विदेशी धरती पर ऐतिहासिक जीत
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विदेशी धरती पर ऐतिहासिक जीत

चार दशक लंबी निराशा के बाद न्यूजीलैंड की धरती पर वनडे और टैस्ट दोनों सीरीज में टीम इंडिया की ऐतिहासिक जीत को विश्व विजय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा सकता है।

team india 1968 में न्यूजीलैंड में पहली टैस्ट सीरीज जीतना अपने आप में कम ऐतिहासिक नहीं था। उससे पहले भारत की क्रिकेट टीम ने विदेशी धरती पर कभी कोई श्रंखला नहीं जीती थी। नवाब पटौदी के नेतृत्व में तब भारत ने पहली बार विदेशी धरती पर सीरीज जीतने का स्वाद चखा था। बाद के 41 वर्षो में भारत ने विदेशों में समय-समय पर ग्यारह श्रंखलाएं जीतीं, लेकिन उनमें निरंतरता नहीं थी।

न्यूजीलैंड में मौजूदा जीत विश्व की श्रेष्ठतम टीम के रूप में उभरने की आकांक्षा और जज्बे के साथ आई है। यह जीत इस बात की घोषणा है कि टीम इंडिया किसी भी देश में, किसी भी तरह के मैदान पर, किसी भी किस्म की आबोहवा में और किन्हीं भी परिस्थितियों में किसी भी टीम का मुकाबला करने की क्षमता और आत्मविश्वास से लैस है। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने सही कहा है कि वे मानक स्थापित करना चाहते थे, जो उन्होंने कर दिया है। यह मानक सबसे ज्यादा खुद टीम इंडिया के लिए है- प्रेरणा भी और चुनौती भी।

न्यूजीलैंड में टीम इंडिया को अपनी कुछ पुरानी और जानी-मानी कमजोरियों से उबरते देखा जा सकता था। हालांकि यह दौरा टी-20 मैचों में पराजय के साथ शुरू हुआ था, लेकिन उसे अब नए मौसम और माहौल के हिसाब से तेजी से नहीं ढाल पाने का नतीजा मानकर भुलाया जा सकता है। वनडे श्रंखला शुरू होने के साथ मौसम का अभ्यस्त होते ही टीम इंडिया फिर ताल और सुर में लौट आई।

महत्वपूर्ण यह है कि अब टीम जीत के लिए दो-चार खिलाड़ियों पर निर्भर नहीं है। निजी प्रदर्शन और उपलब्धियां टीम की जीत के व्यापक लक्ष्य में समाहित हैं। खुशी की बात यह भी है कि दबाव में लड़खड़ा जाने की बजाय अब टीम इंडिया मानसिक दृढ़ता का परिचय दे रही है। इसका अच्छा उदाहरण दूसरा टैस्ट था। कोई और वक्त होता तो फॉलोऑन के बाद भारतीय टीम अपने दिलो-दिमाग में धराशायी हो जाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और दूसरी पारी में पूरे दो दिन बल्लेबाजी करके भारत ने हार को टाल दिया।

धुरंधर तिकड़ी- सचिन, द्रविड़ और लक्ष्मण ने सीरीज जीत में अहम योगदान दिया लेकिन टैस्ट बल्लेबाज के रूप में गौतम गंभीर की सफलता इस दौरे की खास उपलब्धि है। धोनी की कप्तानी का जादू इस जीत में भी निर्णायक रहा। असली सार्थकता अलबत्ता यही है कि अब टीम इंडिया जीत को अपनी आदत बनाने और निरंतर सफल होने के संकल्प से भरी दिखाई देती है।



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