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क़रीब 200 फिल्मों में बहन, बेटी, मां, विधवा और सहनायिका के रोल कर चुकीं, सुप्रसिद्ध अभिनेत्री फ़रीदा जलाल को बतौर हीरोइन मौक़ा न मिल पाने का अफ़सोस है। लेकिन एक उम्दा अदाकारा के तौर पर उन्होंने अपनी क़ाबिलियत साबित की और दर्शकों का ख़ूब प्यार पाया..
मेरे नाना-नानी का ताल्लुक़ इराक़ से था। असल में नाना का घोड़े का बिजनेस था, जिनका बगदाद से हिंदुस्तान आना-जाना लगा रहता था। नानी अपनी सहेलियों के साथ यहां आया करती थीं। यहीं हिंदुस्तान में दोनों की मुलाक़ात हुई और उन्होंने निकाह कर लिया।
मेरे पिताजी मो. समी चौधरी का जन्म भारत में ही हुआ। हालांकि पिताजी के दूसरे भाई वग़ैरह पाकिस्तान में बस गए, मगर पिताजी हिंदुस्तान में ही रहे। उनका भी ताल्लुक़ फिल्म इंडस्ट्री से था। हम दो भाई-बहन हैं, मैं और मेरे बड़े भाई ख़ालिद। वे भी इंडस्ट्री में हैं। वे डब्बू (रणधीर कपूर) के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘हिना’ के एसोसिएट डायरेक्टर थे।
हालांकि उन्होंने स्वतंत्र निर्देशक के तौर पर ‘कन्हैया’ और नसीर जी और ‘हिना’ की ही हीरोइन Êोबा ब़िख्तयार को लेकर ‘नरगिस’ भी बनाई, पर वह अभी तक रिलीÊा नहीं हो पाई है। उनके दो बेटे हैं- हिदायत और इनायत, जो रंगमंच से जुड़े हैं।
पहली फिल्म
स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही मैं फिल्मों में आ गई। मेरी पहली फिल्म ‘राजश्री’ बैनर की ‘तक़दीर’ थी, जो 1969 में आई थी। लेकिन मेरी उम्र क्या थी, यह मत पूछिए.. (हंसते हुए) मैंने उम्र पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। अक्सर लोग मेरी पहली फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ बताते हैं, पर मैं कहती हूं कि मैं फ़रीदा दादी नहीं हूं।
पता नहीं, लोगों को यह ग़लतफ़हमी कहां से हो गई! मैं अपनी बात की प्रामाणिकता के लिए यही कहूंगी कि आप ‘राजश्री’ के राज बाबू (राजकुमार बड़जात्या) से पूछ लीजिए। ‘तक़दीर’ में भारत भूषण हीरो थे और इसका एक गाना ‘जब जब बहार आए..’ आज भी ख़ूब पसंद किया जाता है। राज बाबू से आज भी मेरे बड़े अच्छे संबंध हैं।
नहीं बन पाई हीरोइन!
मैं अभी तक क़रीब 200 फिल्मों में बहन, बेटी, मां, विधवा आदि के रोल कर चुकी हूं.. ‘आराधना’ में राजेश खन्ना के साथ मेरा रोमांटिक एंगल भी था। लेकिन अक्सर मुझसे यह एक सवाल Êारूर पूछा जाता है कि मैं हीरोइन क्यों नहीं बन पाई! मैं कहती हूं कि यह सवाल तो निर्माता-निर्देशक से पूछना चाहिए।
मुझे तो जो Êिाम्मेदारी मिली, मैंने उसमें ख़ुद को साबित किया.. यही मेरी जीत है। उन दिनों जब मैं हीरोइन बनने का प्रयास करती, तब मुझसे कहा जाता कि मेरा क़द छोटा है। मैं उनसे पूछती कि क्या मैं जया (भादुड़ी) जी से भी छोटी हूं? फिर वे कहते कि मैं मोटी हूं।
इसके जवाब में मैं रेखा का नाम लेती, जो पहले तो मोटी ही थीं न.. दुबली तो वे बाद में हुईं। ख़ैर, ‘पारस’ में मुझे मौक़ा मिला, तो बेस्ट सपोर्टिग एक्ट्रेस का अवॉर्ड भी हासिल किया। उन दिनों तो एक ही अवॉर्ड होता था- ‘फिल्मफेयर’, जो ‘षणमुखानंद हाल’ में दिया जाता था। आज की तरह नहीं था कि खुले में हो रहा है और कोई ऊल-जलूल जोक सुना रहा है।
जब वहां किसी के नाम की उद्घोषणा होने वाली रहती थी, तो दिल की धड़कनें इस क़दर बढ़ जाती थीं कि उसकी आवाÊा कानों में सुनाई पड़ती थी! इंडस्ट्री के दिग्गजों की मौजूदगी में अवॉर्ड लेना और अपने लिए उनकी तालियां पाना एक अलग अनुभव हुआ करता था। अब तो अवॉर्ड की पहले जैसी अहमियत भी नहीं रही।
मायानगरी की भेड़चाल
असल में बॉलीवुड में भेड़चाल है। एक समय था, जब मुमताज जैसी लड़की के साथ काम करने के लिए शशि कपूर तैयार नहीं होते थे। सभी यह कहकर उनसे बिदकते थे कि वे तो दारा सिंह की हीरोइन हैं.. स्टंट फिल्मों की हीरोइन हैं।
