इंदौर।सूर्य बादलों की ओट में रहकर कुछ समय के लिए भले ही छिप जाए लेकिन उसकी किरणों का तेज ही उसे फिर आसमान में चमकाता है। ठीक ऐसे ही नायक की गति है, वे भले ही छिपे हुए हों लेकिन समय मिलते ही वे सामने आएंगे। यह कहना है ख्यात अभिनेता आशुतोष राणा का। वे यहां सीरियल सरकार की दुनिया के प्रमोशन के लिए आए थे।
पानी पाने के लिए हमें उसे बचाना होगा। जब तक युवा इसकी गंभीरता नहीं समझेंगे तब तक समाज का भला नहीं होगा। यह पंचतत्व का आवश्यक तत्व है। इसके बिना हम जी नहीं सकते हैं।
यह बात भास्कर से खास बातचीत में आशुतोष राणा ने कही। वे कहते हैं बगैर पानी के हम रोगी हो जाएंगे ठीक वैसे ही प्रकृति भी रोगी हो जाती है। उन्नति के लिए हम पतन का मार्ग न चुनें। हमारे पूर्वजों ने हमें वृक्षों की जो थाती दी थी वह हमें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है। हमें एक गिलास पानी भी आखिरी गिलास समझकर पीना होगा तभी हम व्यर्थ में पानी बहाने की आदत से बच पाएंगे। पर्यावरण की सुरक्षा आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी है। जैसे घर में सुरक्षा के लिए भविष्यनिधि बचाते हैं वैसे ही वृक्षों को रोककर रखना होगा। जब तक उन्हें पानी से लबरेज नहीं रखेंगे वे भला कैसे पानी देंगे। युवाओं को हक है कि वे ग्लैमर के सपने देखें और इसके लिए प्रयास करें कि वे पूरे कैसे होंगे। सपना देखने के लिए सोना होगा और पूरा करने के लिए जागना जरूरी है। यहां सपने हैं विचार और कर्म है जागृत अवस्था। ऐसे ही इच्छा और क्षमता में भी फर्क है।
फिल्मों में गायब हुआ आम आदमी
फिल्मों में भी आम आदमी गायब हो चुका है। आम आदमी स्वतंत्रता के ठीक बाद फिल्मों का नायक हुआ करता था। तब वकील, डॉक्टर, इंजीनियर नायक होते थे और विलेन होता था अमीर वर्ग, लेकिन आज के समय विलेन नायकों के समान पूजे जा रहे हैं। दुनिया में जो सर्वश्रेष्ठ लोगों की सूची बनती है उनमें पं. रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल्ला खां, मोहन राकेश या कोई साहित्य विधा का ज्ञाता नहीं होता। हमारे देश का नायक गायब नहीं हुआ है वह तो छिपा हुआ है। मुझे विश्वास है वह तीन-चार सालों में सामने आ जाएगा। हमारे देश में राजनीति का जो ढर्रा है वही गलत है। सेवा के नाम पर यहां धोखा किया जा रहा है। जनसेवक जनप्रतिनिधि बनकर लूट मचा रहा है। यदि राजनीति को प्रोफेशनल कर दिया जाए तो हो सकता है देश की दशा सुधर जाए। वे कहते हैं पारदर्शिता जरूरी है। परिवारों में लोग पहले अपने बेटे-बेटियों और रिश्ते-नातों के लिए जीते थे। अब वे जी रहे हैं बैंक का कर्ज चुकाने के लिए। बेटे-बेटियों की पढ़ाई, कार और घर का लोन आदि चुकाने के लिए उनकी ईएमआई भरने के लिए चिंतित हैं। उनके दिलों से सुकून जा चुका है।
जंग न लगने दें मतदान की चाबी में
* मतदान उस चाबी की तरह है जिससे सत्ता परिवर्तन किया जा सकता है, इस चाबी में जंग न लगने दें। लोगों को समझना चाहिए कि जितना कम मतदान होगा उतना ही नेताओं को फायदा होगा। घरों से निकलें, पिकनिक जाने के बजाय उत्साह से मतदान करें। जब हम रिश्ता करने जाते हैं तो सामने वाले पक्ष की हर जानकारी निकालते हैं लेकिन नेताओं की पड़ताल नहीं करते।
* जब हम किसी लक्ष्य की ओर चलना शुरू करते हैं तो सफलता का लक्ष्य किसी पेड़ सा नजर आता है लेकिन पास पहुंचते ही यह लक्ष्य सूई की तरह दिखाई देने लगता है। सफलता का शिखर नुकीला होता है इसलिए इस पर एक ही व्यक्ति विराजमान हो सकता है। खुद से सवाल करें और लक्ष्य की ओर बढ़ चलें।
* अपनी अंदर की ताकत को पहचानना होगा। परिस्थितियां कठिन हैं लेकिन यही आपके दम की परीक्षा होगी। संघर्ष करते रहें, अंधियारी रात बहुत लंबी है लेकिन अंतहीन नहीं, सुबह जरूर होगी।
* स्थिति बदल रही है, वास्तविक भारत अब फिल्मों में दिखाई देने लगा है। फिल्में समाज का प्रतिबिंब है। वास्तविकता को दिखाते हुए ही मनोरंजन होना चाहिए।