्वीकार किया।