एक गुंडा जो कवि भी था
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एक गुंडा जो कवि भी था

बात शुरू करने से पहले एक बात बताना जरूरी समझता हूं। बात ऐसी है कि आज मैं एक गुंडे की बात करने वाला हूं। मतलब वो कोई ऐसा-वैसा गुंडा नहीं था, जो सिर्फ़ सड़कों पर गुंडई करता रहा हो, वह बाक़ायदा कवि भी था। इस गुंडे कवि का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित है। नाम बताऊं? नाम है ‘बदमाश दर्पण’। है न बिल्कुल सही, कवि के चरित्र के अनुरूप नाम।

rajkumar keswani इससे पहले कि हम लोग इन गुंडे महाशय की कविताएं पढ़ें, Êारा उनके बारे में, उनकी पृष्ठभूमि के बारे में बात कर लें, तो कविताओं को समझने में थोड़ी मदद मिल जाएगी।

सबसे पहली बात तो यह कि इस गुंडे का नाम है- तेग़ अली। इनके व्यक्तित्व के बारे में पुस्तक ‘बदमाश दर्पण’ में पुस्तक के संपादक नारायण दास लिखते हैं ‘पचास के कोठे में सिन। फिर भी युवकोचित बलिष्ठ दृढ़ शरीर। छह फुट ऊंचा क़द। सर पर छोटे घुंघराले बालों पर सुनहरे पल्ले का साफा। बिच्छू के डंक की तरह नुकीली चढ़ी हुई मूंछें। सांप की तरह सांवले रंग की, चिकनी चमकीली काया। शरीर पर रेशमी लाल किनारे की नगपुरी धोती। कमर में बनारसी सेल्हे का कसा हुआ फेंटा। फेंटे में खुंसा आबनूस की मूठ का तीखी धार का बिछुआ। हाथ में टीके से हाथ भर ऊंची पक्के मिÊरपुरी बांस की लाठी, जिसे बड़े प्यार से तेल पिला-पिलाकर पाला गया। जेठ-बैसाख की कड़ी धूप। सावन-भादो की झड़ी और माघ-पूस की कड़कड़ाती ठंड मंे भी नंगे बदन।’

यह था तेग़ अली का व्यक्तित्व, जो ईसा की उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में अपने उरूज पर थे।

तेग़ अली पूरी तरह से बनारसी थे। वहीं जन्मे, पले और बड़े हुए और वहीं गुंडई का पेशा अपनाया। वे भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के काल में जन्मे और उनके भारतेंदु मंडल में भी शामिल थे। तेग़ अली की गजलों ने अपने समय में ही काफ़ी असर दिखाना शुरू कर दिया था। और तो और स्वयं भारतेंदु ने जब एक काल्पनिक मुशायरे का वर्णन लिखा, तो उसमें तेग़ अली की कुछ गजलों को भी शामिल किया।

गुंडा शब्द सुनते ही किसी भी व्यक्ति की ऐसी घृणित छवि हमारे सामने बन जाती है कि उससे नफ़रत-सी होने लगती है, मगर तेग़ अली हमारे दौर का गुंडा नहीं है, जो किसी राजनैतिक दल की टोपी पहन कर लूट-पाट करता हो। वह कोई 150 साल पहले की काशी (बनारस) का गुंडा है। उस दौर में गुंडे से आशय था, ऐसा व्यक्ति जो अपनी आन पर मर मिटता हो। कमजोर और मजलूम लोगों की रक्षा करता हो। ऐसे लोगों को काशी में गुंडा कहा जाता था। गुंडा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के गुंड से बताई जाती है। ‘गुंडयति’ का अर्थ है आश्रय में आच्छादित कर लेना, रक्षा करना।

illusrtation तो ख़ैर, मुद्दा यह कि तेग़ अली संगीत के बेहद शौक़ीन थे। ‘भोजपुरी भाषा और साहित्य’ में पंडित उदयनारायण तिवारी कहते हैं, ‘तेग़ अली बड़े मस्त जीव थे। काशी के गवैयों के अखाड़े के आप सरदार थे। होली के दिनों में आप अपना दल लेकर घूमते थे और आशु कविता करते हुए लोगों का मनोरंजन करते थे। तेग़ अली की कविता में मुहावरों की सफ़ाई है।’

हां, इससे पहले कि हम तेग़ अली की कविताएं पढ़ना शुरू करें, एक बात और जो आपको उनकी कविताओं में भी दिखाई देगी, वह है उनका धार्मिक सहिष्णु रूप। अपने धर्म का पाबंद होने के साथ ही वह राम, कृष्ण, दुर्गा और गंगा की बात करता है और उनकी क़समें खाता है। उसकी कविता की भाषा ही भोजपुरी है।

रजा अधेली का पत्ती हमार बटलै बा

तेग़ अली की शायरी में बला की ईमानदारी है। अपनी गुंडई के धंधे को इतनी सहजता और ईमानदारी से क़ुबूल करता है कि जी चाहता है कि देश भर के भ्रष्ट, बदमाश लोगों को पूरा का पूरा ‘बदमाश दर्पण’ सुबह 5 बजे से 8 बजे तक और रात को 9 बजे से 12 बजे तक रोÊा पढ़ाने का कानून बनवा दूं।अपनी ‘बटलै बा’ शीर्षक वाली ग़Êाल में अपने बारे में कहते हैं -

