Manoranjan
Aap Ki Baat Aap Ki Baat आज की कहानी असल में आत्मा की कहानी है। एक ऐसी आत्मा की कहानी, जिसने ख़ुद को अपने आराध्य से इतना एकमएक कर लिया कि जब उसकी आवाज निकलती, तो लोग भरम में पड़ जाते कि यह के.एल. सहगल की आवाज है या आत्मा की। इस आत्मा के नाम के आगे दो शब्द और भी जुड़े थे- सी.एच. मतलब चैनानी हशमतराय। पूरा नाम था आत्माराम हशमतराय चैनानी, मगर हमेशा ख़ुद को आत्मा ही माना। इस आत्मा ने सहगल वाले अंदाÊा में जीवन को ढाला, सहगल की तरह गाने की कोशिश की और सहगल की ही तरह दुनिया से विदा ली।
बात 1923 की है। हैदराबाद, सिंध के एक परिवार में 10 दिसंबर के दिन एक बच्चे का जन्म हुआ। इस बारे में अब तक किसी से नहीं सुना है कि नवजात शिशु पालने में जब किलकारियां लेता था या रोता था, तब वह संगीत जैसा सुनाई देता था, लेकिन जवानी में क़दम रखते ही उसने दुनिया को इस बात का अहसास करा दिया कि वह पालने में दरहक़ीक़त वैसा ही कर रहा था।
बीसवीं सदी के 30 और 40 वाले दशक में सहगल की गायकी ने दुनिया को दीवाना बना रखा था। ऐसे में आत्मा कैसे अछूता रह पाता। संगीत से तो पहले से ही मोहब्बत थी, उस पर सहगल की आवाÊा। बस Êिाद यूं कि गाना है, तो ऐसा ही गाना है। कमाल यह है ढेर सारी कहानियों से अलग, परिवार ने भी संगीत साधना की इस अनोखी Êिाद में पूरा-पूरा साथ दिया।
आत्मा गाते रहे। गाते रहे और गाते-गाते एक दिन ऐसे महापुरुष से मुलाक़ात हो गई, जो उसी की तरह संगीत का दीवाना था। उसी की तरह कुछ कर दिखाना चाहता था। नाम था ओंकार प्रसाद नैयर, यानी ओ.पी. नैयर। दोनों साथ हुए तो बात कुछ बन ही गई। चार गीत रिकार्ड हुए। एक शाम में ख़र्च हो जाने लायक पैसे भी मिल गए। उसी शाम ख़र्च हो भी गए।
प्रीतम आन मिलो
18 जनवरी 1947 को सहगल साहब चल बसे। सोग़ में डूबे सारे देश के लोगों ने इसी बीच एक आवाÊा सुनी। लोगों ने अपने आंसू पोंछ कर इस आवाÊा को Êारा ठीक से सुना। दूसरी बार सुना। तीसरी बार सुना। बार-बार सुना। कौन है, जो सहगल की आवाÊा में गा रहा है। हर बार जवाब मिला यह सी.एच.आत्मा की आवाÊा है, जो बिछड़े हुए प्रीतम को आवाÊा दे रही है कि ‘प्रीतम आन मिलो, प्रीतम आन मिलो, दुखिया जिया पुकारे प्रीतम आन मिलो’। सरोज मोहिनी नैयर का लिखा यह वही गीत था, जिसे ओ.पी. नैयर ने धुन दी थी।
लोगों को लगा सहगल बहुत दयावान थे। जाते-जाते अपनी आवाÊा अपने चाहने वालों के लिए छोड़ गए हैं। मगर सच इससे थोड़ा अलग था। सहगलनुमा आवाÊा, गायकी का वही अंदाÊा सही, मगर सहगल का दर्द तो अकेले सहगल के पास ही था। उस दर्द में डूबी लय, तान, मुरकियां कोई आख़िर लाए, तो कहां से लाए। सो सी.एच. आत्मा ख़ूबसूरत गायक होने के बावजूद सहगल की याद दिलाने वाली आवाÊा ही बन कर रह गए।
