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एक था शेख़ मुख्तार

rajkumar keswani इन दिनों पाकिस्तान में महेश भट्ट की फिल्म ‘आवारापन’ को लेकर हल्ला मचा हुआ है। एक पाकिस्तानी फिल्म निर्माता यूनुस मलिक ने अदालत में शिकायत की है कि सरकार ने क़ानून तोड़कर एक हिंदुस्तानी फिल्म को रिलीज करने की इजाजत दी है। याद रहे कि 1965 से वहां भारतीय फिल्मों के रिलीज पर पाबंदी लगी हुई है। यह ख़बर पढ़ते ही मुझे बेसा़ख्ता एक भूले-बिसरे कलाकार की याद आ गई- शेख़ मु़ख्तार की, जिसकी फिल्म ‘नूरजहां’ इसी तरह पाकिस्तान में विवादों में फंसी और पाकिस्तान के तानाशाह जिया-उल-हक़ की मदद के बावजूद, उनके मरने के बाद ही रिलीज हो पाई। तब भी एक फिल्म निर्माता ने अदालत में केस लगा दिया था। हिंदुस्तान में बुरी तरह फ्लॉप ‘नूरजहां’ 1980 में पाकिस्तान की सबसे बड़ी हिट साबित हुई।

sheikh maquhtar शेख़ मु़ख्तार के बारे में एक बार शाहरुख़ ख़ान ने कहा था, ‘हम आज के हीरो अगर उनके सामने खड़े होते तो गुड्डों जैसे ही लगते। मैं उन्हें दारा सिंह से पहले के दौर का ओरिजिनल एक्शन हीरो मानता हूं।’ शेख़ मु़ख्तार एकदम पहला एक्शन हीरो भले न हो, लेकिन बंबई की फिल्मी दुनिया का पहला और असली ‘मिस्टर लंबू’ Êारूर है। अंदाजन साढ़े छह फुट का लहीम-शहीम आदमी, मुंहासों से खुरदरा हो चुका चेहरा और अक्खड़ जबान लेकर भी यक़ीन जानिए, वह फिल्मों में हीरो बनकर आया था। फिल्मों में इनको पहला मौक़ा दिया ‘मदर इंडिया’ (1957) जैसी महान फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक महबूब ख़ान ने 1939 में अपनी फिल्म ‘एक ही रास्ता’ में। इस फिल्म में उनके साथ दो और नायक थे, गोविंदा के पिता अरुण आहुजा और हरीश।

इस फिल्म के बाद वह अनेक फिल्मों में बतौर हीरो ही आते रहे। फिल्म ‘बाबर’ में बाबर, ‘चंगेÊा ख़ान’ में चंगेज ख़ान की भूमिकाओं में वह ख़ूब जमे। उनकी फिल्मों के नाम से ही आपको अंदाज हो जाएगा कि वह किस तरह की फिल्मों में काम करते थे। ‘दादा’, ‘मंगू’, ‘उस्ताद प्रेडो’, ‘मिस्टर लंबू’, ‘उस्तादों के उस्ताद’, ‘दो उस्ताद’, ‘क़ैदी नंबर 911’ वग़ैरा-वग़ैरा।

फिल्म ‘दो उस्ताद’ (1959) में उन्होंने राज कपूर के बड़े भाई का रोल किया था। दोनों भाई बचपन में बिछड़ जाते हैं और जवान होकर मिलते हैं, मगर एक-दूसरे को नहीं पहचानते। इस फिल्म में एक दृश्य है, जिसे देखकर आपको बरबस फिल्म ‘दीवार’ (1975) के एक दृश्य की याद आ जाएगी, जिसमें अमिताभ बच्चन भगवान के सामने खड़ा होकर उलाहना देता है, ‘तुम ख़ुश तो बहुत होगे आज..’। शेख़ मु़ख्तार, अमिताभ बच्चन नहीं थे, सो संवाद भी उन्हीं की स्टाइल में थे। सलीम-जावेद के संवाद में भगवान को डांट भी पड़ती है और माफ़ी भी मांगी जाती है। अहसन रिजवी के च्दो उस्तादज् वाले संवादों में शेख़ मु़ख्तार भगवान को पहले उलाहना और फिर धमकी देता है; ‘भगवान! तू याद रख। मेरे इंतक़ाम की आग कभी नहीं बुझेगी अगर मेरी बीवी कल सुबह तक घर वापस न आ गई, तो मैं तेरे हर ख़ूबसूरत खिलौने को तोड़ दूंगा।’ पब्लिक ख़ुश। ठहाके और तालियां। दीवार से पूरे 16 साल पहले।

शेख़ मु़ख्तार की लंबाई और ख़ुर्राट चेहरे का इस्तेमाल एक अलग तरह से कॉमेडी के लिए भी लेखकों और निर्देशकों ने किया है। उनके साथ हास्य अभिनेता मुक़री की जोड़ी बनाकर छोटू-लंबू की तरह पेश किया। फिल्मों में थोड़ा पैसा कमाने के फ़ौरन बाद ही शेख़ मु़ख्तार ने फिल्म निर्माण का काम भी शुरू कर दिया था। कुछ फिल्में कामयाब हुईं और कुछ नाकाम, लेकिन उनकी आख़िरी फिल्म ‘नूरजहां’ ने उनका पूरी तरह भट्ठा बिठा दिया। प्रदीप कुमार, मीना कुमारी, सोहराब मोदी को लेकर बनाई इस फिल्म में वह ख़ुद भी थे। उन्होंने शेर अफगन का रोल किया था। मुग़ल काल के महलों, ग़लीचों, जेवरों पर ‘मुग़ल-ए-आजम’ की तरह पैसा पानी की तरह बहाया था। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने ऐसा दम तोड़ा कि पानी तक नहीं मांगा।

