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[an error occurred while processing this directive]आपस की बात.वह स्मार्ट है। आकर्षक है। उच्च शिक्षा प्राप्त योग्य युवती है। उसने एमबीए किया है और एक स्थापित कापरेरेट ऑॅफिस में कार्यरत हैं। जाहिर है कि अपनी कुशलता और दक्षता के कारण अच्छा वेतन पा रही है, पर वह व्यथित है। कभी-कभी आक्रोशित भी हो जाती है ।इसका कारण यह है कि जब भी उसके विवाह की चर्चा चलती है और देखने-दिखाने की तथाकथित रस्म होती है, तो उसकी पाक दक्षता का प्रदर्शन भी साथ-साथ होता है।
भारतीय समाज में रिश्ता तय करते समय ऐसा तो प्राय होता नहीं है कि एकबारगी में ही लड़की पसंद कर ली जाए। वह पुरानी खानदानी मान्यताएं कब की लुप्त हो गईं, जब किसी परिवार में लड़का-लड़की का रिश्ता किसी पारिवारिक आत्मीय के सुझाने पर ही तय हो जाता था। अब तो वर और वधु दोनों की परस्पर पसंदगी के साथ-साथ परिवार वालों की भी कई शर्ते शामिल होती हैं।
कई बार देखने और दिखलाने की बाद भी रिश्ता तय नहीं हो पाता। कहीं जन्म कुंडली आड़े आ जाती है, तो कहीं दान-दहेज देने की हैसियत पर बात टूट जाती है। कहीं फिगर, तो कहीं रंगत को लेकर ही रिश्ता नहीं किया जाता।
उस युवती के साथ भी दो-चार बार ऐसा हो चुका है पर वह इससे व्यथित नहीं है। उसकी व्यथा यह है कि हर बार इस देखने-दिखाने के समारोह में उसे एक-दो व्यंजन अपने हाथ से बनाने पड़ते हैं। उसे उसकी पाक कला की भी विविधता दिखानी होती है।
अतिथियों से कई बार यह कहा जाता है कि उसे घर के काम में भी बेहद रुचि है और खाना बनाने में तो वह एक्सपर्ट है। उस युवती ने विद्रुप से हंसते हुए कहा कि दूसरों को विविध स्वादिष्ट व्यंजन बना-बनाकर और खिलाकर लगता है कि मैं इतनी एक्सपर्ट हो गई हूं कि चाहूं तो कुंकिंग क्लासेस खोल सकती हूं।
उसका आक्रोश यह भी है कि उसकी उच्च शिक्षा की योग्यता पर कोई चर्चा नहीं की जाती। वह इसी योग्यता के बल पर यदि प्रतिष्ठित पद अर्जित कर पाई है, तो उस विषय को छुआ तक नहीं जाता? इसकार्य की चुनौतियों, उनसे संबंधित कार्यक्रम, उसकी भविष्य में उस कार्य को लेकर योजनाएं आदि कई ऐसे विषय साधारण बातचीत में नहीं उठाए जाते।
उसको लेकर जो भी जजमेंट की जाती है वह उसके रसोई संभालने, खाना पकाने और कुकिंग एक्सपर्ट होने के इर्द-गिर्द ही केंद्रित होती है। अलग-अलग डिशेज बनाकर प्रस्तुत होने वाली क्या वह युवती अपने कामकाजी होने पर हीन भाव से नहीं भर जाती होगी? भारतीय समाज की यही विडंबना है कि वह आधुनिक होने का दंभ भरता है पर भीतर से उसका मानस घोर परंपरावादी है।
खाना पकाना या परिवार की देखभाल के लिए समय निकालना किसी भी भारतीय महिला की सहज, स्वाभाविक प्रवृत्ति है पर इसके साथ-साथ जब वह उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने कार्यक्षेत्र में दक्ष और योग्य भी सिद्ध हो रही है, तब इस पर भी चर्चा व बातचीत कर उसका उचित सम्मान होना चाहिए। ऐसा तो नहीं हो सकता कि युवतियां आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर बनें, स्वयं को साबित करें और फिर उनसे वही परंपरावादी चौके-चूल्हे से संबंधित जिरह की जाए।
किसी भावी वर से तो यह नहीं पूछा जाता कि उसे घर-परिवार की देखभाल, उससे संबंधित जिम्मेदारियों से कितना लगाव है? परिवार बनाने के लिए जिस सहयोग और सहकारिता की आवश्यकता है, उसके लिए वह कितना उत्सुक और तत्पर है। युवतियों से ही केवल पारिवारिक उत्तरदायित्वों की बातों पर चर्चा क्यों की जाती है?
यह कटु सत्य बना हुआ है कि भारतीय समाज के मध्यमवर्गीय मूल्य अभी भी युवतियों की कामकाजी दक्षता, उससे प्राप्त योग्यता से मेल नहीं बिठा पाए।