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Bal Bhaskar Bal Bhaskar
एक लड़के का नाम था टुंग। कोई उसे जब उसके नाम से पुकारता, तो ऐसा लगता मानो जलतरंग बज उठा हो। ‘टुंग, टुंग।’ बहुत मीठा सुनाई देता। उस लड़के का व्यवहार भी काफी मीठा था। वह एक छोटा-सा बच्च था। भोली-सी दो आंखें। उन दोनों आंखों में मानो खुशी ने अपना उजाला फैला रखा था। टुंग टकटकी लगाकर उस ओर देखता रहता, जिधर से जंगल शुरू होता था।
जंगल के किनारे उन लोगों का मिट्टी का छोटा-सा घर था। दूर से देखने पर वह एक तस्वीर-जैसा दिखाई देता था। सचमुच! उस घर की हर दीवार पर चित्रकारी की गई थी। टुंग ने ही ये सारी तस्वीरें बनाईं थीं। उनमें रंगीन झिलमिलाते फूल, सुर्ख लाल पंछी और सुनहरी मछलियां थीं।
उसके पिताजी उसे इस काम के लिए मना नहीं करते थे। वह अपनी मÊर्ाी से चित्र बनाता रहता था और जब उससे कोई चित्र नहीं बनता, तो उसके पिताजी बना देते।
पिताजी के अलावा टुंग का अपना कहने को और कोई नहीं था। पिताजी मिट्टी का काम करते थे। वे मिट्टी के घड़े बनाते थे। मटकों-गिलासों पर नक्काशी किया करते थे। अल्पना बनाते थे। फिर नाव पर सवार होकर हाट जाते, जहां वे अपना बनाया हुआ सामान बेचा करते थे।
उन्होंने कहा था कि थोड़ा और बड़ा होने पर टुंग भी उनके साथ हाट जाएगा। हांकते हुए फेरी लगाएगा, ‘मटके ले लो, सुराही ले लो। मटके चाहिए?’ रोÊा शाम को पिताजी जब घर लौटते, तो वे टुंग के लिए जलेबी लाते। कभी जलेबी, तो कभी गुजिया, तो कभी लड्डू। घर लौटकर पिताजी ढोलक बजाते, गीत गाते।
ढोलक बजाना टुंग को भी आता था। पिताजी जब घर पर नहीं होते, टुंग ढोलक गले में लटका लेता और गाने गाता।
वह बहुत सुबह उठ जाता था। उस समय बहुत हल्का-सा उजाला होता था। बहुत थोड़ा-सा सुनहरा उजाला पेड़ों की पत्तियों पर बिखरा होता था। तब एक-एक कर पंछी बोलना शुरू करते और ऐसे में वह घर से बाहर की ओर दौड़ लगा देता और सीधे नदी के पानी में छलांग लगाता। नदी का पानी नाच उठता था।
वह देर तक तैरता रहता तरह-तरह की कलाबाÊिायां दिखाता। उसकी इच्छा होती कि तैरते-तैरते वह नदी के उस पार निकल जाए। नदी के उस पार, जहां जंगल बहुत घना हो जाता है। वहां कोई नहीं जाता। पिताजी कहते कि वहां पर एक दैत्य रहता है।
वह बहुत भयानक है। कहते हैं कि उसने वहां पर एक राजकुमारी को कैद कर रखा है। कभी-कभी उसके मन में विचार उठता कि क्यों न वह उस जंगल में जाकर उस शैतान दैत्य से लड़ाई करे।
उसे जंगल में जाने से Êारा भी डर नहीं लगता। न उसे शेर से डर लगता, न भालू से। जब कभी वह जंगल में जाकर सूखे पत्ते बीनता या पेड़ की टहनियां तोड़ लाता, तो क्या उसे डर लगता था? Êारा भी नहीं। उसे देखकर बंदर पेड़ों पर उछलकूद मचाना शुरू कर देते थे।
वह एक डाल से दूसरी डाल पर छलांग लगाने लगते थे। टुंग तब मस्ती से भर जाता और चीखकर कहता, ‘एई बंदर, केला खाएगा, जगन्नाथ जी के दर्शन को जाएगा,’ बंदर उसकी बात सुनकर किच-किच करते और उछलकूद मचाते!
