इंदौर.
नन्हे हाथों में टोपी और मुखौटा, मुंह पर मुस्कान और लोगों से गुजारिश कि कोई उनकी सांताक्लॉज की टोपी-मुखौटा ले ले। क्रिसमस पर सांता सभी की इच्छा पूरी करते हैं वहीं सांता क्लॉज की टोपी बेचते ये बच्चे भी लोगों से कह रहे हैं कि टोपी खरीद लो, सांता तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी करेगा। लेकिन उनकी इच्छा सांता पूरी करेगा या नहीं ये उन्हें भी नहीं मालूम। वे तो सिर्फ टोपी बेचकर दो वक्त के खाने की जुगाड़ में लगे हुए हैं।
शहर में चौराहे-चौराहे पर इन दिनों सांताक्लॉज की टोपी बेचते कई बच्चे दिख जाएंगे। राजस्थान के सवाई माधोपुर और बूंदी से आए ये बच्चे अपने माता-पिता के साथ काम करने आए हैं क्योंकि उनके यहां पानी नहीं गिरने से कोई काम-धंधा नहीं है।
पलासिया चौराहे पर सांता का मुखौटा बेचते हुए 10 साल का कमलेश बीरबल सवाई माधोपुर से आया है। उसने कहा मैं पढ़ना चाहता हूं लेकिन पैसा नहीं इसलिए बापू यहां ले आए। दिनभर टोपी बेचता हूं, कुछ पैसा मिलता है और पूरे परिवार को खाना। 9 साल की मंजू कहती है तीन साल तक स्कूल गई लेकिन पैसा नहीं था इसलिए पढ़ना बंद कर दिया।
सांता की टोपी बेच रही हूं वो सबकी इच्छा पूरी करते हैं आप भी एक टोपी ले लो। लेकिन उससे पूछने पर कि तुम्हारी क्या इच्छा है, सांता से तुम कुछ नहीं मांगोगी। इस बात पर वह सिर्फ मुस्करा देती है। दिनेश मोरालाल कहता है गांव में पानी नहीं गिरा, खाने को कुछ नहीं मिलता था इसलिए मेरे बापू मुझे यहां ले आए। यहां दिनभर में कुछ टोपी बिकती हैं तो खाना मिल पाता है, लेकिन मैं चाहता हूं कि अमीर बनूं और कार में घूमूं।
परिजनों ने कहा
‘भास्कर’ ने जब छोटे बच्चों से पढ़ने-लिखने की उम्र में काम करवाने के बारे उनके माता-पिता से पूछा तो उन्होंने कहा हम क्या करें, हम तो पढ़ाना-लिखाना चाहते हैं लेकिन रुपया आड़े आ जाता है। सवाई माधोपुर का रामेश्वर कहता है दो वक्त की रोटी खाने को नहीं है क्या करें। इसलिए बच्चों से भी काम करवाते हैं ताकि परिवार का पेट भर सकें। बूंदी के महेशकुमार कहते हैं हमारे पास कोई साधन नहीं है। इसी गांव की ममता ने कहा दो पैसे की जुगाड़ कर रहे हैं लेकिन कई बार दिनभर में एक-दो टोपी ही बिक पाती है।