फिल्म का फ्लॉप होना उस दौर में क़हर की तरह था, जिससे बच निकलना बड़ा मुश्किल काम था। कई सारे लोगों ने अपनी जान देकर ही इस मुसीबत से निजात पाई। शेख़ मु़ख्तार भी कद्रदारों के तकादों और रोज-रोज के झगड़ों से घबराकर एक रात चुपचाप फिल्म ‘नूरजहां’ के कुछ प्रिंट लेकर पाकिस्तान भाग गए। जिया-उल-हक़, सोहराब मोदी के जबर्दस्त फैन थे। शेख़ मु़ख्तार ने जब उन्हें बताया कि उनकी फिल्म में सोहराब मोदी भी हैं, तो उन्होंने फिल्म रिलीज करने की इजाÊात दे दी। एक नाराज फिल्म निर्माता ने लाहौर हाई कोर्ट में इसके ख़िलाफ़ गुहार की। मामला घिसटते-घिसटते आख़िर शेख़ मु़ख्तार के हक़ में तय हो गया। 11 मई 1980 को मुक़दमा जीतकर जब वह लाहौर से फ्लाइट लेकर कराची की ओर रवाना हुए, तो उड़ान के दौरान ही उनके सीने में दर्द उठा। घर तक पहुंचते-पहुंचते हालत काफ़ी बिगड़ चुकी थी। उनके बेटे मुईनुद्दीन पहले तो डॉक्टरों को घर बुलाने की कोशिश करते रहे, मगर जब कोई नहीं आया, तो उन्हें एंबुलेंस से अस्पताल ले जाया गया, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों के न आने को लेकर अनेक कहानियां हैं, जिनका कोई सबूत नहीं है। शेख़ मु़ख्तार की मौत के दसवें दिन 23 मई को ‘नूरजहां’ पाकिस्तान में रिलीज हो गई। उस दौर में जबर्दस्त हिट फिल्म साबित हुई, मगर शेख़ मु़ख्तार यह सब देखने के लिए मौजूद नहीं थे।

image हाय! ग़रीबी

पत्रकार होने और बहुत सारे अख़बार पढ़ने का नुक़सान यह होता है कि बहुत सारी बातें पता लगती हैं। इनमें कुछ ख़बरें बहुत विचलित भी करती हैं। ऐसी हालत में जी चाहता है कि इन मुद्दों पर किसी से बात की जाए। तो चलिए आपस में ही बात कर लेते हैं। यह तस्वीर देख रहे हैं आप? इस तस्वीर ने एक अरसे से मुझे विचलित कर रखा है। इसे देखकर यक़ीन हो जाता है कि ग़रीब के जीने की जिद बहुत कमाल की होती है। वे जीने के नायाब तरीक़े ईजाद कर लेते हैं। अब आप जरा पश्चिम बंगाल के सुंदरवन इलाक़े के एक गांव पाकुरतला के गोपाल हल्दार को ही देखिए। मानव कंकाल जैसे दिखने वाले इस इंसान का जन्म एक ग़रीब मां के पेट से हुआ, जहां रोटी कम भूख Êयादा थी। वह फिर भी पैदा हो गया। पर कैसा पैदा हुआ? आज 50 की उम्र पार कर चुके गोपाल का क़द है लगभग 4 फुट और वजन 24 किलो। जीने का कोई और Êारिया था नहीं, सो अपने कंकालनुमा शरीर पर रंग पोतकर निकल पड़ता है लोगों का मनोरंजन करने और पैसा कमाने। लोग उसे भूत-भूत कहकर छेड़ते हैं। हंसते हैं। वह बुरा नहीं मानता। जब हमारी सरकार बुरा नहीं मानती, तो फिर गोपाल बुरा क्यों माने। उसे तो जीना है। सो वह जीता है।

और..

पाठक और संपादक का रिश्ता, कमाल का रिश्ता है। दोनों एक-दूसरे पर चौकस नÊार रखते हैं। पाठक इसलिए कि उसकी अपेक्षाएं पूरी हो रही हैं कि नहीं और संपादक इसलिए कि वह उनकी अपेक्षाओं को ठीक से समझ पा रहा है कि नहीं। जहां संपादक ने कुछ Êारा सा अच्छा किया नहीं कि पाठक ने उसे अपनी प्रशंसा से पूरी तरह भिगोया नहीं। यह बड़े आल्हाद के क्षण होते हैं।

दूसरी स्थिति भी कम आनंददायी नहीं होती। एक बार एक पाठक ने जिन्हें लिखने का भी शौक़ था, एक संपादक को अपनी एक साल पहले अस्वीकृत हो चुकी रचना को दोबारा भेज दिया। साथ में ईमानदारी से इस बात का उल्लेख भी कर दिया।

इस बात से खिन्न संपादक ने रचना फिर से लौटा दी और साथ ही यह नोट भी भेजा कि अस्वीकृत रचना दोबारा क्यों भेजी। पाठक ने बिना विचलित हुए उत्तर लिख भेजा- ‘मैं देखना चाहता था कि इस एक साल में आप अपना काम कुछ बेहतर तरीक़े से करना सीखे या नहीं।’ चलिए, बातें तो हो गईं। अब आप हम वापस अपने-अपने काम पर लगें।





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