एक बार टुंग ने कागÊा पर एक पंछी की तस्वीर बनाई थी। तस्वीर के नीचे उसने लिखा था, ‘दैत्य की कैद में रहने वाली राजकुमारी को मेरी भेंट। तुम्हारा अपरिचित भाई, टुंग!’ इसके बाद टुंग ने एक बंदर को ‘आ, आ’ कहकर बुलाया और उसे सचमुच ढेर सारे केले दिए थे। उसने कागज की उस तस्वीर को धागे की मदद से उस बंदर के गले में लटकाते हुए कहा था, ‘दैत्य की कैद में रहने वाली राजकुमारी तक इसे पहुंचा देना।’
बंदर को क्या समझ में आया था क्या पता। टुंग के हाथों से केले लेते ही बंदर एक लंबी छलांग में सीधे पेड़ की डाल पर जा पहुंचा था। उसके गले में वह तस्वीर लटक रही थी। फिर पेड़ पर छलांग लगाता-लगाता वह कहां गायब हो गया था, टुंग को पता नहीं चला। वह बंदर फिर दिखाई ही नहीं दिया।
नहीं, टुंग को वह बंदर फिर कभी नहीं दिखाई दिया। उसने उसे कितना ढूंढा। उसने सोचा कि हो सकता है वह बंदर सचमुच उस राजकुमारी के पास चला गया हो। और हो सकता है इस समय वह राजकुमारी टुंग की बनाई हुई तस्वीर ही देख रही हो। हो सकता है वह रो रही हो। सोच रही हो कि उसका यह अपरिचित भाई कौन है।
टुंग ने हालांकि कभी शेर नहीं देखा था लेकिन उसकी आवाÊा सुनी थी और अगर दिख भी जाता, तो क्या! उसे Êारा भी डर नहीं लगता। कितने दिन तो खुद इस जंगल में शेर की तलाश में तीर-धनुष लेकर भटकता रहा है, लेकिन जंगल के बहुत भीतर तो जाया नहीं जा सकता।
कोई भी नहीं जा पाता। फिर भी बीच-बीच में उसकी वहां जाने की इच्छा होती। इच्छा होती कि पेड़ के संग पेड़ बनकर, फूल के साथ फूल बनकर और शेर के संग शेर बनकर घूमे-फिर, लेकिन ऐसा तो हो नहीं सकता था। आज आसमान में बादल छाए हुए थे। टुंग को तब तक पता नहीं था कि आज बादल छाने वाले हैं।
उसे पता भी कैसे चलता भला? पिताजी तो सुबह-सुबह हाट के लिए निकल गए थे। तब तक आसमान में धूप झिलमिल कर रही थी और अब घना काला अंधेरा छा गया था। बादल घिरते, तो टुंग कैसा अनमना-सा हो उठता था।
खिड़की पर चेहरा रखकर वह खामोश खड़ा रहता। एकटक बाहर आसमान की ओर देखता रहता। हरे-हरे पेड़ों से घिरे जंगल को देखता रहता। सोचता कि इस नीले आसमान को छूते हुए-से ये बादल आखिर जाते कहां हैं?
