सेहवाग और गंभीर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सलामी जोड़ी कहा जा सकता है। द्रविड़, तेंडुलकर, लक्ष्मण, युवराज और धोनी बैटिंग लाइन-अप को मजबूती प्रदान करते हैं। हमारी गेंदबाजी भी गहराई और विविधता लिए हुए है। हालांकि सपाट पिचों पर गेंदबाजी में और पैनापन लाने की जरूरत है। यदि टीम इस साल होने वाली सभी सीरीज में विजय हासिल करती है तो वह भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम बन जाएगी।
न्यूजीलैंड का दौरा कर रही भारतीय क्रिकेट टीम को लेकर बहस चल रही है कि क्या यह टीम भारतीय इतिहास की सबसे श्रेष्ठ टीम है? सीमित ओवरों के क्रिकेट को लेकर तो कोई संदेह नहीं है, लेकिन जहां तक टेस्ट टीम का सवाल है, उसे सर्वश्रेष्ठ टीम कहने में मुझे संकोच हो रहा है। वर्ष 1971-73, 1975-76 और 1986-87 के समय की टीमें भी बहुत शानदार टीमें थीं।
भारतीय टीम ने न्यूजीलैंड के खिलाफ शुरू के दोनों मैचों में शानदार प्रदर्शन किया है। जिस तरह से दूसरा टेस्ट मैच बचाया गया, वह भारतीय खिलाड़ियांे की दृढ़ता का परिचायक है।
पहले टेस्ट मैच के आक्रामक खेल के विपरीत दूसरे टेस्ट मैच में रक्षात्मक खेल के प्रदर्शन के लिए न केवल बहुमुखी प्रतिभा की दरकार थी, बल्कि एक बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा की भी और इसी का प्रदर्शन टीम के खिलाड़ियों ने किया। मैं जानता हूं कि अतीत की अधिकांश टीमें पहली पारी में 300 रन से पिछड़ने के बाद आत्म-समर्पण कर देतीं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस टीम के पास जज्बा और जुनून है। इसे स्वयं पर विश्वास है और नजरिया सकारात्मक है। इसका एक श्रेय तो हमारे चमत्कारी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को जाता है। लेकिन टीम के पास केवल मानसिक दृढ़ता ही नहीं है, बल्कि यह अद्भुत प्रतिभा का बेजोड़ मिश्रण है। इसमें गजब का संतुलन है।
वीरेंद्र सेहवाग और गौतम गंभीर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सलामी जोड़ी कहा जाए तो उसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी। सेहवाग की आक्रामक बल्लेबाजी को गंभीर की गंभीर बल्लेबाजी का साथ मिलता है। गंभीर में अपने बूते मैच जिताने और बचाने दोनों का दमखम है और इस मायने में वे सेहवाग से भी एक कदम आगे हैं। द्रविड़, तेंडुलकर, लक्ष्मण, युवराज और धोनी बैटिंग लाइन-अप को मजबूती प्रदान करते हैं।
ऐसी शायद ही कोई टीम होगी जिसे यह वरदान हासिल हो। वरिष्ठ खिलाड़ियों को लेकर मची हाय-तौबा अब बेमानी हो चुकी है। वरिष्ठ खिलाड़ियों ने इसे साबित भी कर दिखाया है। अभी तो कमजोर कड़ी युवा खिलाड़ी युवराज ही नजर आते हैं। हालांकि जो दिन उनका होता है, उस दिन वे अद्भुत प्रदर्शन करते हैं।
हमारी गेंदबाजी भी गहराई और विविधता लिए हुए है। हालांकि सपाट पिचों पर गेंदबाजी में और पैनापन लाने की जरूरत है। जहीर खान अपने कॅरियर में प्रदर्शन के मामले में चरम पर हैं। ईशांत शर्मा अपने पहले दो सत्रों में ही साबित कर चुके हैं कि आने वाले सालों में वे किस तरह के खिलाड़ी बनने वाले हैं।
तेज गेंदबाजों की हमारे यहां कमी नहीं है, लेकिन चिंता स्पिन के मोर्चे पर है। हालांकि हरभजन सिंह के खाते में 300 से भी अधिक विवेक हैं और वे दुनिया के खतरनाक स्पिन गेंदबाजों में शुमार किए जाते हैं, लेकिन उनके अलावा ऐसे स्पिन खिलाड़ी बहुत कम नजर आ रहे हैं जो अपने दम पर मैच जिता सकें। अमित मिश्रा, प्रज्ञान ओझा और पियूष चावला जैसे युवा स्पिनरों में हालांकि प्रतिभा कूट-कूटकर भरी हुई है।
देखा जाए तो इस क्रिकेट टीम में प्रतिभा और अनुभव का ऐसा गजब का संतुलन है जिसकी चाहत किसी भी कप्तान और कोच को होगी। पिछले 18 महीनों में हुए कुल 22 टेस्ट मैचों में टीम ने 8 टेस्ट जीते हैं जबकि केवल पांच टेस्ट हारे हैं। यह एक शानदार रिकॉर्ड है, लेकिन इसके बावजूद इसे अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम मानने को लेकर मेरे मन में संदेह पैदा हो रहा है।
इसकी वजह है क्षेत्ररक्षण। यह बहुत ही खराब है। जो टीम नंबर वन बनने की सोच रही हो, वह मैदान में इतनी सुस्ती नहीं दिखा सकती और इतने कैच नहीं छोड़ सकती। फिर विकेटों के बीच भागने की अपनी अलग समस्या है। यदि धोनी इस टीम को नंबर वन बनाना चाहते हैं तो उन्हें इससे निपटना होगा।
इसकी दूसरी समस्या यह है कि यह टीम जीत के सिलसिले को बनाए रखने में कामयाब नहीं हो पा रही है। दो मैच अच्छा खेलते हैं और तीसरे मैच में वही टीम लचर हो जाती है। वर्ष 1971, 75 और 86 के दौरान भी तत्कालीन टीमों ने कई मैच जीते, लेकिन वे टीमें भी अच्छे प्रदर्शन के क्रम को बरकरार नहीं रख पाईं।
यदि यह टीम इस साल होने वाली सभी सीरीज में विजय पताका लहराती है तो वह न केवल भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम बन जाएगी, बल्कि दुनिया की नंबर एक टीम भी।