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अरे पी ले, पी ले हरि नाम का प्याला

आपने यह गीत सुना है- ‘अरे पी ले, पी ले, पी ले-पी ले, हरी नाम का प्याला’? मैं सचमुच यह बात जानने को बेचैन हूं कि आप जब इसे सुनते हैं, तो आपका क्या हाल होता है। क्या? पहले मैं बताऊं ? बिल्कुल मैंने बताने के लिए ही तो बात शुरू की है। मैं यह बताने से पहले यह बताना जरूरी समझता हूं कि मैं कुमार सचिन देव बर्मन के ग़ैर-फिल्मी गीत सुनने के लिए तैयारी क्या-क्या करता हूं। अरे हां, माफ़ कीजिएगा मैंने अभी तक यह तो आपको बताया ही नहीं न कि यह दादा बर्मन का ही गाया हुआ गीत है। बल्कि भजन है।

rajkumar keswani हां तो मैं सबसे पहले अपनी जरूरत की सारी चीजें अपने पलंग पर इकट्ठा कर लेता हूं। पलंग और म्यूजिक सिस्टम के बीच सिर्फ़ हाथ भर का फ़ासला रखता हूं। कमरे की लाइट ऑफ कर देता हूं। उसके बाद सिलसिला शुरू। मेरे बर्मन दादा वाले इस कैसेट में पहला गीत है तो फिल्मी, लेकिन अंदाÊा पूरी तरह ग़ैर-फिल्मी है। यह 1946 की फिल्म ‘आठ दिन’ से है- ‘उम्मीद भरा पंछी था खोज रहा सजनी/ कहता था यही पंछी, हाय बिछड़ गई सजनी’। हाल-बेहाल। लगता है मैं भी हाय करने लगूं.. करने क्या लगूं, अंदर से तो होने ही लगती है। गीत के अंतरे में जब दादा की जवां आवाÊा (हां जी, ये ग़ैर-फिल्मी गीत उनकी जवानी के दिनों में ही रिकॉर्ड हुए थे) पुकारती है ‘.. सजनी, मोहे न सता, दिल न जला/ ओ कहां गई सजनी, ओ कहां गई सजनी’ तो विरह से पीड़ित साजन की ही तरह दुख से कलेजा मुंह को आने लगता है।

s d berman दूसरा गीत भी मानो पिछले गीत की निरंतरता के भाव लिए है। फ़र्क इतना है कि बस पहले गीत में विरह की व्याकुलता है और दर्द है, और दूसरे गीत में बालपन के साथी को आवाज तो दी जा रही है, पर शुरुआत में ही यह घोषणा है कि ‘प्रेम किये बिन रहा न जाए, मैं तो प्रेम दीवानी रे, मैं तो प्रेम दीवानी रे/ बालपन के साथी आ जा, आ जा शाम सुहानी रे’। इस गीत की रिदम कुछ तेज हैं, जीवन की गति के साथ चलती लगती गति। इसमें दुख से भी Êयादा निमंत्रण है।

यह सब आपसे कहने का मतलब इतना है कि बर्मन दादा के चढ़ते-उतरते, इस कोण से उस कोण को मुड़ते स्वर हर भाव को इस तरह संप्रेषित करते हैं कि सुनने वाला ख़ुद ही इस सारी प्रक्रिया में भागीदार-सा हो जाता है। इसी को संगीत का जादू कहते हैं। आपने बर्मन दादा के फिल्मी गीत ‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा’(सुजाता), ‘मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार हूं इस पार’(बंदिनी), ‘सफल होगी तेरी आराधना’(आराधना) और ‘वहां कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहां’ (गाइड) जैसे और भी अनेक गीत सुने होंगे, जिनकी सूची यहां देना व्यर्थ है।

इन्हें सुनकर अफ़सोस भी हुआ होगा कि आख़िर उन्होंने फिल्मों में इतने कम गीत क्यों गाए। उन सबसे मेरी गुÊारिश है कि अगर उन्होंने ये ग़ैर-फिल्मी गीत नहीं सुने हैं, तो कोशिश करके इन्हें जरूर सुनें। आपको जो ख़ुशी होगी, उससे भी Êयादा मुझे ख़ुशी होगी कि मेरी बातें किसी के सुख का कारण बन सकीं। हाथ के हाथ एक द़ख्र्वास्त भी कर लूं। यार जिनके पास इन गीतों का संग्रह हो, वे उन लोगों को Êारूर मौक़ा दें, जिनके पास ये गीत नहीं हैं।

चलिए अपने मुद्दे पर वापस आते हैं। मतलब ‘पी ले, पी ले’ पर। इस भजन में एक जगह आता है ‘.. बन जा तू मतवाला, मतवाला’। जब आप इस गीत को सुनते हैं, तो लगता है कि आपसे यह कहने से पहले गाने वाला गाते-गाते ख़ुद ही मतवाला हुआ जा रहा है। इस मतवाला के उच्चरण में दादा ने हर बार ऐसी लहरें बनाई हैं कि आप में एक बालपन पैदा हो जाए और आप उन्हीं लहरों के साथ मस्त होकर खेलने लगें।

इसका असली जादू तो इसकी धुन और उसकी गायकी में है, सो मेरे कहे भर से वैसी बात तो न बनेगी, फिर भी दिल चाहता है कि कम से कम फिलहाल शब्द तो पूरे ही सुना दूं। कुछ तो अच्छा लगेगा।

पी ले, पी ले, पी ले-पी ले, हरी नाम का प्याला-2

इसको पीकर और पिलाकर बन जा तू मतवाला, मतवाला

हरी नाम का प्याला..

