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दीवार-ए-कहकहा

इस दुनिया में एक ऐसी दीवार भी है, जिसको देखने वाला खिलखिलाकर हंसने लगता है। एक मिनट..आप मेरा चेहरा देखना चाहते हैं कि मैं खुद हंस रहा हूं क्या? अरे हां! इसमें छिपाने की क्या बात है। हंस रहा हूं। मैंने अगर दीवार नहीं देखी, तो मैं हंसूंगा ही नहीं क्या? मुझे तो इस विचार भर से हंसी आ जाती है। मगर मैं फिर से कह रहा हूं कि मैंने किसी फ़साने में या किसी और जगह यह पढ़ा है कि चीन में कहीं एक ऐसी दीवार है, जिसे फ़ारसी में ‘दीवार-ए-कहकहा’ नाम दिया गया है। अब अगर किसी ने सिर्फ अपने ख़याली घोड़े दौड़ाकर यह बात गढ़ दी है, तो यह मेरी Êिाम्मेदारी नहीं। मैंने तो जो पढ़ा, वो आपको सुना दिया। हम लोग बचपन में भी खेल खेलते व़क्त यह कह देते थे,

‘लगे-लगे ख़ूनों की धार / अपन नहीं हैं ज़िम्मेदार।’

इस सिलसिले में मैं एक चीज और बता दूं। मैं कुछ साल पहले चीन भी गया था। चीन की बड़ी दीवार, जिसे ‘द ग्रेट वाल ऑफ चाइना’ कहा जाता है, वहां भी गया था। वहां पर दो-चार मर्तबा हंसी तो आई, मगर वो दीवार की बजाय अपनी हालत पर थी। एक तो दीवार पर चढ़ते-चढ़ते हांफ रहा था और साथ ही डर भी लग रहा था कि कहीं मैंने ‘दीवार-ए-कहकहा’ वाला सवाल किया, तो उसे सुनकर लोग तो लोग, कहीं सारी दीवार ही न हंसने लगे और मैं हंसी से हिलती-डुलती दीवार पे संतुलन खोकर नीचे लुढ़क जाऊं। सो, चुपचाप अपने मन में ही लड्डू फोड़ता रहा।

अब मेरी बात सुनकर आप यह न सोचें कि मैंने कोरी गप मार दी। अपनी बात के समर्थन में मैं एक शेर पेश कर सकता हूं। बस, यह मत पूछिएगा कि यह शेर किसका है। सचमुच मुझे नहीं मालूम। आप में से कोई ज़रूर जानता होगा। आप मुझे बता दें, तो सब तक बात पहुंच जाएगी। बाकायदा आपके नाम के साथ। ख़ैर। तो मुलाहिज़ा फरमाइए-

दीदार दिलरुबा का दीवारे कहकहा है जिसने उधर को झांका, वह फिर इधर न झांका

ज्यादा बोलने का नुकसान देखा आपने। असली बात तो भूल ही रहा था। असल में, मैं कहना यह चाह रहा था कि ऐसी कोई दीवार हो कि न हो, मुझे तो हिंदुस्तानी सिनेमा ही दीवार-ए-कहकहा जैसा लगता है। जब सिर्फ दीवार देखता हूं, तो खूब हंसी आती है और उसके पीछे देखता हूं, तो बस आंसू निकल पड़ते हैं। खैर, इस व़क्त आंसू की बात नहीं, सिर्फ कहकहा।

इस समय मुझे असल में एक किस्सा याद आ गया। वाडिया ब्रदर्स का किस्सा। या कहूं उनके बहाने एक किस्सा याद आ गया। आपको याद आए कि नहीं वाडिया ब्रदर्स? वही स्टंट फिल्मों के बादशाह। वाडिया मूवीटोन के मालिक जमशेद बोमन वाडिया और उनके छोटे भाई होमी बोमन वाडिया। वाडिया परिवार शिप बिल्डर्स का परिवार था। बड़े भाई जे.बी.एच. वाडिया फिल्मों में आने से पहले वकालत की डिग्री ले चुके थे। मगर उन्हें बचपन से ही फिल्मों का ऐसा चस्का था कि 1926 में जब उनकी उम्र 25 साल थी, उन्होंने सब कुछ छोड़कर फिल्में बनाने का फैसला कर लिया। उस समय उन्हें फिल्म बनाने का कोई ज्ञान न था, सो उन्होंने उस गूंगे सिनेमा के दौर के मशहूर निर्देशक होमी मास्टर (होमी वाडिया नहीं। इस समय तक वे स्कूल में थे) की शूटिंग्स में जा-जाकर इस काम को देखना और सीखना शुरू किया।

