सत्ता का पासा पलटती महिलाएं
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सत्ता का पासा पलटती महिलाएं

yadavआखिरी दौर से ठीक पहले लोकतंत्र का बेताल फिर विक्रमादित्य के लिए एक सवाल खोज लाया। जिस देश में प्रधानमंत्री की कुर्सी की दौड़ में एक दलित महिला का दावा जोर पकड़ रहा हो, जहां देश की सबसे पुरानी और बड़ी राजनीतिक पार्टी की कमान एक महिला के हाथ में हो, वहां राजनीतिक नतीजों और बहस के बीच महिलाओं का वोट क्यों दिखाई नहीं देता ? सवाल मौजूं था। यह देखते हुए कि इस आखिरी दौर में जिन तीन बड़े राज्यों में वोट डाले जा रहे हैं, वहां की राजनीति तीन महिलाओं के आसपास घूम रही है। तमिलनाडु में जयललिता, उत्तरप्रदेश में मायावती और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी।

ये तीनों भारत की मौजूदा राजनीति में महिलाओं की ताकत की नुमाइंदगी करती हैं। आज इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमारे पास बेहतरीन मौका है। हम आखिरी दौर में देश के चार कोनों में हो रहे चुनाव पर करीबी नजर डालें।

दक्षिण में तमिलनाडु, पूर्व में पश्चिम बंगाल, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिमी सरहद पर पंजाब और जम्मू-कश्मीर से गुजरते हुए इस गुम होते सवाल के जवाब तक पहुंच सकते हैं। इस बार तमिलनाडु में महिलाओं का वोट एक लहर पैदा करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। वाइको की एमडीएमके २क्क्६ में ही जयललिता के पाले में आ गई।

इसी का नतीजा था कि डीएमके को आम चुनावों में मिली १७ फीसदी की बढ़त विधानसभा चुनावों में महज ५ फीसदी पर सिमट गई थी। फिर इस बार लेफ्ट और पीएमके ने भी पाला बदलते हुए जयललिता का दामन थाम लिया है।

अगर ये पार्टियां पिछले विधानसभा चुनावों में पाए अपने आधे वोट भी हासिल कर लें तो यह डीएमके की बढ़त को खत्म कर देंगी और जयललिता की अगुआई में इस गठबंधन को जीत हासिल हो सकती है। पिछले विधानसभा चुनावों में जयललिता ने पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के पांच फीसदी ज्यादा वोट हासिल किए थे।

अगर महिलाओं का यह वोट इस बार भी जयललिता के साथ जुड़ा रहता है तो उनकी संभावित जीत एक लहर में तब्दील हो सकती है, लेकिन इस चुनावी गणित से इतर डीएमके के कामकाज का रिकॉर्ड भी उसके खिलाफ ही जाता दिख रहा है।

पिछले विधानसभा चुनाव में सीएनएन-आईबीएन, हिंदू-सीएसडीएस के सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई थी कि हार के बावजूद जयललिता की लोकप्रियता में बहुत कमी नहीं आई है। विधानसभा चुनाव में जीतकर डीएमके ने वोटर से किए अपने वादों को पूरा तो किया, लेकिन बिजली और पानी जैसे बुनियादी मुद्दों से निपटना उनके लिए चुनौती बना रहा।

भ्रष्टाचार के आरोप और करुणानिधि की पारिवारिक कलह से आम वोटर का मोहभंग हुआ है। मौजूदा चुनावों के नतीजों पर श्रीलंका की मानवीय त्रासदी का कितना असर पड़ेगा, यह कहना मुश्किल है। दिक्कत यह है कि इस सवाल पर दोनों पार्टियों का रिकॉर्ड दोमुंही बातों से भरा है। तमिलनाडु में सवाल यही है कि जयललिता के गठबंधन की जीत कितनी भारी होगी।

तमिलनाडु की तरह पंजाब, हिमाचल और उत्तराखंड में मौजूदा सरकारें बचाव की मुद्रा में हैं। पंजाब पूरे देश में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के कम अनुपात की एक बड़ी मिसाल है। इसके बावजूद पंजाब में आज भी महिलाओं के मुद्दे राजनीतिक एजेंडे में जगह नहीं बना पाए हैं।

यहां आज भी अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस अपना पुराना राग अलाप रहे हैं। अकाली-भाजपा गठबंधन अपनी सरकार की गिरती साख से जूझ रहा है। अकाली दल में छिड़ी विरासत की लड़ाई उसकी परेशानी का सबब है। दूसरी ओर कांग्रेस मनमोहन सिंह के जरिए सिक्ख प्रधानमंत्री के कार्ड को खुलकर खेलने में लगी है।

इन सबके बीच सत्ताधारी अकाली-भाजपा गठबंधन के लिए कुछ सीटें बचाना ही बड़ी चुनौती है। चंडीगढ़ में कांग्रेस, भाजपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय लड़ाई देखी जा सकती है।

उत्तराखंड में भाजपा को कांग्रेस के साथ-साथ कल तक अपने सहयोगी रहे उत्तराखंड क्रांति दल और बसपा की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। खासतौर से तराई के इलाके में बसपा उलटफेर करने का माद्दा रखती है, लेकिन हिमाचल प्रदेश में दो साल पुरानी धूमल सरकार अन्य सत्ताधारी सरकारों की तुलना में बेहतर है।

