Manoranjan
Aap Ki Baat Aap Ki Baat
एक ऐसे समय में, जब सारी दुनिया जय हो! जय हो! से गूंज रही है, मैं कैसे चुप रह सकता हूं। सो, जय हो! संगीत की जय हो। रहमान की जय हो। गुलज़ार की जय हो और जय हो भारत के उन झुग्गी में रहने वाले मासूम बच्चों की, जिनकी ज़िंदगी उनके अपने लिए तो अक्सर बहुत कुछ ख़ास नहीं कर पाती, मगर कभी ‘सलाम बांबे’ जैसी फिल्में बनवा देती है और कभी ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की प्रेरणा देती है। जय हो भारत भाग्य विधाता। जय हे, जय हे, जय, जय, जय हे।
झुग्गियों में बसे समाज को हिकारत से देखने वालो, तुम्हारी भी जय हो। तुम लोग इतनी बुरी तरह इनसे सुलूक न करते, तो ये लोग इतने मज़बूत कभी न हो पाते और न उनकी ज़िंदगी में गोल्डन ग्लोब और ऑस्कर वालों की दिलचस्पी होती। ख़ैर जी, हमको तो दो व़क्त की रोटी मज़े से मिल रही है, हम क्यों रोएं इस मुद्दे पर इससे ़ज्यादा। चलिए, संगीत की बात करते हैं। अरे, संगीत भी क्या, रहमान की बात करते हैं।
रहमान को लेकर पिछले 15-16 साल में पता नहीं कितनी बार ख़ुश होकर नाचा हूं (मतलब दिल ही दिल में)। न जाने कितनी बार नाराज़ हुआ हूं। ठीक उसी तरह, जैसे मैं अपने किसी अज़ीज़ के अच्छे-बुरे पर होता हूं। मेरे लिए आर.डी.बर्मन के बाद रहमान ही ऐसा संगीतकार है, जिसके संगीत में रचयिता का चरित्र भी साफ़-साफ़ दिखाई देता है। मैं जब-जब रहमान के बारे में सोचता हूं, तो वह अचानक मेरी नज़रों के सामने एक चलती-फिरती तस्वीर की तरह प्रकट हो जाता है। आधी रात के सन्नाटे में अपने स्टूडियो में रोलेंड फेंटम एक्स सीरीज के की-बोर्ड में खोया वह एक ऐसा बेचैन बच्च नज़र आता है, जो उस की-बोर्ड में किसी खोई हुई चीज़ को ढूंढ़ रहा हो।
कभी इस की को दबाता, कभी उस की को दबाता। इस कोशिश में कुछ आवाज़ें बाहर निकल आती हैं, तो उसकी बेचैनी बढ़ जाती है। नहीं, ये वो आवाज़ें नहीं हैं, जिनकी उसे तलाश है। उंगलियां फिर चलती हैं। इस बार किसी और तरह से। आंखें बंद हैं, मानो ध्यान में हो, मगर उंगलियां इतनी सिद्धहस्त हैं कि आख़िर को एक ऐसी आवाज़ ढूंढ़ लाती हैं, जिसे सुनते ही इस बेचैन आत्मा के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। ठीक वैसी ही मुस्कान, जैसी किसी मुसाफ़िर के चेहरे पर इधर-उधर भटकने के बाद सही रास्ता मिल जाने पर आती है।
मगर संगीत के इस मुसाफ़िर का यह सफ़र हर रोज़ जारी रहता है। आधी रात के बाद जब सारी दुनिया सो जाती है, वह अपने सफ़र पर निकल पड़ता है। अगली किसी सुबह जब दुनिया जागती है, तो उसके कानों में संगीत की कुछ ऐसी ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं, जो किसी चेहरे पर उसकी आत्मा की ख़ुशी ले आती हैं, तो किसी के पांव ही ख़ुशी से नाचने लगते हैं। उस समय इस संगीत का रचयिता सो रहा होता है। नए संगीत सृजन के सपने देखता। यह ए.आर.रहमान है।
मगर सवाल फिर भी बाक़ी है कि आख़िर कौन है यह ए.आर.रहमान। मैं कुछ कोशिश करता हूं। ए.आर.रहमान का पूरा नाम है अल्ला रखा रहमान। 6 जनवरी, 1966 को जब रहमान का चेन्नई में जन्म हुआ, तो पिता आर.के.शेखर ने उसका नाम रखा था ए.एस.दिलीप कुमार। पिता मलयालम फिल्मों के संगीत से जुड़े वादक, अरेंजर और आख़िर में स्वतंत्र संगीतकार थे। वे सलिल चौधरी जैसे गुणी संगीतकार के उस समय सहयोगी बने, जब उन्होंने मलयालम फिल्मों में संगीत देना शुरू किया।
