इंदौर. मामला निगम की एक जमीन का है। जमीन भी ऐसी-वैसी नहीं, जंजीरवाला चौराहे के समीप करोड़ों रुपए की कीमत रखती है। जमीन शैक्षणिक उपयोग के लिए एक संस्था को मिली थी। उसने वहां स्कूल से मतलब निकलता नहीं देख दुकानें-ऑफिस बनाकर बेच दिए।
बात निगम से छुप नहीं पाई। इस वजह से लीज निरस्त कर दी गई। संस्था कोर्ट में गई लेकिन वहां उसे मुंह की खाना पड़ी। कोर्ट ने कहा इस मामले में निगम ही कोई निर्णय ले सकेगा। ये बात 2001 की है। उसके बाद से दो निगम परिषद बन चुकी हैं लेकिन अब तक निर्णय नहीं हो पाया। लोकायुक्त के दबाव के बाद निगम को निराकरण के लिए सोमवार को ताबड़तोड़ एमआईसी की बैठक बुलाना पड़ी।
जंजीरवाला चौराहा स्थित होटल अपना ऐवन्यू से लगी ९क्क् वर्गफीट जमीन १९८८ में तीस साल के लिए भूमिका एज्युकेशनल सोसायटी को शैक्षणिक उपयोग के लिए लीज पर दी थी। सोसायटी ने स्कूल-कॉलेज बनाने के बजाय जी+२ व्यावसायिक और रहवासी कॉम्पलेक्स बनाकर बेच दिया। शर्तो के उल्लंघन की शिकायत मिलते ही नगर निगम ने पहले अक्टूबर १९९८ में सोसायटी को दी लीज निरस्त कर दी। बाद में रिमूवल कार्रवाई शुरू कर दी। ऊपरी मंजिल पर तोड़फोड़ हुई भी लेकिन बाकी कब्जाधारियों के कोर्ट में जाने के कारण मामला अटक गया। लंबे समय तक हुई सुनवाई के बाद फैसला निगम के पक्ष में हुआ। कोर्ट ने सुनवाई करके निर्णय लेने का अधिकार नगर निगम को सौंप दिया।
कोर्ट के आदेशानुसार निर्णय के लिए २क्क्१ में तत्कालीन आयुक्त ने मामला एमआईसी में रखा था। सात सालों तक एमआईसी सोती रही और निर्णय नहीं हो पाया। दूसरी ओर शिकायत के आधार पर लोकायुक्त ने प्रकरण दर्ज करके जांच भी शुरू कर दी। इस संबंध में पूछताछ और निर्णय लेने के लिए महापौर डॉ. उमाशशि शर्मा को अक्टूबर में भोपाल भी तलब किया जा चुका है। दो महीने बाद सोमवार को एमआईसी की बैठक फिर होना है। इसमें सदस्यों की सहमति से निर्माण पर क्या कार्रवाई करना है इसका निर्णय लिया जाना है। मुद्दे पर २क्क्१ में पुनर्वास समिति प्रभारी और जनकार्य समिति प्रभारी की राय ली जा चुकी है।
क्या होगा फैसला?
>> 1998 में एमआईसी द्वारा लिए गए उस निर्णय को मान्य रखकर कब्जाधारियों को बेदखल करते हुए निर्माण तोड़ा जा सकता है जिसमें लीज निरस्त करके रिमूवल के आदेश जारी कर दिए गए थे।
>> गलती सोसायटी की है जिसने गलत निर्माण करके लोगों को बेच दिया। वर्षो से निर्माण पर छह लोगों का कब्जा है। मानवीय पहलू और इन तथ्यों के आधार पर दस्तावेजों में जमीन का उपयोग बदलते हुए कब्जाधारियों से दंडसहित 1998 से अब तक लीज राशि भरवाई जा सकती है।
यह अंदर की बात है!
>> जिस भूमिका एजुकेशनल सोसायटी के नाम से लीज जारी हुई थी उसकी सर्वेसर्वा भूमिका नेमा हैं जो हालिया विधानसभा चुनाव में इंदौर क्षेत्र-3 से भाजपा के उम्मीदवार रहे गोपीकृष्ण नेमा की बेटी हैं।
>> 1998 में कांग्रेस के बहुमत वाली निगम परिषद थी। महापौर थे मधुकर वर्मा। श्री नेमा के भाजपाई होने के कारण तत्कालीन एमआईसी सदस्यों को लीज निरस्त करके रिमूवल आदेश जारी करने के लिए सोचना नहीं पड़ा।
>> 1999 में निगम में भाजपा की बहुमत वाली परिषद बनी। कोर्ट के आदेशानुसार 2001 में जिन एमआईसी सदस्यों के सामने प्रकरण रखा गया वह श्री नेमा के पार्टी में महत्व को देखते हुए निर्णय नहीं ले पाए।
>> लोकायुक्त और शिकायतों के दबाव में सात साल बाद दोबारा एमआईसी में प्रकरण रखा गया लेकिन नगर निगम में परिषद भाजपा के बहुमत वाली है। ऐसे में निर्णय होगा यह कह पाना बहरहाल मुश्किल है।
>> प्रकरण के संबंध में जब श्री नेमा से बात की तो उन्होंने कहा मेरा और मेरी बेटी का निर्माण से कोई लेना-देना नहीं है। एमआईसी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।
निगम प्रशासन
फैसला एमआईसी में रखा है और सदस्यों को ही उस पर निर्णय लेने का अधिकार है।
-नीरज मंडलोई, नगर निगम आयुक्त
18 दिसंबर से पहले निर्णय लेना है
लोकायुक्त ने मुझे भी इस संबंध में भोपाल बुलया था। हमने उन्हें आश्वस्त कर दिया था कि 18 दिसंबर से पहले हर हाल में बिल्डिंग के संबंध में निर्णय लेकर उसकी जानकारी उन्हें दे देंगे। निर्णय एमआईसी के निर्णयानुसार होगा।
- डॉ. उमाशशि शर्मा, महापौर