कहते हैं खुदा जब हुस्न देता है, तो नÊाकत आ ही जाती है।’ ईश्वर ने शिवराजसिंह चौहान को मध्यप्रदेश की सत्ता में स्पष्ट बहुमत, उमा भारती की छाया से मुक्ति और दिग्गजों की हार के साथ पूरा हुस्न दे दिया है।
केन्द्रीय नेतृत्व उनसे खुश है और सोच रहा है मंत्री-मंडल के गठन में उन्हें पूरी छूट दे दी जाए। यही समय है जब शिवराज सिंह चौहान को हुस्न के साथ नÊाकत दिखानी है।
अगले पांच वष्रो में प्रदेश की दशा और दिशा क्या होगी इसका बहुत कुछ दारोमदार नियुक्त किए गए मंत्रियों, उन्हें सौंपे गए विभागों और उनकी एक निश्चित तरीके से समीक्षा पर निर्भर करेगा। अफसरों की नियुक्ति में कार्य क्षमता, दक्षता और विकास के प्रति उनका पूरा कमिटमेंट ही पदस्थापनाओं का आधार होना चाहिए। राजनेताओं की पसंद और मंत्रियों से उनका समन्वय जरूरी है, परंतु सिर्फ पसंद के आधार पर की गई नियुक्तियां विकास की दिशा नहीं तय कर पाएंगी।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे ‘सीईओ’ की तरह काम करेंगे और यदि ऐसा है तो किसी भी ‘सीईओ’ के लिए यह जरूरी है कि उसकी टीम और खास तौर पर लीडरशिप टीम के पास वही सपना होना चाहिए जो ‘सीईओ’ के पास है। यदि इन दोनों के सपने एक हैं तो ही वह साकार हो सकेंगे, वरना फर्क होने पर वह सपने ही रह जायेंगे।
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह के पास मंत्री और अफसरों की लीडरशिप टीम कौन-सी होगी, अब यह सबसे अहम मुद्दा है। इन चुनावों में तीन बातें प्रमुखता से उभरी हैं। पहली यह कि मतदाता अब पूरी तरह विकास को प्राथमिकता देना चाहता है।
शीला दीक्षित बतौर व्यक्ति और साथ में पार्टी दोनों में ही दस साल दिल्ली में राज करने के बाद तीसरी बार भी सत्तासीन हैं, तो सिर्फ एक ही मुद्दे पर और वह है ‘विकास’। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा ने पहली बार पुन: सत्तारूढ़ होने का इतिहास रचा है, तो वह भी उसके विकास कार्यों या भविष्य के स्वर्णिम प्रदेश की जो दिशा लोगों को दिखाई गई है, उसी के आधार पर।
इससे स्पष्ट होता है कि विकास ही अब मतदाता की प्राथमिकता है। दूसरी बात, वर्र्षो से राजनीति में सक्रिय रहे दोनों ही पार्टियों (भाजपा और कांग्रेस) के बुजुर्ग नेताओं को कई सालों की जीत के बावजूद मतदाताओं ने इस बार नकार दिया। लिहाजा, यह भी एक संकेत है कि अब नए लोगों या काम करने वालों के लिए जगह बनानी होगी, सिर्फ पुरानी विरासत या पीढ़ियों के आधार पर आप टिके नहीं रह सकते।
तीसरी और महत्वपूर्ण बात, शायद तात्कालिक लहर या कम समय के लिये उठाए गए किसी मुद्दे पर मतदाता डांवाडोल नहीं हो रहा है। मुंबई में आतंकवाद को लेकर असमंजस था कि शहरी क्षेत्रों में भाजपा को फायदा होगा।
परंतु दिल्ली जो पूरी तरह शहरी है, वहां पढ़े-लिखे तबके का गुस्सा भी चरम पर था और सत्तासीन पार्टी एवं मुख्यमंत्री के दस वर्ष हो चुके थे। फिर भी मतदाताओं ने वहां स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आगामी पांच वर्षो के भविष्य का निर्णय है। ऐसे में किसी तात्कालिक लहर या मुद्दे को आधार नहीं बनाएंगे।
इन तीनों बातों के अलावा राजनेताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पांच साल बाद जो पीढ़ी मतदान के लिए खड़ी होगी उसके अपने विचार, अपनी सोच और अपनी आवाज होगी। हिंदुस्तान की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा युवाओं का है। पांच वर्ष बाद इनमें से एक बहुत बड़ा तबका वोटिंग के लिए तैयार होगा। अमेरिका के परिणामों ने दिखा दिया है कि युवा खुद को चुनाव से दूर नहीं, बल्कि प्रजातंत्र का हिस्सा बनाए रखा चाहता है।
युवा जानते हैं कि जिस देश में वे अपने भविष्य के सपने देख रहे हैं, उस देश के भविष्य के निर्माण की बागडोर भी सही हाथों में होनी चाहिए। पांच वर्षो बाद जब यह पीढ़ी मतदान करेगी, तब राजनेताओं को परखने और उन्हें आंकने के तरीके और मूल्य उनके अपने होंगे।
पैसे देकर जुटाई गई भीड़, ग्रामीण क्षेत्रों का ज्यादा मतदान या गरीबी रेखा से नीचे की आबादी के लोगों को गाड़ियों में ढोकर वोट डलवाने जैसी प्रथाएं भविष्य में बहुत ज्यादा लाभ नहीं दे सकेंगी।इन बातों को ध्यान में रखकर अगले पांच वष्रो का रास्ता शिवराज सिंह को तय करना है।
उन्हें एक ठोस आधार और नींव के साथ ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ लोगों को देना है, जिससे यह राज्य देश के सर्वश्रेष्ठ प्रदेशों की कतार में खड़ा हो सके। उम्मीद है, शिवराज सिंह चौहान प्रदेश की जनता से किए गए वादों और उनकी आंखों में पल रहे सपनों को पूरा करेंगे।