बुश पर 14 दिसंबर 2008 को जूता फेंकने की घटना आज भी दुनिया भर के लोगों के जहन में कहीं दबी छुपी थी। आक्रोश के विस्फोट का यह तरीका कई लोगों को सही नहीं लगा लेकिन आक्रोश और उसकी वजह पर काफी लोग सहमत हैं।
भारतीय लोकतंत्र में इस तरह की हरकत की उम्मीद किसी ने नहीं की थी। आज दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार जनरैल सिंह की इस हरकत ने बुश और जैदी के जूता कांड को फिर सी जेहन में ताजा कर दिया। जनरैल और जैदी में हैं कई सारी समानताएं।
दोनों नें राजनेता और प्रतिष्ठित पद पर आसीन व्यक्ति पर जूता फेंका।
दोनों पेशे से पत्रकार है।
दोनों ने गुस्से में जूता ही फेंका।
दोनों ने चुनावों के पहले जूता फेंका।
जैदी और जनरैल दोनों में काफी सारी असामानताएं भी हैं।
एक लोकतांत्रिक देश भारत का पत्रकार है और जैदी इराक का पत्रकार है
जैदी का जूता 10 नंबर का था और जनरैल का 8 नंबर का
जैदी का जूता लैदर शूज़ था और जनरैल का स्पोर्टस शूज
जैदी ने एक के बाद एक दोनों जूते फेंक दिए थे और जनरैल ने केवल एक जूता फेंका
जैदी के जूते को जला दिया गया था और जनरैल का जूता यूं ही पड़ा रहा
जनरैल सिक्ख मसले पर टाइटलर को क्लीन चिट दिए जाने से गुस्साया था और जैदी इराक पर अमेरिकी हमलों से आक्रोशित था
जनरैल ने चिदंबरम से पहले सवाल किया और फिर संतुष्ट न होने पर जूता फेंका वहीं जैदी ने सवाल नहीं किया सीधे जूता फेंका
जैदी को अपनी इस हरकत पर कोई पछतावा नहीं था पर जनरैल ने हरकत को अंजाम देते ही अफसोस जताया और कहा वह नहीं चाहता आगे कोई ऐसा करे
जैदी को इस हरकत की सजा मिली तीन साल और बुश ने नहीं किया माफ, जनरैल को चिदंबरम ने माफी दे दी और उसे पूछताछ कर छोड़ भी दिया गया।
आपको क्या लगता है.....
किसी पत्रकार की यह हरकत सचमुच भावनात्मक विस्फोट है या फिर हीरो बनने के लिए सोची समझी साजिश.....
क्या होगा जनरैल का भविष्य
वह राजनीति में भाग्य आजमाएगा
दूसरी पार्टियां उसका इस्तेमाल कर सकती हैं
सिक्ख राजनीति में जनरैल लड़ाई लडेगा
पत्रकार के तौर पर काम पर लौटेगा
या फिर कुछ और ......
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