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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर. महापौर विवेक शेजवलकर का कहना है कि दूषित पानी को उपचारित कर उसका पुन: उपयोग किया जाना अब वक्त की जरूरत है। दूषित पानी के ट्रीटमेंट के लिए नगर निगम प्रशासन भी प्रयास कर रहा है।
श्री शेजवलकर मंगलवार को दूषित जल के पुन: चक्रण एवं पुन: उपयोग की योजना तथा नगरीय ठोस अपशिष्ट प्रबंधन विषय पर होटल सेंट्रल पार्क में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पहले गांवों से पलायन रोकने पर जोर दिया जाता था लेकिन यह संभव नहीं है इसलिए शहरों की व्यवस्था को सुदृढ़ करना होगा ताकि आबादी के बढ़ते दबाव के कारण पर्यावरण प्रदूषित न हो।
इससे पहले विषय प्रवर्तन करते हुए बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आरके गुप्ता ने कहा कि महानगरों में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 250 लीटर दूषित पानी, 500 ग्राम कचरा व 900 ग्राम बायो प्रदूषण निकलता है, इसे कम करने की आवश्यकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता बोर्ड के संचालक मंडल के सदस्य दौलतराम गुप्ता ने की। केएस ग्रुप के चेयरमैन रमेश चन्द्र गर्ग विशेष अतिथि थे।
प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के खिलाफ हो कार्रवाई
कार्यशाला के विशेष अतिथि चेंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष जीडी लड्ढा ने शहर में टेम्पो संचालन पर प्रतिबंध लगाने का स्वागत किया और डीजल से चलने वाले यात्री वाहनों के प्रदूषण की जांच कर उनके खिलाफ कार्रवाई का सुझाव दिया। उन्होंने उद्योगों को लगाए जाते समय प्रदूषण नियंत्रण व वाटर रिसाइकलिंग आदि की व्यवस्था पर जोर दिया।
एक लीटर शराब के लिए 20 लीटर पानी खर्च
एक लीटर शराब बनाने में 20 लीटर पानी तथा एक किलोग्राम कागज के उत्पादन में 32 लीटर पानी का उपयोग होता है। यह जानकारी केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंचलिक अधिकारी ए. सुधाकर ने मंगलवार को दैनिक भास्कर को दी। श्री सुधाकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यशाला में भाग लेने ग्वालियर आए थे। उन्होंने बताया कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस वर्ष के अंत तक डिस्टिलरियों को प्रति लीटर शराब के उत्पादन के लिए पानी का उपयोग 12 लीटर व प्रति किलोग्राम कागज के उत्पादन में वर्ष 2010 तक पानी का उपयोग 18 से 20 लीटर करने का लक्ष्य दिया है।
उनका कहना था कि दूषित जल के पुन: चक्रण एवं पुन: उपयोग के जरिए उपलब्ध पानी का उद्योगों में बेहतर उपयोग हो सकता है। इसके अलावा छोटे शहरों व कस्बों में उपयोग किए गए पानी का शोधन (ट्रीटमेंट) करने के लिए नगरीय निकायों की जिम्मेदारी निर्धारित की जा रही है ताकि नदी, झील व भूमिगत जल का प्रदूषण रोका जा सके। डिस्टिलिरियों व कागज उद्योग आदि में उपयोग के बाद निकलने वाले पानी में माइक्रो बायोलाजिकल प्रदूषण होता है जो बीमारियां फैलाने वाले वायरस व बैक्टिरिया के कैरियर (वाहक) का काम करता है।