चार धाम में एक धाम बद्रीनाथ ..कैसे जाएं....क्या है पौराणिक कथा.....खास फोटो फीचर के साथ
बद्रीनाथ की पौराणिक कथा -
तेहरी गढ़वाल क्षेत्र में स्थित बद्रीनाथ हिंदुओं के चार धामों में से एक है। बद्रीधाम से जुड़ी एक बेहद प्रसिद्ध प्राचीन कथा है। आदि शंकराचार्य जब ग्यारह साल के थे तब इस पुण्यभूमि पर अपने अनुयायियों के साथ आए थे। अलसुबह जब वह यहां पहुंचे तो उन्हें सुष्मांद-गंधमदना पहाड़ियों पर अद्भुत हवा का एहसास हुआ।
उससे प्रभावित हो शंकराचार्य अषटपदि का पारायण करने लगे। कलकल बहती अलकनंदा नदी के किनारे वह बद्रीनाथ के पुण्य प्रतिमाएं ढूंढने लगे। तभी उन्हें नारदशिला और वराहशिला के बीच नारदकुण्ड मिला। इसी पानी के अंदर उन्हें बद्रीनाथ की अद्म्य मूर्ति मिली। इसी तरह दूसरी बार कुण्ड में उन्हें दूसरी प्रतिमा मिली।
जब तीसरी बार डुबकी लगाई तो तीसरी मूर्ति मिली। उनके हाथ में तीसरी मूर्ति आते ही एक आवाज सुनाई दी ..ये जो मूर्ति तुम्हारे हाथ में है इसे ब्रह्मा जी ने पहले प्रतिष्ठित किया था। इसे इसकी सही जगह पर पहुंचाओ।
योगमुद्रा में विराजित बाबा बद्रीनाथ
इस कहानी के अनुसार 2500 साल पहले आदि शंकराचार्य ने बद्रीनाथ की इस प्रतिमा की स्थापना की थी। 2 शताब्दियों पूर्व गढ़वाल के राजाओं ने बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर के गर्भगृह में बद्रीनारायण, धन के भगवान कुबेर, नारद मुनि, उथावर, नर, नारायण, महालक्ष्मी, गरुण, स्वामी देसीकन, रामानुज और आदि शंकराचार्य की मूर्ति स्थापित हैं।
बद्रीनारायण की मुख्य प्रतिमा काले पत्थर से बनी है, जिसके हाथों में शंख-चक्र है और जो योगमुद्रा में बैठे हैं। गर्भगृह के साथ ही मंदिर में दर्शन मंडप और सभा मंडप है।
बद्रीनाथ का माता मूर्ति और बद्री-केदार का मेला खासा प्रसिद्ध है। माता मूर्ति का मेला हर साल सितंबर में भगवान बद्रीनाथ की माता के सम्मान में आयोजित किया जाता है। जून के महीने में बद्रीनाथ और केदारनाथ श्राइन बद्री केदार महोत्सव का आयोजन करता है। आठ दिन चलनेवाले इस मेले में देशभर के कलाकार यहां आते हैं।
छह महीने के लिए खुलते हैं पट - हिंदु कैलेंडर के अनुसार बैसाख से कार्तिक तक बद्रीनाथ के पट खुलते हैं। मार्गशीर्ष से चैत्र तक पट लोगों के दर्शन के लिए बंद रहते हैं। मान्यता है कि मार्गशीर्ष से चैत्र के बीच देवगण भगवान बद्रीनाथ के दर्शन के लिए यहां आते हैं। सर्दियों में भगवान बद्रीनाथ की कांसे की बनी प्रतिमा को पांडुकेश्वर ले जाया जाता है। यही जगह सर्दियों में भगवान का निवास होता है।
क्षेत्रफल - 2.5 किलोमीटर
ऊंचाई - 3133 मीटर ( समुद्रतल से)
जाने का उपयुक्त समय - मई से नवंबर
कैसे जाएं
बद्रीनाथ जाने के लिए ऋषिकेश से रूद्रप्रयाग होकर जाया जा सकता है। रूद्रप्रयाग में अलकनंदा नदी का बेहद सुंदर पाट है। पहाड़ियों और झरनों के बीच से बहती अलकनंदा प्रकृति की खूबसूरत कलाओं का एहसास कराती है। रुद्रप्रयाग से बद्रीनाथ की दूरी 160 किमी है।देहरादून, हरिद्वार, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा से भी सड़कमार्ग से बद्रीनाथ पहुंचा जा सकता है। नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून में है जो बद्रीनाथ से 315 किमी है और नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है जो बद्रीनाथ से 292 किमी है।
हरिद्वार से बद्रीनाथ रूट
हरिद्वार से ऋषिकेश (23 किमी) - शिवपुरी (13 किमी) - बयासी (4 किमी) - कौदियाला (17 किमी)- देवप्रयाग (36 किमी)- श्रीनगर (38 किमी)- कालिया सौर(10 किमी) - रूद्रप्रयाग (35 किमी) - गौचर(10 किमी) - कामप्रयाग (10 किमी)- नंदरप्रयाग (21 किमी)- चमौली (10 किमी) - पीपलकौटी (17 किमी) - जोशीमठ(13 किमी) - विष्णुप्रयाग (12 किमी)- गोविंदघाट (7 किमी)- पाण्डुकेश्वर (2 किमी)- बद्रीनाथ (23 किमी)।
बाबा बद्रीनाथ के सुंदर चित्र -



