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एक सामान्य करदाता को सबसे ज्यादा दुविधा टैक्स को लेकर ही होती है। ऐसा टैक्स प्रावधानों में अनेक किंतु-परंतुओं की वजह से होता है। पर्याप्त जानकारी के अभाव में कई बार गलत बातें इतनी प्रचलित हो जाती हैं कि उन्हें ही सही माना जाने लगता है। पेश हैं ऐसे ही कुछ मिथक और उनके सच :
मिथक 1
हाउसिंग लोन में कटौती का लाभ एक मकान के मामले में ही मिलता है।
सच >> ऐसा बिल्कुल नहीं है। यदि एक व्यक्ति एक से ज्यादा हाउसिंग लोन ले सकता है तो उसे सभी मकानों के मामले में करयोग्य आय में कटौती (डिडक्शन) का लाभ भी मिलेगा। हालांकि यहां कुछ पेंच भी हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी करदाता के पास दो मकान हैं और वह उनमें से एक में रह रहा है तो दूसरे मकान को किराये पर दिया हुआ माना जाएगा (चाहे किराये पर दिया गया है अथवा नहीं)। किराये से प्राप्त आय करदाता की आय में जुड़कर करयोग्य मानी जाएगी। आयकरदाता भारतीय आयकर अधिनियम की धारा 80सी के तहत दोनों कर्जो में मूलधन के भुगतान में कटौती का दावा कर सकता है। हालांकि दोनों मामलों में कुल सीमा सालाना एक लाख रुपए ही होगी। ब्याज के भुगतान के मामले में नियम अलग है। जिस मकान में आप रह रहे हैं, उसी मकान के लिए ब्याज की सीमा डेढ़ लाख रुपए होगी जबकि दूसरे मकान के मामले में यह सीमा लागू नहीं होगी। सरल शब्दों में कहें तो व्यक्ति को दोनों मकानों में अलग-अलग ब्याज कटौती का फायदा मिलेगा।
मिथक 2
जितना मकान भाड़ा देंगे, उतनी कटौती का लाभ मिलेगा।
सच >> धारा 80जीजी के तहत गैर वेतनभोगियों और मकान किराया भत्ता (एचआरए) नहीं पाने वाले वेतनभोगियों के लिए मकान के किराये पर किए गए खर्च के एवज में कटौती का प्रावधान है। गलतफहमी यह है कि जितना भी किराया दिया जाएगा, उतने पर कटौती का लाभ मिलेगा। लेकिन वास्तविकता कुछ और है। कुल आय के 10 फीसदी को वास्तविक किराये में से घटाने पर आने वाली राशि अथवा कुल आय का 25 फीसदी अथवा मासिक 2 हजार रुपए, इन तीनों में से जो न्यूनतम होगा, उतने पर ही कटौती का लाभ मिलेगा। यानी अधिकतम सीमा सालाना 24 हजार रुपए होगी, न कि जितना आप किराया दे रहे हैं।
मिथक 3
मकान किराया भत्ता की राशि के बराबर मिलेगी कटौती।
सच >> यह भी एक बड़ी गलतफहमी है कि नियोक्ता द्वारा दिए गए एचआरए पर हमेशा ही संपूर्ण कटौती का लाभ मिलेगा। कटौती उतनी ही राशि पर मिलेगी जो निम्न में से न्यूनतम होगी : < नियोक्ता द्वारा दिया जा रहा एचआरए। < वास्तविक किराये में से कुल वेतन की 10 फीसदी राशि को घटाने के बाद शेष राशि। < महानगरों (मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता) में रहने वाले व्यक्ति के वेतन की 50 फीसदी और अन्य शहरों मंे रहने वाले व्यक्ति के वेतन की 40 फीसदी राशि। गौरतलब है कि यहां जिस ‘वेतन’ शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसमें बेसिक और डीए इत्यादि भी शामिल रहेगा। इस नियम का मतलब है कि जरूरी नहीं है कि हर मामले में एचआरए की पूरी राशि पर ही कटौती का लाभ मिले।
मिथक 4
बालिग संतानों के लिए जीवन बीमा की पॉलिसी लेने पर कटौती का लाभ नहीं मिलता है।