पर एक बात Êारूर है कि इस अंतर को जानने वाला ही जान पाता है। अभी कुछ महीने पहले ही इंदौर से आए अपने एक अÊाीÊा दोस्त के लिए मैंने सी.एच. आत्मा के गीत बजाए, तो संगीत के उस अच्छे जानकार दोस्त ने भी उस आवाज को सहगल साहब की आवाÊा की तरह पहचाना। सी.एच. आत्मा उनके लिए थोड़ा-सा भूला-बिसरा नाम था। उस दोस्त ने सवाल किया- ‘आख़िर इन दो आवाजों की इतनी समानता के बावजूद इन आवाजों को अलग-अलग कैसे पहचाना जाए। इनमें अंतर क्या है?’ मैंने कहा- ‘आत्मा का। सहगल की गायकी आत्मा की आवाज है और सी.एच. आत्मा की गायकी एक गायक की आवाज है।’
इस सारी बात का मतलब यह नहीं कि आत्मा कमÊाोर गायक थे। वे बहुत ही अच्छे गायक थे, मगर उनकी तुलना हर व़क्त सहगल जैसे अद्वितीय कलाकार से होती रही और इस तुलना में तो आत्मा ही क्यों, कोई दूसरा गायक भी कहीं खड़ा नहीं हो पाता।
ख़ैर, बात को थोड़ा और आगे बढ़ाते हैं। ‘प्रीतम आन मिलो’ की रिकार्ड तोड़ सफलता ने आत्मा को घर-घर तक पहुंचा दिया। एक दिन यह आवाÊा उस दौर के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक दलसुख पंचोली के कानों तक भी पहुंची। उन्होंने तलाश करवाई और आत्मा को बुला लिया। आत्मा उस समय कलकत्ते में हिमालयन एयर लाइंस में बतौर रेडियो ऑफ़िसर काम कर रहे थे। इस बुलावे से वे खिल उठे।
1949 में पंचोली ने सी.एच. आत्मा को अपनी कंपनी के लिए पांच साल के लिए अनुबंधित कर लिया। आत्मा काफ़ी ख़ूबसूरत श़िख्सयत वाले इंसान थे, लिहाÊा पंचोली ने उन्हें गायकी के साथ-साथ हीरो की भूमिकाएं देने का भी वादा किया।
1951 में आत्मा की आवाज पहली बार फिल्म के पर्दे पर गूंजी। फिल्म थी पंचोली प्रोडक्शन की ‘नगीना’। फिल्म के हीरो थे दिलीप कुमार के छोटे भाई नासिर ख़ान। हीरोइन थी इसी साल मिस इंडिया का ख़िताब जीत चुकी नूतन। संगीत शंकर-जयकिशन का। इस फिल्म में आत्मा की आवाÊा में तीन गीत थे। इनमें से एक गीत ‘रोऊं मैं सागर के किनारे, सागर हंसी उड़ाए/ क्या जानंे ये चंचल लहरें, मैं हूं आग छुपाए’ ने ऐसी धूम मचाई कि ‘प्रीतम आन मिलो’ जैसी महान रचना से भी आगे निकल गया। आज भी यह गीत सी.एच. आत्मा की पहचान बना हुआ है।
पंचोली ने अपने वादे के मुताबिक आत्मा को 1954 में फिल्म ‘भाई साहब’ में बतौर हीरो भी पेश कर दिया। हीरोइन थी पूर्णिमा। नीनू मजुमदार के संगीत में बंधे फिल्म के 10 गीतों में से 8 में आत्मा की आवाÊा थी और दो लता मंगेशकर की आवाÊा में। फिल्म फ्लॉप। इसी साल इनकी दूसरी फिल्म रिलीÊा हुई ‘बिल्वा-मंगल’ इसमें सुरैया इनकी हीरोइन थीं, मगर नतीजा वही- फ्लॉप। इस फिल्म में बुलो.सी. रानी का बहुत ही शानदार संगीत था। ‘पनघट पर मोरे श्याम, बजाए मुरलिया’ इतनी मद्धम और नफ़ासत भरी आवाÊा में आत्मा ने गाया है कि बेख़ुदी के नशे में आप दाद देना ही भूल जाएं। देर बाद होश आए, तो आप बैठे-बैठे ‘वाह-वाह’ करने लगें, फिर भले ही आस-पास बैठे लोग आपको दीवाना समझते रहें।