ये प्याला दुनिया से न्यारा, इसकी रंगत न्यारी

मीठी-मीठी, सौंधी-सौंधी, ख़ुश्बू प्यारी-प्यारी

इसकी बूंद-बूंद में विधि ने सुख का अमृत डाला

बन जा तू मतवाला..

कोई इसके सुख को पीकर दुख को दूर भगाए

कोई इसको दूर-दूर से दुख का जहर बताएं

बिना पिये कोई क्या समझे इसका भेद निराला

बन जा तू मतवाला, मतवाला

हरी नाम का प्याला

अरे, पी ले, पी ले, पी ले-पी ले, हरी नाम का प्याला

धीरे से जाना बगियन में

इतना सब कह चुकने के बाद भी दादा के गाए गीतों के बारे में कहने को इतना कुछ बाक़ी है कि बात आज से कल तक खिंच जाए। अब जैसे उनका ऐसा ही एक गीत है, जो उनके सारे ग़ैर-फिल्मी गीतों में सबसे ज्यादा पापुलर हुआ था और आज भी लोग उसे याद करते हैं- ‘धीरे से जाना बगियन में / धीरे से जाना बगियन में, रे भंवरा, धीरे से जाना बगियन में’। मुझे निजी तौर पर इस गीत की गायकी के साथ ही इसका कवित्त भी बहुत मोहित करता है। एक तो इसमें भंवरा, कोयल, पपीहा, फूल, पत्तियों से बातें हैं, जो इन दिनों बिल्कुल गायब है। दूसरे, इसमें एक वयस्क प्रेम भाव को ऐसे सहज और बाल सुलभ रंग में पेश किया गया है कि बस, वाह!

ज़रा देखिए न :

धीरे से जाना बगियन में, रे भंवरा!

धीरे से जाना बगियन में-2

आज है चांदनी राती

मेरे जीवन का साथी है जो

सोवत है नींद मगन में रे भंवरा.. धीरे से..

तोरी गुन-गुन-गुन गुंजार तोरी झन-झन-झन झंकार

दुविधा न डाले स्वपन में रे भंवरा.. धीरे से..

कहीं पात न गिर जाए कोई कहीं फूल न मुरझाए कोई

ठेस लगे न कलियन में रे भंवरा.. धीरे से..

ए री कोयलिया कू-कू न बोल ओ पपीहे न कर कलोल

पिया आ गए हमारे भवन में पिया आ गए हमारे भवन में

रे भंवरा.. धीरे से जाना बगियन में

कहिए, कुछ मज़ा आया? मज़ा तो और भी है, मगर बात को आख़िर ख़त्म तो करना ही होगा न। मगर जाने से पहले एक बात ज़रूर करना चाहूंगा। सब नहीं, तो भी कुछ और गीतों की एक-एक, दो-दो लाइनें ज़रूर पेश किए देता हूं। ख़ासकर उनकी, जो मुझे ़ज्यादा पसंद हैं। ‘चले चलो ऐ प्रेम के साथी, प्रेम नगर है जाना’, ‘मेरे श्याम सुनो मेरी बिनती, मैं बिनती कर-कर हारी, इन दिनों बस रही है याद रग-रग में तुम्हारी इन दिनों / इन दिनों’, ‘कौन नगरिया जावो रे’, ‘नैनों को समझाती जा, दिल को धीर बंधाती जा’।

अब और क्या कहूं? बस शुरू वाली बात ही दुहराए देता हूं- ‘अरे पी ले, पी ले, पी ले-पी ले, हरी नाम का प्याला’।

और.. और एक बात। दादा बर्मन के सेंस ऑफ ह्यूमर का मैं बड़ा कायल हूं। विस्तार से तो फिर कभी बात करेंगे, फिलहाल एक छोटा-सा क़िस्सा। दादा ने अपने ही गाए और कंपोज़ किए गीत ‘धीरे से जाना बगियन में..’ की पैरोडी को भी अपने ही संगीत में 1973 में फिल्म ‘छुपा रुस्तम’ के लिए किशोर कुमार से गवाया था। यह पैरोडी कवि नीरज ने लिखी थी। याद आया? ‘धीरे से जाना खटियन में, ओ खटमल! धीरे से जाना खटियन में/ सोई है राजकुमारी, देख रही मीठे सपने/ जा-जा छुप जा तकियन में, ओ खटमल, धीरे से जाना खटियन में’।

अब इससे पहले कि कोई इस गीत की राजकुमारी को राजकुमार में बदलकर गा दे और खटमल उसकी बात मान जाए, मैं चला बिना खटमल वाले अपने पलंग की तरफ। वहां बैठकर चैन से कुछ सुनूंगा, तभी तो होगी अगले ह़फ्ते, अपनी ‘आपस की बात’।





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