आर.के.शेखर अद्भुत प्रतिभावान संगीतकार थे। संगीत में कुछ नया कर गुज़रने की जो बेचैनी आज रहमान में नज़र आती है, वह असल में शेखर की ही बेचैनी है। बालक दिलीप उस कम उम्री में ही पिता की गोद में बैठा इन कोशिशों में स्वाभाविक रूप से शामिल हो गया। चार साल की उम्र में ही दिलीप ने हारमोनियम पर हाथ जमाना शुरू कर दिए थे और साथ ही पियानो सीखना भी शुरू कर दिया था।
शेखर उन गिने-चुने लोगों में से थे, जो 70 के दशक की शुरुआत में ही सिंगापुर से सिंथेसाइज़र ख़रीद लाए थे, मगर बेरहम व़क्त ने उन्हें बहुत मौक़ा नहीं दिया कि वे उस जादुई वाद्य यंत्र के जादू से जीवन की ख़ुशियां घर ले आएं। उन्हें किसी ऐसी रहस्यमयी बीमारी ने आ घेरा कि डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद वे चल बसे। भाग्य की ऐसी विडंबना कि जिस दिन उनकी बतौर स्वतंत्र संगीतकार पहली मलयालम फिल्म रिलीज़ हुई, ठीक उसी दिन ही उनकी मृत्यु हो गई। फिल्म के संगीत की ख़ूब प्रशंसा हुई, मगर उसे सुनने के लिए शेखर मौजूद न थे।
इस दिन के बाद ही उस समय 9 साल के दिलीप के संघर्ष की शुरुआत हो गई। दुनिया की मुश्किलों से लड़ने और आगे बढ़ने के लिए उसके पास बस पिता के छोड़े हुए म्यूज़िक इंस्ट्रुमेंट्स भर ही थे। 11 साल की उम्र में दिलीप ने साउथ के महान संगीतकार इलायाराजा के पास की-बोर्ड प्लेयर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। इलायाराजा के इस साथ ने दिलीप को ऐसा मांजा कि उसकी चमक हर दिन बढ़ती चली जा रही है।
इलायाराजा भारत के पहले संगीतकार हैं, जिन्होंने लंदन के विख्यात रॉयल फिलहारमोनिक आर्केस्ट्रा के लिए सिंफनीÊा कंपोÊा की हैं। दक्षिण के तो वे बेताज बादशाह हैं, पर हिंदी फिल्मों में भी थोड़ा-बहुत, लेकिन बेहद ख़ूबसूरत काम किया है। जैसे कि फिल्म ‘सदमा’। येसुदास की आवाÊा में वह मधुर-मधुर लोरी तो आपको याद होगी- ‘सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना इक सपना दे जा रे’, या फिर सुरेश वाडकर की आवाÊा में- ‘ऐ Êिांदगी गले लगा ले, हमने भी तेरे हर इक ग़म को गले से लगाया है, है न..’।
इलायाराजा के बारे में रहमान ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा है- ‘तब तक (इलायाराजा से मिलने से पहले तक) मैं यही सोचता था कि अगर अच्छा कलाकार बनना है, तो शराब या किसी और तरह का नशा करना बेहद Êारूरी है। मगर इलायाराजा को देखा, तो जाना कि वे इतना ख़ूबसूरत संगीत भी रच रहे थे और एकदम शुद्धता का जीवन भी जी रहे थे।’
घर की जिम्मेदारियों के बोझ से लदे दिलीप के लिए इलायाराजा के साथ काम करना लंबे सफ़र का पहला पड़ाव भर था। उसके बाद दोस्तों के साथ म्यूजिक ग्रुप में काम किया। फिर अपना ग्रुप बनाया। उस्ताद जाकिर हुसैन और अन्य संगीतकारों के साथ विदेश यात्राएं कीं और आख़िर में लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ म्यूजिक से एक साल की स्कॉलरशिप हासिल कर वेस्टर्न म्यूजिक की शिक्षा प्राप्त की। फिर कुछ साल तक जिंगल बनाए। इस सब के बावजूद सीखने की ललक कम न हुई। इन कोशिशों को यहां बयान करूं तो कई पन्ने भर जाएंगे, लिहाजा यह काम मैं इतिहास के लिए छोड़ता हूं, जहां रहमान के लिए बहुत जगह होगी और मुझसे बेहतर लिखने वाले होंगे।
