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धागों और कशीदों से बुनी कहानियां

जयपुर. परिधानों में बने मोटिफ हों, फूल-पत्ती, मोर, हाथी या अम्बियां, सबके पीछे छिपी है एक कहानी। इनमें से कुछ हम अपनी किताबों में पढ़ते हैं, यही कहानियां सुन रहे हैं जयपुराइट्स। सियाही की ओर से तीन दिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस, मैंटल्स ऑफ मिथ- द नेरेटिव इन इंडियन टेक्सटाइल शनिवार से होटल डिग्गी पैलेस में शुरू हुई। मोरारका फाउंडेशन की ओर से प्रेजेंट की गई यह कॉन्फ्रेंस काल्पनिक और प्राचीन कहानियों के इतिहास पर केंद्रित है।

परिधानों में कहानी कहने की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कॉन्फ्रेंस में देश-विदेश से लेखक, कवि, कथाकार, कलाकार, कला इतिहासकार, फैशन डिजाइनर और एक्सपर्ट्स भाग ले रहे हैं। कॉन्फ्रेंस के पहले दिन ‘मायथोलॉजी ऑफ द क्लोद’ सैशन में मायथोलॉजिस्ट देवदत्त पट्टनायक और हैंड पिंट्रिंग से जुड़े प्रमोद कुमार केजी ने भारतीय मिथ्यों और कहानियों पर चर्चा की। दूसरे सैशन में पैनलिस्ट जसलीन धमिजा और अल्का पांडे ने पंजाब की पुलकारी के माध्यम से वहां के लोक जीवन को व्यक्त करने की परम्परा के बारे में बात की।

प्राचीन परिधानों में आधुनिक कहानियां कहने की कला को प्रदर्शित करने के लिए मुकुंद और रिआज की लेखक, इलस्ट्रेटर और फिल्म मेकर नीना सबनानी ने इस बुक पर आधारित फिल्म दिखाई। इस फिल्म में ट्रेडिशनल टैक्सटाइल आर्ट को कंटैम्पररी कहानी के रूप में प्रेजेंट किया गया। भारत के उत्तर पूर्व राज्यों में परिधानों में कथा कहने की परम्परा पर जोर दिया जाता आया है। इस संस्कृति के अलग-अलग पहलुओं पर लेखक और कवि ममंग दाय ने तीसरे सैशन ‘वोवन नेरेटिव’ बात की। उन्होंने विभिन्न परिधानों में किए गए काम की कहानियों से रूबरू कराया। जैसे जिलंग(शॉल) पर मोर और जानवरों के होने के पीछे का कारण। उन्होंने बताया कि कहीं न कहीं यह सब किसी न किसी बात का प्रतीक है जैसे त्याग, वीरता, समृद्धि।

कलमकारी के जरिए महाकाव्यों को परिधानों पर चित्रों के माध्यम से कहने की प्राचीन परम्परा के संदर्भ में इंडियन आर्ट की प्रोफेसर एना डेलापिकोला ने विक्टोरिया और एलबर्ट म्यूजियम में सहेजे हुए परिधानों की चर्चा की। अंतिम सत्र ‘द ट्री ऑफ लाइफ’ में ट्रेडिशनल इंडियन टैक्सटाइल की एक्सपर्ट पाओला मनफ्रिदी ने इस मोटिफ के बारे में बताया। मशहूर नृत्यांगना मल्लिका साराभाई जो बेटे रेवांता के साथ इस समारोह में शिरकत करने आई हैं। उन्होंने बताया कि मैं भी इंडियन कल्चर और ट्रेडिशन को फॉलो करती आई हूं। यही सब बच्चों में भी पास ऑन हुआ है। स्टोरी टैलिंग को इस प्रॉसेस में सबसे जरूरी मानती हैं। 24वर्षीय रेवांता बताते हैं कि उन्हें इन ट्रेडिशनल कॉस्टयूम्स में भी ट्रेंड नजर आता है।

रविवार को कॉन्फ्रैंस के दूसरे दिन राजस्थान की पाबूजी के फड नामक वस्त्र परम्परा पर बात की जाएगी। जिसमें पाबूजी और देवनारायण के बहादुरी के किस्सों को कपड़ों पर पेंटिंग के बारे में श्रीलाल जोशी, कविता सिंह और विलियम डालरिंपल बताएंगे।

दर्पण म्युजिशियंस के साथ मिलकर ‘टैलिंग टेल्स’ नाम का स्पेशल डांस शो प्रेजेंट किया। भरतनाट्यम का प्रयोग करते हुए शो कलमकारी वस्त्रों पर आधारित रहा, जिसमें नृत्य का जादू कहानियों में बुना गया।

इंडियन क्राफ्ट का रिवाइवल सबसे जरूरी : डिजाइनर रितु कुमार
लगभग 20-30 साल के करियर में कई बदलाव देखे हैं। शुरुआत की थी ब्लॉक पिंट्रिंग से। आज इंडस्ट्री यंगस्टर्स को फोकस करते हुए ट्रेडिशनल के साथ मॉडर्न को जोड़ रही है। लेकिन साथ में जरूरत है हमारे कल्चर और क्राफ्ट को जिंदा रखना। मैंटल्स ऑफ मिथ में र्आई फैशन डिजाइनर रितु कुमार ने सिटी भास्कर को बताया कि जयपुर कल्चर में बहुत मजबूत है। इसके कारण यहां का क्राफ्ट हर जगह पहचाना जाता है, उसकी वैल्यू भी है।

रितु ने अपने प्रेजेंटेशन में ‘द ट्री ऑफ लाइफ’ मोटिफ पर एक फिल्म दिखाई जिसमें बंधेज, खादी, चिकन, पैसले चिंक्स और जरदोजी अपनी कहानियां कह रहे थे। उन्होंने बताया कि उन्हें हैंडलूम पसंद है और वे अपने कलैक्शन में इन परम्परागत क्राफ्ट को शामिल करती हैं क्योंकि वे इन्हें पूरी दुनिया के सामने जिंदा रखना चाहती हैं। इन्हें रिवाइव करने की जरूरत है। जयपुर में आई तो यहां का काम इतना पसंद आया कि अपने कलैक्शन को इससे सजाने की ठान ली। सबसे पहले साड़ी कलैक्शन प्रेजेंट किया जिसमें हैंडब्लॉक प्रिंटिंग मुख्य थी।

हैंडब्लॉक के बाद हैंड एम्ब्रॉयडरी पर काम किया। इंडियन क्राफ्ट की कोई लिमिट नहीं है। इसमें डिजाइनर्स के लिए बहुत कुछ है जिसे वे परिधानों के जरिए दुनिया को देश की परम्पराओं से रूबरू करा सकते हैं। फिल्हाल इंडिया के क्राफ्टमैन ऐसा कर रहे हैं। बगरु के प्रिंट भी रितु को आकर्षित कर रहे हैं।

अपने प्रेजेंटेशन में रितु ने ऑडियो-विजुअल के जरिए परिधानों की पारम्परिक दुनिया की यात्रा कराई। जिसके साथ एक मॉडल उनके बनाए परिधानों को जयपुराइट्स के समक्ष प्रस्तुत कर रही थीं। बस लोगों को एक बात की कमी लगी। जहां टैक्सटाइल फील्ड से जुड़े ऑडियंस रितु के एक्सपीरियंस को सुनने और नए ट्रैंड के बारे में जानने को बेकरार थे। वहीं रितु ने अपना प्रेजेंटेशन ऑडियो-विजुअल तक ही सीमित रखा।





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