सच >> आम धारणा है कि धारा 80सी के तहत जीवन बीमा प्रीमियम में कटौती का फायदा केवल अपने पर निर्भर संतानों के मामले में ही मिल सकता है, लेकिन सच तो यह है कि यह धारा न तो बच्चों की उम्र को लेकर कोई शर्त लगाती है और न ही बच्चों की वैवाहिक स्थिति को लेकर। यानी कोई भी व्यक्ति अपने नाबालिग, बालिग और यहां तक कि शादीशुदा बच्चों के लिए भी खरीदी गई जीवन बीमा पॉलिसी पर कटौती का फायदा उठा सकता है।
मिथक 5
एलटीए की संपूर्ण राशि पर कटौती का दावा किया जा सकता है।
सच >> हां, किया तो जा सकता है लेकिन शर्त यह है कि राशि परिवहन पर खर्च की गई हो। परिवहन में भी केवल बेसिक खर्च यानी आप जहां रहते हो, वहां से गंतव्य तक जाने और वापसी का भाड़ा ही मान्य होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो आप उतनी ही राशि पर कटौती का दावा कर सकते हैं, जो आपने परिवहन पर खर्च की है, भले ही आपको अवकाश यात्रा भत्ता (एलटीए) उससे ज्यादा मिलता हो। उदाहरण के लिए यदि आपको एलटीए के रूप में दस हजार रुपए मिलते हैं और परिवहन पर आपका खर्च आया छह हजार रुपए, तो आपको इस राशि पर ही कटौती का लाभ मिलेगा। शेष चार हजार रुपए आपकी आय में जुड़ जाएंगे और नियमानुसार कर देय होगा।
मिथक 6
शिक्षा ऋण पर कटौती का लाभ मिलता है।
सच >> यह भी आधा सच है। शिक्षा ऋण की मूल राशि पर कटौती का कोई लाभ नहीं है। लाभ चुकाए गए ब्याज पर ही मिलेगा। हालांकि इसकी कोई अधिकतम सीमा नहीं है, लेकिन यह लाभ अधिकतम आठ वर्षो तक चुकाए गए ब्याज पर ही मिलेगा।
मिथक 7
जी भरकर चंदा दो और संपूर्ण कटौती का लाभ उठाओ।
सच >> धारा 80जी के तहत सरकारी कोषों को दी गई राशि पर 100 फीसदी छूट हासिल होगी, जबकि निजी कोषों को दी गई राशि पर 50 फीसदी की छूट मिलेगी। लेकिन पेंच यहीं पर है। दान दी गई राशि 80 सी से 80 यू तक की कटौती (80 जी की कटौती को छोड़कर) को घटाने के बाद शेष आय की 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए। यानी दान दी गई संपूर्ण राशि पर कटौती का लाभ प्रत्येक मामले में नहीं मिलेगा।
मिथक 8
उपहार हमेशा ही करमुक्त होते हैं।
सच >> यदि आप किसी गैर रिश्तेदार से उपहार ले रहे हैं और उपहार धनराशि (नकदी, चेक, बैंक ड्रॉफ्ट इत्यादि) के रूप में है तो जरूरी नहीं है कि आप कर दायित्व से बच जाएं। धारा 56 के अनुसार ऐसे उपहार की राशि पूरे वित्त वर्ष में कुल मिलाकर 50 हजार रुपए से अधिक नहीं होनी चाहिए। इससे अधिक का उपहार स्वीकारने पर अतिरिक्त राशि स्वीकारने वाले की आय में जुड़ जाएगी और उसी के अनुरूप टैक्स का भुगतान करना होगा।
मिथक 9
80सीसीसी और 80सीसीडी धाराओं में अलग से कटौती का फायदा मिलता है।
सच >> दोनों धाराओं के तहत पेंशन फंडों या स्कीमों में किसी अंशदान पर कटौती हासिल की जा सकती है। दोनों में अधिकतम सीमा एक लाख रुपए है, लेकिन दोनों में कटौती का फायदा अलग से नहीं है। कुल अधिकतम सीमा 80सी की छूट के साथ मिलाकर एक लाख रुपए है।
यह धारणा गलत है कि दान दी गई संपूर्ण राशि पर कटौती का लाभ मिलता है। ऐसा हो भी सकता है, लेकिन जरूरी नहीं है कि हर स्थिति में 100 फीसदी दान पर कटौती मिले ही।
<सफीर अहमद, कर सलाहकार