एक दिन जे.बी.एच. ने सेट पर देखा कि होमी मास्टर और उनकी फिल्म के हीरो के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया है। झगड़ा इतना ़ज्यादा बढ़ गया कि बीच-बचाव की नौबत आ गई। क्रोध में हीरो ने होमी मास्टर के साथ काम न करने का ऐलान कर दिया और शूटिंग छोड़कर चल दिया। सेट पर सन्नाटा छा गया। होमी मास्टर भी हार मानने को तैयार न था। थोड़ी देर के सोच के बाद उन्होंने फरमाया कि एक कुत्ते को शूटिंग के लिए लाया जाए। उन्होंने बैठे-बैठे स्क्रीन-प्ले में फेर-बदल कर डाला था। अब एक दृश्य जोड़ा गया, जिसमें एक जादूगर अपने जादू की ताकत से हीरो को कुत्ता बना देता है।

कुत्ता लाया गया। शूटिंग शुरू हुई। अब बेचारी हीरोइन के लिए हीरो की जगह कुत्ता था, जिसे वह प्रेमी की तरह गले लगाती और प्यार करती। इधर शूटिंग चलती रही और चटखारेदार खबरें बनती रहीं और उधर बेचारा हीरो अपनी जगह कुत्ते को लिए जाने की खबर से इतना विचलित हो गया कि उसने सुलह-सफाई कर ली। वह शूटिंग पर लौट आया। होमी मास्टर ने एक दृश्य बनाया, जिसमें जादूगर कुत्ते को वापस उसके असली रूप में ले आता है और हीरोइन से उसका मिलन हो जाता है। फिल्म की रिलीÊा पर इस कुत्ते वाले सीक्वेंस को पब्लिक से ज़बर्दस्त दाद मिली।

image अब बताइए, क्या कहा जाए? हमारी पब्लिक दा कोई ज्वाब नहीं। मुझे लगता रहता है कि होमी मास्टर आज भी ज़िंदा है। वो फिल्म से टीवी में भले आ गया हो। उसका रूप भले बदल गया हो। उसका नाम भले ही एकता कपूर हो गया हो। मगर मुझे लगता है कि होमी मास्टर आज भी ज़िंदा है। जरा सोच कर देखें ना।

वाडिया और नाडिया

बात वाडिया ब्रदर्स की हो और नाडिया का नाम न आए, यह तो हो ही नहीं सकता। सो, जो हो नहीं सकता, उसे क्या करना। बात ही कर लेते हैं। बचपन में सेकड़ों स्टंट फिल्में देखी होंगी। इनमें से ढेर सारी फिल्में तो वाडिया बंधुओं की ही होती थीं। इन फिल्मों में तलवारबाज़ी, मार-धाड़, उड़ता हुआ घोड़ा, चलती-फिरती दीवारें, परियां, जिन, मतलब सब चमत्कार ही चमत्कार होता था। उस उम्र में बड़ा मजा आता था (सच कहूं, तो अब भी आता है)। महीपाल, आज़ाद, दारा सिंह, हबीब पहाड़ी, रंजन, चित्रा, इंदिरा बिल्ली, सबकी फिल्में देखीं। मगर हाय री किस्मत, नाडिया की फिल्म देखने का सौभाग्य मिला, तो इस उम्र में जाकर। वह भी कुल मिलाकर दो फिल्में : ‘मिस फ्रंटियर मेल’ और ‘जंगल प्रिंसेस’। उसकी सबसे मशहूर फिल्म ‘हंटरवाली’ अब तक नहीं देखी है। मगर यकीन है, किसी दिन ज़रूर देख पाऊंगा।

