रामपुर की अमर-आजम कहानी में आजम का जाना तय
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रामपुर की अमर-आजम कहानी में आजम का जाना तय

नई दिल्ली.आजम खान समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह के दबदबे के शिकार होने वाले पार्टी के चौथे बड़े नेता हैं। इससे पहले बेनी प्रसाद वर्मा, राज बब्बर और सलीम शेरवानी उनके दंभ-दबदबे और ‘नेताजी’ पर उनके प्रभाव से परेशान होकर पार्टी को नमस्ते कह चुके हैं।

रामपुर में जयाप्रदा की उम्मीदवारी को लेकर छिड़े विवाद के निर्णायक पड़ाव में अब आजम खां का जाना तय माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व 13 मई तक इसके लिए इंतजार करेगा या उसके पहले ही फैसला कर लेगा, इसे लेकर अलग-अलग अटकलें लगाई जा रही हैं।

अमर-आजम की लड़ाई का कुरूक्षेत्र बनी रामपुर की जमीन पर पार्टी मुखिया मुलायम सिंह शनिवार को अपने पुराने विश्वासपात्र आजम खान पर जमकर बरसे। उन्होंने जया प्रदा की उम्मीदवारी को लेकर खान के विरोध को नाजायज बताया और कहा कि वह पार्टी विरोधी काम कर रहे हैं।

मुलायम के सार्वजनिक गुस्से से साफ हो गया कि अब आजम खान के दिन पार्टी में गिने-चुने रह गए हैं। अमर सिंह रह-रह कर पार्टी व मुलायम सिंह के प्रति अपनी निष्ठा का हवाला दे रहे हैं तो आजम खान कह रहे हैं कि सुदूर आंध्र प्रदेश से जया प्रदा को रामपुर का दोबारा उम्मीदवार बना देना वहां की जनता और उनकी पार्टी के प्रति सेवाओं का अपमान है।

किसी टीवी सीरियल के पेचीदा प्लॉट की तरह लगातार बढ़ रहा यह तनाव सपा में पहली बार नहीं देखा जा रहा। वैसे तो समाजवादी पार्टी से लोगों का बसपा और दूसरे दलों की ओर पलायन काफी सालों से चल रहा है। लेकिन अमर सिंह को सार्वजनिक रूप से इसके लिए जिम्मेदार ठहराने वाले सबसे पहले नेता बेनी प्रसाद वर्मा थे।

उन्होंने 2007 में पार्टी छोड़ कर समाजवादी क्रांति दल का गठन किया और विधानसभा चुनाव लड़ा। उनके पीछे सपा के दो अन्य विधायकों ने भी पार्टी छोड़ दी। इसके बाद नंबर आया राज बब्बर का। 2007 में अभिनेता से नेता बने बब्बर अमर सिंह के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया। जल्द ही बब्बर ने भी अपना रास्ता अलग कर लिया। लेकिन इससे पहले उन्होंने मीडिया में अमर सिंह के खिलाफ लंबा अभियान चलाया।

फिर उन्होंने जन मोर्चा बनाकर विधानसभा के चुनाव मैदान में कूदे। मगर उनकी पार्टी को एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली। बेनी प्रसाद की तरह बब्बर भी इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। आगरा सीट के सुरक्षित हो जाने के बाद अब वह फतेहपुर सीकरी से मैदान में हैं। हाल ही में दो और पुराने नेताओं ने सपा का दामन छोड़ा। इनमें शाहिद सिद्दीकी और सलीम शेरवानी शामिल हैं।

शाहिद ने परमाणु करार के मुद्दे पर सपा के रूख को अपनी रूख्सती की वजह बताई। मगर शेरवानी के बारे में यह समझा जाता है कि वह भी पार्टी के हर फैसले पर अमर सिंह की दखलंदाजी से परेशान थे। हालांकि शेरवानी ने इस बारे में कभी सार्वजनिक बयानबाजी नहीं की। वर्मा और राज बब्बर की तरह इस बार उन्हें भी कांग्रेस ने टिकट दिया है। उनकी सीट बदायूं है, जहां से वह विधायक भी रह चुके हैं।






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