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.. कभी नाम तो लो

rajkumar keswani सिनेमा का माध्यम दिखने और दिखाने का है। जो दिखता है, वही बिकता है और वही पहचाना और पूजा जाता है। फिल्म में सितारों के नाम के साथ ही संगीत निर्देशक और गायक का नाम तो आ जाता है, लेकिन वे सैकड़ों म्यूजीशियन बेनामो-निशां रह जाते हैं, जो बजाते तो संगीतकार के नोटशन के हिसाब से हैं, मगर अंदाज होता है अपना-अपना।

अभी कुछ दिन पहले ही एक ऐसे सितारे का अस्त हुआ है, जिसने अपनी उंगलियों के कमाल से न जाने कितने गीतों में ऐसा जादू भरा है, जिसके असर से हम-आप, कल झूमे। आज भी झूमते हैं और कल आने वाले भी झूमते रहेंगे। अब टूट चुके इस तारे का नाम है बेस गिटारिस्ट टॉनी वाज़, जिसका निधन 29 जून को एक लंबी बीमारी के बाद दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में हुआ।

1971 में रिलीज़ हुई देवानंद की सुपर हिट फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के अत्यंत लोकप्रिय गीत ‘दम मारो दम’ के शुरू में बजने वाली बेस गिटार की आवाÊा अब भी आपके कानों में कई बार गूंजती होगी। ये टॉनी के हुनर का जादू है। फिल्म क़ुर्बानी में ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िंदगी में आए’ में झूमता-गाता गिटार भी उसी का है। संगीतकार आरडी बर्मन ने उन्हें एक होटल में बजाते हुए देखा और बस फ़ौरन अपने साथ पकड़कर ले गए। उसके बाद उनके लगभग हर गीत में टॉनी की गिटार जादू जगाते ही रही। फिल्म यादों की बारात का टाइटल सांग ‘यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे’ हो, जवानी दीवानी का ‘जाने-जां ढूंढ़ता फिर रहा’ हो या फिर कोई दूसरा गीत, टॉनी, आरडी बर्मन की टीम का एक अटूट हिस्सा बना रहा।

‘माचिस’, शायद टॉनी की आख़िरी फिल्म थी, जिसमें उसने संगीतकार विशाल भारद्वाज के लिए गिटार बजाई। वह भी बीमारी की हालत में। इसके बाद वह था, उसका अकेलापन था और साथ में था लक़वे और डायबिटीज़ से निढाल शरीर। एक दिन वो इन सारी मुसीबतों से आज़ाद हो गया। अलविदा! टॉनी, हम जानते हैं जब आप थे, आप जैसा कोई और नहीं था।

बेनाम सितारे

टॉनी जैसे अनेक कलाकार जब एक साथ, कभी 10, कभी 50, कभी 100 की तादाद में मिलकर बजाते हैं, तब उन सबका नाम मिटकर एक नाम में तब्दील हो जाता है- ऑरकेस्ट्रा। गीत के रिकॉर्ड, कैसेट, सीडी कवर या फिल्म के टाइटल्स में रह जाता है बस संगीतकार, गीतकार और गायक का नाम। जबकि इन बेनाम सितारों का योगदान किसी से कम नहीं होता। अब जैसे याद करें फिल्म ‘दस्तक’ (1970) के मदन मोहन के संगीत से सजे नशीले नग़मे। इस फिल्म का एक गीत है ‘बैयां ना धरो, ओ बलमा’ अब आप ग़ौर करें, सितार किस तरह लता की आवाज़ के साथ-साथ बेल की तरह लिपटी हुई चलती जाती है, और हमारे आगे एक हसीन मंज़र बनाती चली जाती है। ये उस्ताद रईस ख़ान की सितार का सर चढ़कर बोलता जादू है।

image रईस ख़ान साहब के ऐसे ही बाकमाल काम की सैकड़ों मिसालें 70 के दशक तक के फिल्मी गीतों में मौजूद हैं। इसके बाद वे पाकिस्तान जाकर बस गए। अब जैसे फिल्म ‘दस्तक’ का ही दूसरा गीत ‘हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह’, या फिर फिल्म ‘मेरे सनम’ (1965) का दिलकश नग़मा ‘जाइए, आप कहां जाएंगे’, ऐसा लगता है कि आपको किसी ने अचानक घर-द़फ्तर-सड़क से उठाकर काश्मीर की हसीन वादियों में खड़ा कर दिया है। यह शिवकुमार शर्मा के संतूर और उस्ताद रईस ख़ान की सितार की जुगलबंदी का कमाल है। संतूर के तारों की इठलाती हुई धुन Êारा को मद्धम होती है कि आशा भोंसले अपनी मदभरी आवाज़ में पूछती हैं ‘जाइए, आप कहां जाएंगे?’ इससे पहले कि आप कह सकें ‘कहीं नहीं जाएंगे’, तभी सितार आपकी ओर से यही जवाब दे बैठती है। जवाब से आल्हादित आशा फिर शब्द छोड़ सितार से स्वर-आलाप में बात करती हैं। संतूर इस मिलन से प्रसन्न होकर ख़ुश-ख़ुश ध्वनियां तरंगित करता है। ओपी नैयर की इस बेमिसाल धुन में इन दो वाद्यों और वादकों ने क्या जादू जगाया है।

