इस बार वोट डालने गांव पहुंचा तो फिजा कुछ बदली हुई थी। सभी पार्टियों के एजेंट एकमत थे - इस बार तो सभी ‘हरिजन भाई’ बीएसपी को वोट डालेंगे। दक्षिण हरियाणा के हमारे इलाके में बीएसपी का ज्यादा जोर नहीं रहा है, इसलिए मैंने बीएसपी के कैंप में जाकर पूछताछ की।
दलित समाज के बुद्धिजीवी राम अवतार भाई साब ने समझाया, ‘हम कैंडिडेट को वोट नहीं दे रहे, पार्टी को वोट दे रहे हैं।’ फिर वह रुककर बोले, ‘पहली बार हम अपने लिए वोट डाल रहे हैं।’ मेरे लिए यह लोकतंत्र की महिमा और गरिमा से साक्षात्कार का क्षण था। वहीं एक सवाल मन में कौंधा - क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का सपना अब हकीकत बन गया है?
इन आम चुनावों में यह सवाल बहुत पीछे छूट गया दिखता है। अगर बीते एक महीने में देश के मीडिया और राजनीतिक फलक पर इस सवाल ने उभार नहीं लिया है, तो इसे एक अच्छा संकेत माना जा सकता है। महम, बांका और सीवान जैसे बदनाम चुनावों के किस्से आज इतिहास की बात लगते हैं।
बिहार से छन-छनकर आती बूथ कैप्चरिंग की तस्वीरों के लिए कैमरे तरस गए हैं। इस चुप्पी में हम यह अहसास करते हैं कि इस बार कुल मिलाकर साफ-सुथरे चुनाव हुए हैं।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव अंग्रेजी के मुहावरे ‘फ्री एंड फेयर’ का अनुवाद है। इस अनुवाद की प्रक्रिया में इन शब्दों का दायरा सिकुड़ गया है। दरअसल एक स्वतंत्र चुनाव का मतलब बिना किसी जोर-जबरदस्ती के अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल करना भर नहीं है। इसके गहरे अर्थ में जाने के लिए हमें स्वतंत्रता को स्वराज से जोड़ना होगा।
उधर निष्पक्ष चुनाव का मतलब सिर्फ इतना भर नहीं है कि चुनाव अधिकारी पक्षपात न करें। सही मायने में निष्पक्ष चुनाव का मतलब है कि हर उम्मीदवार, हर दल और हर एक वोटर एक ही धरातल पर खड़ा हो। बराबरी की लड़ाई लड़ सके।
अगर वोटर की आजादी का मतलब महज बलप्रयोग या जोर-जबरदस्ती की अनुपस्थिति से है तो हम दावा कर सकते हैं कि भारतीय वोटर स्वंतत्र होकर वोट डालता है। यहां भी कुछ अपवाद जरूर हैं। दार्जिलिंग समेत पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों और बाहरी मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में जोर-जबरदस्ती से वोट डलवाने के आरोप लगे हैं।
सलवा जुड़ूम के इलाकों में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच पिस रहे एक आम आदमी को कैसी आजादी होगी ? फिर भी यह तसल्ली कम मायने नहीं रखती कि बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और आंध्र के रायलसीमा के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर से ऐसी कोई खबर नहीं आई है।
इसके लिए चुनाव आयोग और उसके लिए काम कर रहा समूचा तंत्र काबिले-तारीफ है। यह बेहद सूझ-बूझ के साथ तैयार किए गए अलग-अलग दौर के कार्यक्रमों और सुरक्षाबलों की तैनाती का नतीजा है।
लेकिन स्वतंत्र चुनाव की इस संकुचित परिभाषा को यहीं से विस्तार देने की जरूरत है। दरअसल अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर रहे आम आदमी के लिए किसी भी किस्म का भय कोसों दूर होना चाहिए। यहां हम वोट की आजादी के सामने मुंह बाए खड़े खतरों से रूबरू होते हैं।
आज भी देश के अनेक इलाकों में अपने आका के खौफ में रहने वाला भूमिहीन दलित उसी की मर्जी के मुताबिक अपना वोट डालता है। गुजरात में मुसलमान, उड़ीसा में ईसाई और मिजोरम में चकमा आदिवासी भी एक अनजान भय के बीच पोलिंग बूथ तक पहुंचते हैं। इसी तरह कश्मीर में सुरक्षा बलों के दमन, बिहार में जातीय हिंसा और पश्चिम बंगाल में हर जगह पार्टी कैडर की मौजूदगी के बीच वोटर की आजादी दांव पर होती है।