ऐसे में महमूद भाईजान को बहुत को़फ्त होती थी कि इतनी ब्यूटीफुल और क़ाबिल लड़की को उसका वाÊिाब हक़ नहीं मिल रहा है। वे अपनी फिल्म ‘प्यार किए जा’ की रील का डिब्बा लेकर भटकते रहते थे, जिसमें मुमताज थीं। दरअसल, भाईजान वह रील दिखाकर मुमताज के लिए मौक़ा दिलाने की सिफ़ारिश करते थे।
इसी संदर्भ में वे दिलीप (कुमार) साहब से भी मिले, जिनकी उन दिनों ‘राम और श्याम’ की तैयारी चल रही थी। भाईजान ने उनसे कहा- ‘मेरा दिल करता है कि मुमताज के लिए जो कर सकता हूं, मैं करूं।’ दिलीप साहब ने रील देखने के बाद आश्वस्त किया कि ‘राम और श्याम’ में मुमताज सेकंड लड़की का रोल करेंगी, जो फिल्म में गांव की गोरी के रोल में हैं।
फिर क्या था, जैसे ही यह ख़बर फैली कि मुमताज तो दिलीप साहब की हीरोइन बन गई हैं, जीतेंद्र-धर्मेद्र सभी अपने-अपने डायरेक्टर्स पर दबाव डालने लगे कि वे हीरोइन मुमताज को लें! यही मेरे साथ हुआ।
दिलीप साहब से जुड़ा रिश्ता
जहां तक बहन के रोल में टाइप्ड हो जाने की बात है, उसकी भी बड़ी दिलचस्प कहानी है। जिस तरह दिलीप साहब ने मुमताज को ‘हीरोइन’ बनवा दिया, उसी तरह उन्होंने ही मुझे बहन की ऐसी इमेज दी कि मैं फिर कभी बाहर निकल नहीं पाई। असल में हीरोइनों में जिस तरह मैं मीना कुमारी की दीवानी थी, हीरो में दिलीप साहब मेरे आइडॅल रहे हैं। ऐसे में जब मुझे फिल्म ‘गोपी’ में उनकी बहन का रोल ऑफर किया गया, तब मैं इंकार नहीं कर पाई। यह रोल मुझे दिलीप साहब ने ही दिलाया था।
वे पहले किसी फिल्म में मुझे देख चुके थे और जब ‘गोपी’ में बहन का रोल निकला, तो मेरी तलाश शुरू कर दी- ‘वह लड़की मुझे चाहिए।’ मेरा मानना है कि हर इंसान अपना मुक़द्दर अपने साथ लेकर आता है। अब दिलीप साहब जैसे दिग्गज की मैं बहन क्या बनी, इंडस्ट्री ने मान लिया कि लोग मुझे किसी और रोल में हजम ही नहीं कर पाएंगे। यहां भी मैं सोचती हूं कि अच्छा ही हुआ, क्योंकि दिलीप साहब ने वह रिश्ता आज भी क़ायम रखा है। वे मेरे फादर फिगर हैं। ईद हो चाहे बर्थडे, वे मुझे दुआएं देना कभी नहीं भूलते। सायरा (बानो) जी भी बड़ी बहन का प्यार देती हैं।
कट गया मेरा पत्ता
मैं मीना कुमारी की बड़ी फैन थी। जब मुझे उनकी आख़िरी फिल्मों में से एक ‘बहारों की मंÊिाल’ मिली, तब मैं ख़ुशी से रात भर सो नहीं पाई थी। इसमें रहमान साहब मीनाजी के पति बने थे। फिल्म में धर्मेद्र भी थे। मैं धमेर्ंद्र की बेटी बनी थी।
उन्हीं दिनों राज बाबू ने फिल्म ‘जीवन मृत्यु’ की योजना बनाई, जिसके निर्देशक सत्येन बोस थे। सत्येन दा तब हमेशा ‘राजश्री’ के द़फ्तर में ही मिलते थे। वे मेरी बहुत तारीफ़ करते थे। इस फिल्म में राज बाबू और सत्येन दा मुझे धर्मेद्र के अपोजिट लेना चाहते थे।
लेकिन धर्मेद्र ने यह कहकर मेरा पत्ता कटवा दिया कि ‘बहारों की मंÊिाल’ में वह मेरी बेटी बनी है, फिर उसके साथ रोमांस कैसे करूंगा? वैसे भी वह अभी टीन एजर है।’ मैं आज भी धर्मेद्र को छोड़ती नहीं हूं- ‘देखा, आपकी एक ‘न’ ने मेरा कैरियर ही बदल कर रख दिया।
वे मेरा ताना सुन-सुनकर बहुत शर्मिदा भी होते हैं, पर अब उसका फ़ायदा क्या है? वे बड़े स्टार थे, सो Êाहिर है, उन्हीं की सुनी जाती। वैसे एक तरह से ठीक ही हुआ, वरना इंडस्ट्री को राखी जैसी एक्ट्रेस कहां मिलती? जी हां, राज बाबू ने फिर धर्मेद्र के अपोजिट इसमें राखी को लांच किया था।
पता: फ़रीदा जलाल
‘इंद्रदर्शन’, बिल्ंिडग- 19, फ्लैट- 803/ 804, ओशिवरा, अंधेरी (प.), मुंबई- 400 053
* जिन पाठकों ने अभिनेत्री फ़रीदा जलाल की जानकारी चाही थी, उनके नाम हैं: नीरा वर्मा-रायपुर, मो. Êाहीरुद्दीन-बिलासपुर, गोपीकृष्ण-राजनांदगांव (छग)/ जवाहरलाल शर्मा-ग्वालियर, विकास राठौर-इंदौर, विनीता श्रीवास्तव-सागर (मप्र)/ सुरेश गर्ग-कोटा, प्रियंका चौधरी-जयपुर, अशोक नागर-अलवर (राज)/ विजयेंद्र सिंह-झांसी (उप्र)
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