सी.एच.आत्मा, ओ.पी.नैयर के पसंदीदा गायकों में से थे। नैयर ने अपनी शुरुआत भी 1952 में पंचोली से ही की और आत्मा से ‘आसमान’, ‘ढाके की मलमल’ जैसी फिल्मों में गीत भी गवाए। बाद में फिल्मों और संगीत का रुख कुछ ऐसा बदला कि नैयर चाह कर भी आत्मा को गीत नहीं दे पाए।
इन सारी स्थितियों से बिना घबराए आत्मा गाते रहे। ग़ैर-फिल्मी गीत, ग़जल, भजन। एक से एक आला संगीतकारों के साथ। रिकार्ड भी ख़ूब बिकते रहे। सच कहता हूं इनके ग़ैर-फिल्मी गीतों में ऐसी खुमारी है कि पूछिए मत। गीत गिनाऊं? याद दिलाऊं? जैसे ख़ैयाम साहब की धुन और मधुकर राजस्थानी के बोलों वाला अदभुत गीत ‘चलो न गोरी मचल-मचल के अभी तो बालापन है/ चांद सी सूरत, मोहिनी मूरत, पांव में झांझन है’।
ख़ैयाम के साथ ही ‘नैनों में दो नैन समाए’। ओ.पी.नैयर के साथ कबीर के दोहे ‘आया था किस काम को’ और ‘मैं घी का दिया जलाऊं रे’। ग़ालिब की ‘हैरां हूं दिल को रोऊं कि पीटूं जिगर को मैं’ और ‘हÊारों ़ख्वाहिशें ऐसी’ जैसी कई ग़Êालें। ‘ओढ़ चुनरिया तारों की चंदा को लेने रात चली’, ‘यारो मुझे मुआफ़ रखो मैं नशे में हूं’, वग़ैरह-वग़ैरह।
और... आत्मा उन फ़नकारों में से थे, जिन्होंने अपने फ़न को अपना सब कुछ सौंप दिया, मगर बदले में उन्हें बराबरी का सिला न मिल सका। सहगल साहब के ऩक्शे क़दम पर चलते हुए वे भी सुरा प्रेमी हो चले थे। Êामाना ऊंची आवाज में गाने वालों को गले लगाने का आ गया, तो तलत महमूद और आत्मा जैसी नर्मो-नाÊाुक गायकी वाले लोग हाशिए पर चले गए। तब स्टेज शोÊा ही उनका सहारा थे।
इन दोनों गायकों की बहुत दोस्ती भी थी और दोनों साथ-साथ ही स्टेज शोÊा भी करते थे। इन स्टेज शोÊा में हर बार सी.एच. आत्मा से अलग-अलग गीतों की फ़रमाइश होती, मगर एक गीत की फ़रमाइश हर शो में होती- ‘रोऊं मैं सागर के किनारे’। आख़िर एक दिन आत्मा का दर्द फूट ही पड़ा। ज्योंही इस गीत की फ़रमाइश हुई, उन्होंने हंसते-हंसते कह ही दिया- ‘.. बीस साल से सागर किनारे वाले फ्लैट में रो ही तो रहा हूं, आप कहते हैं तो यहां भी रो लेता हूं।’
1964 में वी.शांताराम की फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ में ‘मंडवे तले ग़रीब के दो फूल खिल रहे हैं’ गाते हुए पर्दे पर दिखाई दिए। 11 साल बाद 6 दिसंबर 1975 को, 52 साल की उम्र में उनकी मौत की ख़बर आई। आज कोई 34 साल बाद मुझे मौक़ा मिला, तो मैं याद कर रहा हूं। कल आपको मौक़ा मिलेगा, तो आत्मा को सुनिए। सी.एच. आत्मा भुला देने वाली चीज नहीं है।
भुला देने वाली चीज तो मेरे लिए यह भी नहीं है कि अपनी स्टोरी खलास हो चुकी है और अगले ह़फ्ते फिर कोई नई स्टोरी सुनानी है। सो, बस। मैं चला। हाजिर होता हूं फिर अगले ह़फ्ते। तब तक जय-जय।