शिवकुमार शर्मा और उनके जोड़ीदार बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया ने फिल्म संगीत की बहुत सेवा की है। शिवकुमार जी ने तो एक बार एसडी बर्मन के लिए फिल्म ‘गाइड’ में संतूर छोड़ तबला भी बजाया है। और क्या ख़ूब बजाया है। गीत था ‘पिया तोसे नैना लागे रे, नैना लागे रे’।

फिल्म ‘उजाला’ (1959) का गीत याद है? ‘ओ, मोरा नादान बालमा न जाने जी की बात’। क्या अद्भुत खेल है ढोलक का। लता की आवाज़ में ज़रा सी शोख़ी आई नहीं कि ढोलक पर अब्दुल करीम ख़ां की छेड़ शुरू हुई नहीं। पूरे गीत भर, यही मौज चलती रहती है। मैं इस गीत की रिकॉर्डिग के समय वहां मौजूद तो नहीं था, लेकिन न जाने क्यों यह गीत सुनते हुए एक दृश्य दिखाई देने लगता है, जिसमें लता जी ढोलक में पूरी तरह मस्ती में डूबे हुए अब्दुल करीम ख़ां की ओर बीच-बीच में देखकर मुस्कराती हुई दिखाई देती हैं।

एक और गीत है ‘तेरा तीर ओ बे-पीर दिल के आर-पार है, जाने किसकी जीत है ये जाने किसकी हार है’। फिल्म ‘शरारत’ (1958) के इस गीत को ज़रा सुन देखें। सरदार हज़ारा सिंह की गिटार पूरे गीत में ऐसी बजी है, मानो मस्त हवाओं में लहराती-झूमती किसी पेड़ की शाख़ें अपने संगीत से लता मंगेशकर के साथ संगत कर रही हों। क्या-क्या याद किया जाए और कितने नाम लिए जाएं। बहुत लंबी लिस्ट है। हो सके तो अब से गीत सुनते समय कोई साज़ अच्छा लगे, तो यह ज़रूर याद करें कि वह कोई गुमनाम सितारा है, जो बस सुनाई देता है। दिखाई नहीं देता।

रेग्यूलर म्यूजीशियंस के अलावा भी संगीत के बड़े-बड़े उस्तादों ने कभी-कभी अपने फ़न से गीतों को एक नया रंग दिया है। जैसे उस्ताद अली अकबर ख़ान साहब ने फिल्म ‘सीमा’ (1956) में शंकर-जयकिशन के लिए सरोद बजाया है- ‘सुनो छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी’ में। उस्ताद हलीम जाफ़र ख़ान ने फिल्म ‘कोहिनूर’ (1960) में ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ में सितार के तार छेड़े। फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’ (1963) के गीत के लिए तबला सम्राट पं. सामता प्रसाद को एसडी बर्मन साहब ने ख़ासतौर से बनारस से बुलवाया। ‘नाचे मन मोरा मगन तिग धा धीगी-धीगी’। उस्तादों के जादू को मैं क्या बयान करूं! आपने सुना भी है। और भी सुनिए।

और..

जाते-जाते एक और बात। फिल्मी गीतों के साथ यूं तो अनेकों यादें जुड़ी हैं, जीवन के ऊंच-नीच में हर व़क्त उनका साथ रहा है, मगर कुछ गीत ऐसे हैं जो सुनने में गंभीर हैं मगर बेसा़ख्ता हंसने पर मजबूर कर देते हैं। इसे कहते हैं एक टिकट में दो मजे।

फिल्म ‘लाल पत्थर’ (1971) का एक गीत है, ‘गीत गाता हूं मैं गुनगुनाता हूं मैं, मैंने हंसने का वादा किया था कभी, इसलिए अब सदा मुस्कराता हूं मैं।’ अब Êारा ग़ौर करें, महाशय ने हंसने का वादा किया है और सिर्फ़ मुस्करा रहे हैं, फिर भी अपनी ही प्रशस्ति में गीत गा रहे हैं, गोया वादा ही निभा दिया हो। इसी तरह एक और महान गीत। फिल्म ‘मेरे हुजूर’ (1968)। रफ़ी साहब की आवाज में गीत इस तरह शुरू होता है-

‘फ़लक पे जितने सितारे हैं वो भी शरमाएं ओ देने वाले मुझे इतनी जिंदगी दे दे यही सÊा है मेरी मौत ही न आए मुझे किसी को चैन मिले मुझको बेकली दे दे।’

अब आप जरा मौसूफ़ की स्टाइल देखिए। यही सजा है मेरी मौत हो न आए मुझे? वाह! भाई साहब सÊा की आड़ में अमर होने का वरदान मांग रहे हैं। इसीलिए कहता हूं, फिल्मी गीतों में सब कुछ मिलता है! आप क्या कहते हैं?





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