यहां राज्य के मुद्दे ही हावी हैं। उप्र और पश्चिम बंगाल कई दौर के चुनावों के बीच अपनी आखिरी लड़ाई में उतर रहे हैं, लेकिन यहां महिला नेताओं और महिलाओं के वोट और उनके मुद्दों के बीच कोई सीधा तार दिखाई नहीं देता। देश में महिलाओं के विकास की सीढ़ी पर उत्तरप्रदेश नीचे से दूसरे पायदान पर है।

महिलाओं का वोट मायावती की सोशल इंजीनियरिंग के लिए अहम था। बसपा को महिलाओं के दो फीसदी ज्यादा वोट मिले थे। इसने ही उसे बहुमत दिलाने में एक बड़ी भूमिका भी निभाई। बसपा को इस बार भी इस वोट की दरकार है।

खासतौर से यह जानते हुए कि गैरदलित वोट बैंक में लगी सेंध के चलते बसपा इन आम चुनावों में विधानसभा की कामयाबी को दोहराती दिखाई नहीं दे रही। ठीक इसी तरह मुस्लिम वोट के छिटकने की खबरों के बीच समाजवादी पार्टी भी पिछले आम चुनाव के ३९ सीटों के आंकड़े से बहुत दूर दिखाई दे रही है।

राजनीतिक रिपोर्ट के मुताबिक देश के इस सबसे बड़े राज्य में भाजपा और कांग्रेस को ज्यादा जनसमर्थन हासिल हो रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जनसमर्थन या वोट ज्यादा सीटों में भी तब्दील हो पाएगा। पश्चिम बंगाल में महिलाओं की स्थिति उत्तरप्रदेश की तुलना में थोड़ी-सी बेहतर है, लेकिन इतनी नहीं कि सत्ता में मौजूद लेफ्ट फ्रंट के दावों पर खरी उतर सके।

इसके बावजूद लेफ्ट फ्रंट को पुरुषों की तुलना में महिलाओं का ज्यादा समर्थन मिलता रहा है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में महिलाओं और पुरुषों के बीच यह फासला खत्म हो गया। इस बार लेफ्ट जब अपनी सबसे बड़ी चुनौती से रूबरू है, उसे महिलाओं के वोट की खासी दरकार रहेगी।

इस दौर में कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में वोट डाले जाएंगे। यहां लड़ाई सीधे-सीधे तृणमूल और माकपा के बीच है। तृणमूल और कांग्रेस के गठबंधन के पास १६ लोकसभा सीटों के आंकड़े को पार करने का मौका है। पिछले ३३ साल में कभी कोई गठबंधन इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाया है।

महिलाओं के वोट की अहमियत सिर्फ इन महिला नेताओं के राज्य तक ही नहीं सिमटी है। नेशनल इलेक्शन स्टडी के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं का वोट पूरे देश में अहम है। तथ्यों के मुताबिक पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का वोट देने का नजरिया भी अलग है।

आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश महिलाएं अपनी मर्जी से वोट डालती हैं। यहां यह पहलू भी खुलकर सामने आया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं का वोट अलग है। राष्ट्रीय स्तर पर महिलाएं कांग्रेस की ओर झुकी दिखाई देती हैं, लेकिन राज्यों की ओर मुड़ते ही यह तस्वीर बदल जाती है।

पश्चिम बंगाल में महिलाएं लेफ्ट पार्टियों को ज्यादा पसंद करती हैं। आंध्र में यही बात तेलुगुदेशम और तमिलनाडु में जयललिता की अन्नाद्रमुक के लिए कही जा सकती है।

महिलाओं की यह सोच बताती है कि महिला राजनेता की मौजूदगी इनके लिए बहुत मायने नहीं रखती। इससे ज्यादा महिलाएं उन मुद्दों के आधार पर वोट डालती हैं जो उन्हें सीधे प्रभावित करते हैं। आंध्रप्रदेश में एन.टी. रामाराव, हरियाणा में बंसीलाल ने नशाबंदी को मुद्दा बनाकर महिलाओं के वोट तक पहुंचने में बड़ी कामयाबी पाई थी।

ठीक इसी तरह राजस्थान में सरकार की आबकारी नीति के चलते पिछली बार वसुंधरा को महिलाओं के वोट में बड़ा घाटा झेलना पड़ा। साफ है कि जो राजनीतिक पार्टी जितनी संजीदगी से महिलाओं के मुद्दों पर हाथ रखने में कामयाब होगी, उतनी ही मजबूती से वह उनके वोटों तक भी पहुंच सकती है।

ऐसे में एक आम चुनाव में जहां सिर्फ एक फीसदी वोट के खिसकते ही १५-२क् सीटें बदल जाती हों, पूरे राजनीतिक समीकरण उलट जाते हों, वहां आप महिलाओं के वोट की अहमियत को समझ सकते हैं, इसीलिए अगर १६ तारीख को चुनावी नतीजों की बहस के बीच आपको महिलाओं के वोट की गूंज सुनाई न दे तो इसका यह मतलब नहीं निकलना चाहिए कि यह कोई मायने नहीं रखता।

इसका सिर्फ इतना मतलब है कि यह अदृश्य रहता है। लोकतंत्र के बेताल को अपने सवाल का जवाब मिल गया था। विक्रमादित्य के कंधों से उतर वह अब चुनावी नतीजों के इंतजार में है।

-लेखक जाने-माने चुनाव विश्लेषक हैं।



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