दुआरे राजा के जुआ परल बा जाना ला रजा अधेली का पत्ती हमार बटलै बा अर्थ यह है कि तुम को तो मालूम ही है कि राजा दरवाÊो में जुआ होता है और उस जुए के अड्डे पर होने वाली नाल की आमदनी में मेरी आधे की साझेदारी है।

भाई साहब गुंडे थे, तो क्या इश्क़ तो वे भी करते थे, सो अपनी माशूक़ से भी बात देखिए किस अंदाÊा से करते हैं। वादा करके माशूक़ नहीं आया, तो किस क़दर ग़ुस्सा चढ़ आया, तो फ़ौरन फ़ौजदारी की धमकी भी दे डाली।

रोज कह जाला कि आईला से आवत बाट सात चौदह का ठेकाना तूं लगावत बाट

मतलब यह कि तुम रोज़-रोज़ मुझसे कह कर जाती हो कि अभी आती हूं, लेकिन अभी तक तो तुम्हारा कोई पता नहीं है। यह तो तुम मुझे सात से चौदह साल की जेल भिजवाने का इंतज़ाम कर रही हो। अच्छा, यह कोई कोरी धमकी नहीं थी। बंदे ने सचमुच ऐसा कर भी दिखाया। मतलब पूरी तरह तो नहीं, मगर अटैक तो कर ही दिया। अब देखिए, वे उस घटना को कैसे बता रहे हैं।

पेटे पे छुरी धइली ता बोलल कि रामधै जीयत रहब त फेर न कबौं आज कल करब

मैंने उसके पेट पर छुरी रख दी, तो वह बोला कि राम कसम, अब अगर ज़िंदा बच जाऊं, तो फिर कभी आज-कल का झूठा वादा करने से मेरी तौबा।यह तो हुआ इनका एक रूप। दूसरे रूप में उसी माशूक़ के लिए जान लड़ाने को तैयार हो जाते हैं।

केहू का डर हौ त कह दा लगाईं सारे से तमासा मेला में गंगा के पार बहरी ओर

पार्टी यहां कह रही है कि तुमको अगर किसी का डर हो, तो बस ज़रा मुझे बता दो। वो साला कहीं किसी मेले में, तमाशे में या गंगा के पार मिल जाए, तो लाठी लेकर लड़ लूं। ज़रा-सा ग़ौर करने पर पता चलता है कि इस गुंडे भाई को सचमुच ही वो ‘साला’ मिल ही गया, मगर थोड़ा जबरा निकला। उसने तेग़ अली का ही सर फोड़ दिया, सो अब वो माशूक़ से उसकी क़ीमत मांग रहा है।

बिन चुकौले लहू का मोल न छोड़ब तोहे रजा गोजी से बा कपार गयल फट तोरे बदे

इसका मतलब बोले तो यह है कि तुम्हारे पीछे लाठी-बाज़ी करने में मेरी खोपड़ी भी लाठी का वार खा कर फट गई है। अब मैं अपने ख़ून का मोल वसूले बिना नहीं छोड़ूंगा। इस सारी बात का मतलब यह नहीं कि तेग़ अली अपनी माशूक़ से सिर्फ़ ऐसी गुंडई की बातें ही करता है। उसकी शायरी में माशूक़ को लेकर बहुत कोमल भावनाओं का इज़हार भी है।

अब ज़रा ये कुछ शेर देखें :

हम खरमिटाव कइली है रहिला चबाय के भेंवल धरल बा दूध में खजा तोरे बदे

(मैंने तो चना चबाकर सुबह का नाश्ता कर लिया है, मगर तुम्हारे लिए दूध में खाजा भिगो कर रखा हुआ है।)

जरदोजी जूता टोपी डुपट्टा बनारसी सहुआ से ले ली आज रजा तोरे बदे

(ए राजा, आज मैं तुम्हारे लिए दुकानदार से सोने के तार और सलमा सितारों से जड़ी टोपी, मखमल साटन के जूते और बनारसी दुपट्टा झटक लाया हूं।)तो ऐसा था यह गुंडा कवि तेग़ अली।

और... और एक बात। तेग़ अली के कुछ शेर पढ़ते हुए उसी भावना के बड़े शायरों के कुछ शेर मुझे याद हो आए। मिसाल के तौर पर यह एक शेर।

का माल असरफी हौ रुपैया तोरे बदे हाज़िर बा जिउ समेत करेजा तोरे बदे

हमारे आज के प्रसिद्ध शायर शहरयार साहब ने फिल्म ‘उमराव जान’ के लिए लिखा ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए’।

कहने का मतलब यह कि कोई कितना भी बड़ा गुंडा क्यों न हो, आख़िर को प्रेम उसमें छुपे बेहतर इंसान को बाहर आने पर मजबूर कर ही देता है। और क्योंकि मेरी बात पूरी हो चुकी है, सो मैं भी यहां से इस घड़ी जाने को मजबूर हूं। सो मैं चला। अगले ह़फ्ते फिर वही बात- आपस की बात।






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