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रिश्तों में परिवार ने फिर हासिल किया अहम स्थान

madhuजिस समय मैं यह लिखने बैठी, उस समय नए साल के आगमन में बस कुछ ही घंटे शेष थे। फिर से एक नया साल आने वाला था। लोगों के एसएमएस मिलने शुरू हो गए थे जिनमें ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के साथ-साथ एक शब्द और बीच में फंसा हुआ था- ‘सेफ’ (सुरक्षित)। यानी जो संदेश मिल रहे थे वे इस प्रकार थे- हैप्पी एंड सेफ न्यू ईयर। मानो सुरक्षित रहना ही अपने आप में खुश रहने के बराबर होगा। ‘सुरक्षित’ और ‘शांतिपूर्ण’ ये शब्द इन दिनों हर शुभकामना संदेश में छाए हुए हैं। मजेदार और आश्चर्य की बात यह है कि आपके ऐसे मित्र भी अचानक बधाई संदेशों के रूप में प्रकट हो गए हैं जो समय के कोहरे में कहीं गुम-से हो गए थे। लंबे अंतराल के बाद उनके संदेश मिले हैं। दरअसल, अब लोग फिर से अपने आप को दूसरों से जोड़ने लगे हैं।

सुबह जब मैंने लोगों को बधाई देने का सिलसिला शुरू किया तो सभी से यही पूछा कि वे नए वर्ष का स्वागत कैसे करने जा रहे हैं? लगभग सभी का एक ही जवाब था कि वे घर पर रहेंगे। एक अच्छी बात यह नजर आई कि अधिकांश लोगों ने नव वर्ष की शाम अपने परिवार के सदस्यों और बेहद करीबी मित्रों के साथ ही गुजारने का फैसला किया। परिवार ने संबंधों के बीच अचानक एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया। ऐसा करने वाले केवल मेरे मित्र या रिश्तेदार ही नहीं थे। रेडियो पर चर्चा करने वाले रेडियो जॉकी भी यही चाहते थे कि काश, वे अपने घर पर अपने परिवार व बच्चों या माता-पिता के साथ ही नववर्ष की शाम बिता पाते। यह केवल 26 नवंबर की मुंबई घटना का ही असर नहीं था। मुंबई में जो हुआ, उसकी कड़वी यादें तो अब भी देश के लोगों विशेषकर मुंबईवासियों को कंपकंपा देती हंै। जिस एक अन्य घटना ने लोगों का मानस बदलने में भूमिका निभाई है, वह है आर्थिक सुस्ती जिसे लोग मंदी भी कह रहे हैं। अमेरिका में इसने कहर मचा दिया है। उसने लोगों को जिंदगी में अनिश्चितता के बारे में अहसास करवाया है। उसने भ्रम के जालों को साफ कर दिया है। लोगों के बीच की लक्ष्मणरेखा अब अप्रासंगिक हो गई है।

मुझे पक्का विश्वास है कि इस साल के नव-वर्ष के संकल्प बिल्कुल अलग हटकर रहे होंगे, केवल औपचारिक नहीं बल्कि दिल की गहराई से निकले हुए। अब तक के संकल्प ऐसे ही रहे हैं कि मुझे अपना वजन कम करना है, मुझे शराब छोड़नी है, मुझे और अधिक मेहनत करनी है, मुझे खूब पैसा बनाना है इत्यादि। शायद इस बार की सूची में इनके साथ कुछ और भी संकल्प जुड़े हांेगे जैसे, मुझे अपने बच्चों के साथ और अधिक समय व्यतीत करना चाहिए, मुझे अपने माता-पिता का ख्याल रखना चाहिए, मुझे हर पल की कीमत समझनी चाहिए क्याेंकि नहीं पता कि कौन-सा क्षण जीवन का आखिरी क्षण हो या फिर मुझे अब वह काम कर ही डालना चाहिए जो मैं करने की सोचता आया हूं, लेकिन उसे भविष्य पर टालता रहा हूं।

मुंबई में आतंकी हमलों के बाद मीडिया की रिपोर्टो में ‘घर’ शब्द सर्वव्यापी हो गया। लोगों को यह कहते सुना गया कि वे अब अपने घरों में भी सुरक्षित महसूस नहीं करते। अधिकांश लोगों ने इसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया। मैंने भी नया वर्ष घर पर अपने परिवार के सदस्यों के बीच ही मनाया। इनमें मेरी सात साल की पोती भी शामिल थी। आम तौर पर बहुत चहकने वाली मेरी वह पोती असामान्य रूप से शांत थी। निश्चित रूप से मुंबई की घटना का उस पर भी असर पड़ा था। जिस दिन यह आतंकी हमला हुआ था, उस दिन वह भी अपने मम्मी-पापा के साथ टेलीविजन के सामने बैठी रही। उसने महसूस किया कि कैसे आतंकवादी अब कहीं भी घुस सकते हैं। वह पूछती है, क्यों दुकानदार लोगों को बैग वगैरह दुकान के बाहर रखने की अनुमति देते हैं? यदि उसमें बम हुआ तो?

उसे अब यह भी पता चल चुका है कि उसके सारे सवालों के जवाब कहां मिल सकते हैं। वह गूगल की साइट पर जाकर मुंबई हमले की सारी सुर्खियों को पढ़ चुकी है। वह अब पहले से भी ज्यादा भयभीत है।





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