मन लागो मेरो यार फ़क़ीरी में
मैं अक्सर सोचता हूं कि जो लोग अपने दुख-दर्द को लेकर जमाने के आगे दहाड़ें नहीं मारते, उनके दुख-दर्द अंदर-अंदर ही ताक़त में बदल जाते हैं। उनकी यही ताक़त उनके काम में दिखाई दे जाती है। रहमान उसका एक अदभुत उदाहरण है।
जिस बच्चे ने 9 साल की उम्र में पिता की मौत देखी हो। बेसहारा मां और 3 बहनें देखी हों और परिवार के लिए उसी उम्र से रोटी का संघर्ष किया हो, उसकी कहानी में क्या-क्या न होगा। मगर उसकी पूरी कहानी तो शायद अकेले वही जानता है, जिसे उसने पूरी तरह शायद कभी कहा नहीं है। रहमान से मेरी निजी तौर पर कोई बातचीत नहीं हुई है। बस एक अवार्ड फंक्शन में नÊादीक से देखा भर है, सो जितना पढ़ा-सुना है, उसी को आधार बनाकर आपको बताने की कोशिश करता हूं।
रहमान के पिता जब बहुत बीमार थे और कोई दवा काम नहीं आ रही थी, तब इस परिवार ने बाबाओं, पंडितों, पादरियों और पीर-फ़कीरों की शरण ली। उस व़क्त यह छोटा-सा बच्च असहाय-सा अस्पताल में खड़ा हर दवा और दुआ को नाकाम होते देखता रहा। और धीरे-धीरे अपने पिता को मौत के आगोश में जाते हुए देखा।
इसके बाद इस बच्चे का विश्वास ईश्वर से उठ गया। उसे इस बात पर ग़ुस्सा था कि उसके परिवार ने जिस ईश्वर पर इतनी आस्था रखी, उसी ने न्याय नहीं किया। इसी बीमारी के दौरान रहमान की मुलाक़ात पीर- शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी, जो कि पीर क़ादरी साहब के नाम से जाने जाते थे, से हुई। पीर साहब ने भी उसके पिता के जीवन के लिए आख़िर समय में कई जतन किए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
1988 या 1989 में उसकी एक बहन भी गंभीर रूप से बीमार हो गई। उसकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ रही थी। इस बार पीर साहब ने फिर रहमान के साथ एक बुज़्ाुर्ग की तरह खड़े होकर मदद की। इस बार बहन की जान बच गई। इसी के साथ 22 साल के जवान दिलीप ने पीर साहब के सूफ़ियाना उपदेशों और इंसानी जÊबे से मुतास्सिर होकर इस्लाम क़बूल कर लिया। उस पर पूरी तरह सूफ़ियाना रंगत चढ़ चुकी थी। वह इस्लाम के Êारिए ही इस मंÊिाल को पाना चाहता था। वह दिलीप से रहमान बन गया। उसके इस फ़ैसले का अनुसरण उसके बाक़ी परिवार ने भी कर लिया।
रहमान की जिंदगी में उसकी मां का स्थान उसके लिए सबसे ऊपर है। शब्द ‘मां’ उसके लिए जिंदगी का सबसे महान शब्द है। इस सच्चाई को जानने के लिए रहमान का गाया ‘वंदे मातरम’ सुनिए। जिस व़क्त वो कहता है ‘मां तुझे सलाम’ उस व़क्त आपके अपने अंदर कुछ हो जाता है। ये दिल की गहराइयों से निकले सच्चे शब्द हैं, जो असर रखते हैं।
मौक़ा मिला है, तो कह दूं दुनिया की हर मां उतनी ही महान होती है, मगर अक्सर इस सम्मान से महरूम रह जाती है। सो दुनिया की हर ‘मां’ को मेरा सलाम।
और...
रहमान के बारे में कहने को बहुत कुछ है, मगर बस आज यहीं तक। मगर हां अगली बार उसके संगीत के बारे में Êारूर बात करेंगे। आख़िर उसी संगीत की वजह से ही तो हम रहमान को जानते हैं। सो अब मैं फिर से शुरू करता हूं सुनना रहमान का नया-पुराना संगीत, जिसकी बात करेंगे अगले ह़फ्ते। अब चला मैं अपने रस्ते, मतलब घर के रस्ते। सो नमस्ते। जय हो! जय हो!