तो साहब नाडिया, जिसका असली नाम मेरी इवानस था, का जन्म 8 जनवरी 1908 में ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में हुआ था। पिता हर्बर्ट, ब्रिटिश सेना में थे, सो 1912 में बंबई में पदस्थ किया गया, तो परिवार भी साथ आ गया। मेरी, जो उस समय 4 साल की थी, आई तो यहीं की होकर रह गई। उसके फिल्मों में आने की कहानी तो लंबी है, मगर इतना बता सकता हूं कि जे.बी.एच. वाडिया ने हॉलीवुड के मशहूर एक्शन हीरो डगलस फैयरबैंकस की फिल्मों से प्रेरित होकर नाडिया को 1935 में उसी तरह की फिल्मों के ‘लेडी वर्शन’ में ‘हंटरवाली’ बनाकर पेश किया। वे अपनी फिल्मों की पटकथा भी अक्सर खुद ही लिखते थे, सो उसमें पूरा देसी पुट होता। ‘मिस फ्रंटियर मेल’ (1936), ‘हरीकेन हंसा’ (1937), ‘पंजाब मेल’ (1939), ‘डायमंड क्वीन’ (1940), ‘बंबईवाली’ (1941), ‘जंगल प्रिंसेस’ (1942) हो या फिर ‘हंटरवाली की बेटी’ (1943), वह होती एक तरफ और दूसरी तरफ होते समाज के दुश्मन, ग़रीबों को सताते, देशद्रोह में लगे खलनायक।

उस दौर की कल्पना करें, जब हमारे समाज में औरत को पर्दे की आड़ में छुपाकर रखा जा रहा था, उस समय दस-दस मर्दो पर घूंसे बरसाती, भारी पड़ती नाडिया। रेलगाड़ी से तेज़ भागती नाडिया। घोड़े को बिजली-सा दौड़ाती नाडिया। यहां-वहां छतों पर से कूदती-फांदती नाडिया। कसरत करती नाडिया। जो उस दौर में महिला शक्ति की प्रतीक बन गई। जिसका नाम ही पड़ गया, ‘फीयरलेस नाडिया’। जिसके नाम पर 30 और 40 के दशक में लाखों दर्शक सिनेमा की टिकट खिड़की पर जमा हो जाते। जिसके हर एक्शन पर, जिसके हर कदम पर नाडिया का ‘हे,ए,ए’, ‘हे,ए,ए’ का नाद होता, सिनेमा हाल तालियों से गूंज उठता। फ्रंट बेंच के वीर कुर्सियों से कूद-कूद जाते। ऐसी थी नाडिया। नाडिया की अधिकांश फिल्मों के निर्देशक थे जे.बी.एच. वाडिया के छोटे भाई होमी वाडिया। साथ काम करते-करते दोनों का प्रेम ऐसा परवान चढ़ा कि शादी कर जीवन साथी बन गए। उसकी अधिकांश फिल्मों के नायक थे जान कावस। नाडिया की आखिरी फिल्म थी 1968 में रिलीÊा हुई, ‘खिलाड़ी’। 1993 में उनके जीवन पर एक फिल्म बनी ‘फीयरलेस- द हंटरवाली स्टोरी’। उन पर एक जर्मन महिला डोरोथी ने एक पुस्तक भी लिखी है ‘फीयरलेस नाडिया’। 9 जनवरी, 1996 में नाडिया ने इस दुनिया-ए-फानी को अलविदा कहा। हम क्या कहें? ‘वाह, नाडिया, वाह!’

और..

अगर कोई, एक पहेली बनाकर आप से पूछे, दारा सिंह और शमशाद बेगम का आपस में क्या संबंध है, तो आप बिना झिझक जवाब दें। क्या जवाब दें? बताता हूं न। कहिए कि शमशाद बेगम साहिबा ने दारा सिंह के लिए एक फिल्म में गीत गाया है। निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की 1965 में रिलीÊा हुई फिल्म ‘लुटेरा’ में दारा सिंह एक समुद्री जहाज़ पर औरत के भेस में गीत गाते हैं- ‘पतली कमर, नाज़ुक उमर, अरे, हट मुए मुझे लग जाएगी नज़र’। यही बात उस दौर के चॉकलेटी हीरो विश्वजीत पर भी उसी तरह लागू होती है। 1968 की फिल्म ‘किस्मत’ का मशहूर गीत ‘कजरा मोहब्बत वाला’ का शमशाद बेगम वाला हिस्सा विश्वजीत पर और आशा भोंसले वाला हिस्सा बबिता पर फिल्माया गया था। विश्वजीत उस समय औरत के भेस में थे। अब कोई और चाहे जितने भेस बदले, मगर अपना तो एक ही भेस है। सो, अगली बार भी इसी भेस में होंगे हम आप साथ। करेंगे फिर आपस की बात। नमस्कार।





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