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खिजां का डर बहार को, फिजा की आंख में पानी

देख हमारे माथे पर दश्त-ए-तालाब की धूल मियां

हमसे अजब तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियां

चांद छुपा है दिल्ली में और चंडीगढ़ में फिजा ने रो-रोकर बुरा हाल किया है। उनके मियां ने दिल्ली से खबर भिजवाई है कि वे फिजा से उतना ही प्यार करते हैं, जितना दस दिन पहले करते थे। पत्नी सीमा से भी वो उतना ही प्यार करते हैं जितना फिजा से। प्यार का समंदर है हमारा चांद। फरहाद ने नहर खोद डाली थी इक शीरीं के लिए, ये उनसे भी ऊपर निकले।

फिजां बेचारी बूझ नहीं पा रहीं कि किस संत का सान्निध्य उनके भाग्य में लिखा था। सान्निध्य थोड़े दिन का सही पर भजनपुत्र के साथ कीर्तन करने का संयोग तो हुआ। योग हुआ और वियोग भी। धर्म बदलने से विवाह आसान हो गया, तो तलाक भी आसान है। जब राह आसानी की ली है तो तीन बार तलाक बोलकर चांद अपने पुराने आंगन में उग आएंगे। इब्ने इंशा कह गए : सुन लिया एक नार की खातिर, काटा कोह निकाली नहर; एक जरा से किस्से को अब देते हो क्यों तूल मियां!

फिजा कहां नेत्री बनने का सपना संजोए अभिनेत्री की तरह बन-ठनकर इठला रही थीं, बल्कि अपने डायलॉग भी रट रही थीं। आखिर चंद्रमोहन ने प्यार को एक पड़ाव दिया था। पता नहीं था कि ये मंजिल नहीं थी प्यार की। पड़ाव में ठहराव होता है, पर उसे बसेरा बना लेने को किसने कहा था। चांद का दिल दरिया है और मन समंदर। आप आए तो आपको भी एक लोटा पानी मिल गया। अब खारापन तो समंदर की पहचान है। मुंह बनाने से समंदर गंगा नहीं होगा। सीमा के पास वापस न जाए तो भी समंदर किसी का नहीं हुआ।

कहते हैं आपके पास ऐसे जंतर थे कि उसे अपना बना लिया, वरना नेता तो प्यार बांटते फिरते हैं। कुछ तो था जंतर कि चंद्रमोहन आपके लिए चांद मोहम्मद हो गए। पहाड़ न काटा हो, नहर न निकाली हो, पर रास्ता तो निकाला ही। कहां सब उनको मुहब्बत का मसीहा मानने लगे थे। ‘प्यार किया तो डरना क्या’ मुगल-ए-आजम के बाद आप दोनों की जोड़ी पर सबसे ज्यादा फबा। बकौल इब्ने इंशा : यह तो कहो कभी इश्क किया है, जग में हुए हो रुस्वा भी; इसके सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाकी बात फिजूल मियां!

किसी ने आपके फसाने पर फिल्म बनाने की घोषणा कर दी। लेकिन कहानी का ट्विस्ट देखिए कि पिक्चर का दी एंड हो गया। पैक-अप हो गया तो उठिए और लौटिए घर। गोलियां लेकर लोटने से क्या होगा? मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए ठीक है, पर सच्ची कहानियों में क्या रखा है। लैला और मजनूं की शादी नहीं हुई थी। न ही फरहाद की। उनका कुछ सामान रह गया था आपके पास सो मिल गया और निकल लिए। थोड़ी रुसवाई होगी दोनों की पर मेहनत वसूल हो गई। आगे का शेर है : अब तो हमें मंजूर है ये भी शहर से निकलें रुसवा हो; तुझको देखा बातें कर लीं, मेहनत हुई वसूल मियां!

चंद्र मोहन ने तो कह ही दिया है कि फिजा के आगे जहां और भी हैं, अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं। आपके लिए भी बहुत कुछ है सीखने को, जो लॉ स्कूल में नहीं बताया गया। अपने खिलाफ फैसला खुद ही लिखा आपने, अब हाथ मल रहे हैं आप, आप अजीब हैं। अब देखें आगे क्या गेम होता है और खेलने दें उन्हें। बकौल इब्ने इंशा : खेलने दें इन्हें इश्क की बाजी, खेलेंगे तो सीखेंगे; कैस की या फरहाद की खातिर खोलें क्या स्कूल मियां!

आपने सोचा था चांद की रोशनी में नहाकर निखरेंगी और दुनिया रीस करेगी। अब तारीकियां घेर रही हैं तो डर लाजिमी है। चंडीगढ़ से जब पहाड़ों की ओर जाते हैं तो पहला नाका रूपनगर का आता है। वहां टोकन लेते समय पूछा जाता है कि वन-वे दें या टू-वे। वन-वे का मतलब है वापस आने का समय निश्चित नहीं। उस नाके पर चंद्रमोहन ने वापसी का टोल दे दिया था।

आपके जोग में जोगी तो भये नहीं कि वादियों में सुख मिल जाएगा। सो दिल-ओ-जान का महसूल नहीं दिया। अब चाहे जितनी जान छिड़किए, वो महसूल दिए बिना निकल लिए। रूपनगर की तरफ गए ही नहीं.. पॉवर की प्रेयसी दिल्ली की तरफ बढ़े सो कुछ देना नहीं पड़ा। आपकी कहानी अधूरी रह गई.. पर इब्ने इंशा की गजल पूरी किए देते हैं : इंशा जी क्या उज्र है तुमको, नक्द-ए-दिल-ओ-जान नज्र करो; रूपनगर के नाके पर यह लगता है महसूल मियां! kamlesh.singh@cph.bhaskarnet.com





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