टप टप! बारिश शुरू हो गई। टुंग का चेहरा खुशी से भर उठा। दौड़ लगाकर वह बाहर निकल आया। Êाोर से आवाÊा लगाते हुए बोला, ‘आ, आ बारिश Êाोर से आ।’
देखते ही देखते झमाझम बारिश शुरू हो गई। टुंग ने दौड़ना शुरू कर दिया बारिश में भीगते-भीगते, जिधर उसके पैर ले जाते, वह उस ओर दौड़ने लगा। पेड़ के पत्तों-पत्तों पर बारिश की बूंदें नाच रही थीं। धरती पर उसके दो पैर नाच रहे थे। वह आज रुकने वाला नहीं था। वह किसी की मानने वाला नहीं था। वह आज दौड़ते हुए उस जंगल में कैद राजकुमारी के पास जाना चाहता था।
टुंग ने जंगल में प्रवेश किया। वह पूरी तरह से भीग गया था। जंगल के पेड़ों के हरी-हरी पत्तियों के नीचे-नीचे वह खुशी से झूम उठा। बादल गरजने लगे लेकिन वह नहीं रुका। कड़कती हुई बिजली गिरने लगी, लेकिन उसने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया। वह दौड़ने लगा जैसे हिरण कुलांचे भरता है।
टुंग दौड़ता और फिर जंगल की हरियाली में छुप जाता। छुप-छुप कर इधर-उधर देखता। उसे पेड़ ही पेड़ दिखाई देते। कहां, आज तो टहनियों पर एक भी बंदर नहीं दिखाई दे रहा। उसे आज एक भी पक्षी नहीं दिख रहा। आज सब लोग छुप गए थे। बारिश से इतना डरते हंै ये लोग।
टुंग को Êारा भी डर नहीं लग रहा था। आज घर से बाहर वहां वह अकेला था, इसलिए उसने सोचा कि आज वह जी खोलकर गाएगा, नाचेगा आवाÊा लगाएगा और उसने सचमुच पेड़ों की ओर देखते हुए आवाÊा लगाई,‘..चिड़ियों! ओ चिड़ियों, कहां हो तुम लोग?’
किसी ने कोई आवाÊा नहीं दी। वह चिल्लाया, ‘. गिलहरी! ओ गिलहरी, बारिश से इतना डरती हो।’ फिर वही खामोशी। नहीं, नहीं, खामोशी नहीं। कोई कूं-कूं की आवाÊा में पुकार रहा था। दौड़ते-दौड़ते टुंग ठिठक गया।
उसने निगाहें दौड़ाते हुए देखने की कोशिश की। कौन आवाÊा लगा रहा था? उसने तलाश शुरू कर दी। झाड़ियों को हटा-हटाकर उसने देखना शुरूकिया। अचानक वह चौंक उठा, ‘हे भगवान! वह क्या चीÊा है?’ वह तेÊाी से उस ओर बढ़ गया।
‘अरे! यह तो भालू का एक बच्च है। ओह। यह तो कांप रहा है।’ टुंग ने भालू के उस छोटे-से बच्चे को गोद में उठा लिया। उसे Êारा भी परेशानी नहीं हुई। टुंग ने उसकी आंखों की ओर देखा। वह बच्च पलकें झपकाता उसे एकटक देखे जा रहा था। टुंग ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उफ! वह पानी से पूरी तरह भीग गया था।
उसने उसका सिर पोंछ दिया। उसके शरीर पर लगे कीचड़ को पोंछते हुए उसने पूछा, ‘तेरी मां कहां है?’ भालू का बच्च क्या टुंग की भाषा समझ सकता था भला? वह क्या समझता? वह कांपे जा रहा था। कूं-कूं करता आवाÊा लगा रहा था। डबडब आंखों से उसे देख रहा था।
टुंग को समझने में देर नहीं लगी कि उसकी मां उसे छोड़कर चली गई है। निश्चित रूप से चली गई है। बारिश से घबराकर बच्चे को छोड़ भाग गई है। उफ! मां के मन में कोई दया-माया नहीं है। मां भला ऐसी होती है? ऐसी निष्ठ़ुर? फिर भी टुंग ने आवाÊा लगाई, ‘. भालू मां, ओ भालू मां।’ वह आस-पास होती, तब ही तो सुनती। भयानक बारिश हो रही थी।
फिर भी टुंग ने इधर-उधर भालू मां की तलाश की। लेकिन वह नहीं दिखाई दी, तो उसने सोचा कि भरी बारिश में इस घने जंगल में Êयादा देर तक नहीं रहना चाहिए, नहीं तो यह बच्च बीमार पड़ जाएगा। इसे घर ले चलता हूं। बाद में उसकी मां को ढूंढ निकालूंगा।भालू के बच्चे को गोद में लिए-लिए वह घर की ओर दौड़ चला।