बच्चों की पढ़ाई और अभिभावकों की पीड़ा
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बच्चों की पढ़ाई और अभिभावकों की पीड़ा

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क्या बच्चों की पढ़ाई भी माता-पिता को पीड़ा पहुंचा सकती है? यह तो उनके लिए बहुत आनंद और संतोष का विषय होना चाहिए। उन्हें यह आत्मसंतुष्टि मिलनी चाहिए कि उनके बच्चे की बुद्धि विकसित होगी और उसका ज्ञान बढ़ेगा।

वे अपने पालन-पोषण में उसका शारीरिक विकास कर सकते हैं, काफी हद तक उसको संस्कारवान भी बना सकते हैं, पर विवेक और मानसिक दक्षता के लिए जिस परामर्श, मार्गदर्शन और निर्देशों की आवश्यकता होती है, उसके लिए तो बच्चों को स्कूल भेजना ही होता है।

यही स्वस्थ और उचित व्यवस्था है। विश्व की सारी सभ्यताओं में गुरु-शिष्य परंपरा बनाई गई। मानव के विकास में इन अध्ययन केंद्रों तथा इनमें शिक्षकों, अध्यापकों द्वारा दी गई शिक्षा का अमूल्य योगदान है। विश्व की सभी ऐतिहासिक घटनाओं के महानायकों के जिक्र के साथ-साथ उनके गुरुओं और अध्ययन केंद्रों की चर्चा भी अवश्य होती है।

श्रीराम, श्रीकृष्ण, पांडवों, कौरवों से लेकर यूनान में सुकरात की शिष्य परंपरा, सिकंदर और अरस्तु की चर्चा के साथ-साथ चीन में कन्फ्यूसिस तक जाती है। ज्ञानी, दार्शनिक गुरुओं की समूची मानव सभ्यता नमन करती है।

समय बदलने के साथ अध्ययन केंद्रों के स्वरूप और व्यवस्था में जो परिवर्तन आए, वह उनके और अधिक विकास तथा प्रगति के स्थान पर इन संस्थाओं के अवमूल्यन साबित हुए। स्कूल व्यापारिक केंद्र बन गए। यह एक ऐसा उद्योग माना जाने लगे, जिसके रॉ मटेरियल में कभी कमी नहीं आ सकती।

शान और शौकत की प्रतीक स्कूलों की बिल्डिंग और सुविधाओं की लंबी सूची पेरैंट्स और बच्चों को आकर्षित करने का एक सशक्त साधन बन गई है। बड़ी-बड़ी फीस देकर माता-पिता अपने बच्चों को इन सुविधाओं का उपयोग करने के लिए स्कूलों में भेजते हैं। बच्चे स्कूल से लौटते हैं, तो या वे घर पर किसी ट्यूटर से या किसी ट्यूटर के दो कमरों के घर में ट्यूशन पढ़ने चले जाते हैं। यदि बच्च स्कूल के परीक्षा परिणाम की प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं चल पाता, तो पेरैंट्स को बहुत नेक सलाह दी जाती है कि वे स्कूल से बच्चे को निकाल लें।

पेरैंट्स की पीड़ा और बढ़ गई है। लगभग सभी स्कूलों ने फीस बढ़ाने की बात शुरू कर दी है। इसके लिए पेरैंट्स को सूचना जारी हो गई है। मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों में पति-पत्नी दोनों ही कमाई कर अपने बच्चों को तथाकथित अच्छी शिक्षा दिलाने और उनका भविष्य संवारने में जुटे हैं।

वे अपनी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक थकान को दरकिनार कर केवल बच्चों की फीस की व्यवस्था करते हैं। ऐसे में फीस बढ़ाने पर वे किस तनाव और दबाव से गुजरेंगे और उसका प्रभाव पारिवारिक माहौल पर कैसा पड़ेगा, इसकी चिंता करना भी जरूरी है।

यह निर्णय एकतरफा नहीं होना चाहिए। स्कूल प्रबंधन, व्यवस्थापक और पेरैंट्स मिलकर इस पर चर्चा करें। यदि कहीं भी गुंजाइश हो, तो फीस की बढ़ोत्तरी को कम किया जाए। शिक्षा संस्थान यदि अपना व्यवसायिक नजरिया और व्यापारिक सोच को थोड़ा बदल पाएं, तो बच्चों की ओर से उनके पेरैंट्स की पीड़ा कुछ कम हो जाएगी।

गुरुकुल की चर्चा बहुत पावन और पवित्र है, पर आधुनिक स्कूलों से यह तो आशा की जा सकती है कि वे अपने व्यापारिक नजरिए को कुछ कम करने का शुभ कार्य करें।






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