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कहते हैं ताली एक हाथ से नहीं बजती उसी तरह रिश्ता भी एक के निभाने से नहीं निभता, रिश्ता चाहे मां-बेटी का हो, भाई-बहन, पिता-पुत्र या पति-पत्नी, मित्रों, पड़ोसियों का ही क्यों न हो, हर हाल में रिश्ता ही है लेकिन कभी-कभी इन रिश्तों में टकराव उत्पन्न होने लगता है और रिश्ते बिखरने लगते हैं इसलिए रिश्तों के महत्व को समझने का प्रयास करना चाहिए।
रिश्तों का महत्व क्या है? जो इंसान दिनभर भीड़ के बीच में घिरा रहता है, वह कभी न कभी अकेला जरूर रहता है और उस समय उसे भी अपना खालीपन बांटने के लिए किसी के साथ की जरूरत महसूस होती है। रिश्तों का वास्तविक महत्व तभी समझा जा सकता है। वैसे भी भीड़ में कोई तो ऐसा होना चाहिए जो बिल्कुल अपना सा लगता हो। जिसके सामने हम अपनी हर बात कह सकें और वह हमराज भी हो। वह किसी भी रूप में हो सकता है दोस्त या रिश्तेदार, क्योंकि सच्चे दोस्त ही सुख-दु:ख में काम आते हैं।
नजाकत को समझें
रिश्तों की नजाकत को समझें व उसे महसूस करें रिश्ता तो खिला हुआ वो फूल है जो स्नेह की छाया में खिला-खिला नजर आएगा और उसकी ताजगी बनी रहेगी। वह दूर-दूर तक अपनी महक बिखेरेगी लेकिन मनमुटाव होने पर रिश्ता रूपी फूल मुरझा जाएगा इसलिए रिश्तों में प्रेम और आत्मीयता का होना बहुत जरूरी है।
निभाना है जरूरी
रिश्तों में दरार तभी उत्पन्न होती है जब एक-दूसरे के मर्म को चोट पहुंचती है रिश्ते निभाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है एक-दूसरे का सम्मान करें व एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करें। यूं भी रिश्ते तभी निभ पाते हैं जब उनमें पारंपरिक लगाव, सहनशीलता व विश्वास हो।
सार्थकता
रिश्ता तभी सार्थक होता है जब उसकी पवित्रता पर पूरा ध्यान जाए। ज्यादा उतावलापन या खुशी जाहिर करने का तरीका या क्रोध में कुछ भी अनाप-शनाप बोल देना, रिश्तों की पवित्रता पर एक प्रश्न चिह्न लगा देता है और रिश्ते बिखरने लगते हैं। किसी व्यक्ति से हमारा क्या रिश्ता है यदि उसको ध्यान में रखकर व्यवहार किया जाए तो रिश्तों का माधुर्य कभी समाप्त नहीं होगा। रिश्ता तभी सार्थक है जब उसकी मर्यादा को ध्यान में रखा जाए और लोगों को चाहिए कि वे मन साफ रखकर बातें करें।
विश्वास बनाएं
रिश्तों में बहुत नाजुक डोर होती है विश्वास की। यदि रिश्ते में विश्वास है तो वह रिश्ता दृढ़ है अन्यथा विश्वास टूट जाता है। कहते हैं विश्वास बनाने में बहुत समय लगता है और टूटने में एक सेकंड लगता है। रिश्तों में यदि विश्वास की मजबूती नहीं है तो वह डोर कभी न कभी तो टूटेगी ही।
अपेक्षाएं
कभी-कभी गलतफहमी भी रिश्तों में दरार पैदा कर देती है। एक-दूसरे से आवश्यकता से अधिक अपेक्षाएं रखना और अपेक्षाएं पूरी न होना भी रिश्तों के टूटने का एक कारण है। रिश्तों में यदि प्यार है तो अपेक्षाएं तो होती ही हैं लेकिन ज्यादा उम्मीदें लगाने वाले लोग ही पछताते भी हैं। आप किसी की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर रहे हैं इसका आकलन करना जरूरी होता है, तभी आपको असलियत का पता चलेगा।