ठीक इसी तरह अगर निष्पक्ष चुनाव का मतलब बूथ कैप्चरिंग और फर्जी मतदान का न होना है तो हम एक बदनाम विरासत को बहुत पीछे छोड़ आए हैं। चुनाव हारने वाले उम्मीदवार और नेता चुनावी नतीजे को जनादेश मान अपनी हार स्वीकार कर लेते हंै। अपने पड़ोसी मुल्कों में देखें तो यह कोई छोटी बात नहीं है।
हमारी मतदाता सूचियों में आज भी गड़बड़ है, लेकिन किसी दल विशेष के समर्थकों को जान-बूझकर सूची से बाहर करने की शिकायत कभी-कभार ही आती है। नए परिसीमन की तमाम कमियों के बावजूद किसी भी दल ने इसकी निष्पक्षता पर कोई सवाल खड़ा नहीं किया। देश में हमारे देखते-देखते फर्जी मतदान में कमी आई है। ईवीएम ने मतगणना में धोखाधड़ी की आशंकाओं को खारिज कर दिया है।
इसके लिए चुनाव आयोग को भी कुछ श्रेय देना चाहिए। चुनाव आयोग देश के उन गिने-चुने स्तंभों में से एक है, जिसने बीते दो दशक के बीच भरपूर ताकत, साख और सम्मान हासिल किया है। बेशक इस बार पूर्व और मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्तों के टकराव के बीच चुनाव आयोग की छवि पर चोट पहुंची।
सरकार अगर कोशिश करती तो विपक्ष के नेता के साथ बातचीत से नए आयुक्त को नियुक्त करने के साथ ही स्थिति को संभाल सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बावजूद चुनाव आयोग एक अंपायर वाली भूमिका बरकरार रख पाया है। मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी ‘पंच परमेश्वर’ के पात्र अलगू चौधरी की तरह चुनाव आयुक्त भी गद्दी पर बैठने के बाद आंख की शर्म से बंध जाते हैं।
सही मायने में निष्पक्ष चुनाव का मतलब सभी उम्मीदवारों, दलों और वोटरों के लिए एक समतल जमीं मुहैया कराना है, लेकिन इस दिशा में अभी हमें लम्बा रास्ता तय करना है। फिलहाल चुनाव आयोग छोटे चोर को पकड़ने में तत्पर है, लेकिन डकैत के सामने असहाय नजर आता है।
चुनावी पर्यवेक्षक उम्मीदवार से रोजाना के प्रचार के खर्च का हिसाब-किताब मांगते हैं। हर एक बैनर और पोस्टर लगने से पहले हर घर से लिखित में अनुमति लेनी जरूरी है। चुनावी बैठक सही समय से पांच-दस मिनट आगे-पीछे होने पर चुनाव आयोग का डंडा चलता है।
प्रचार के लिए प्रयोग में आ रहे प्रत्येक वाहन के लिए पहले से लिखित अनुमति जरूरी है। राजनेताओं की छवि ऐसी हो गई है कि उन पर डंडा चलाना ही बहुतों को सुकून देता है। लेकिन कारण-अकारण मीन-मेख निकालने के इस अंदाज से लोकतंत्र की जड़ें गहरी कैसे होंगी?
उधर प्रचार पर लगी बंदिशों के बीच उम्मीदवारों और दलों ने खर्च के दूसरे रास्ते खोज लिए हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में बेशुमार पैसा खर्च हुआ। सबसे गरीब कहे जाने वाले उड़ीसा के विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों द्वारा करोड़ों रुपए खर्च करने की खबरें हैं।
इसी का नतीजा है कि ज्यादातर पार्टियां आज धनी और संपन्न उम्मीदवारों को तलाशती हैं। उम्मीदवारों द्वारा दाखिल किए गए हलफनामों की छान-बीन करने वाली नेशनल इलेक्शन वॉच के मुताबिक पिछली बार ९ फीसदी करोड़पति उम्मीदवार थे।
इस बार यह आंकड़ा १४ फीसदी तक चला गया है। इसमें भी राष्ट्रीय दल सबसे आगे हैं। कांग्रेस के ६क् फीसदी, बीजेपी के ४क् फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं। सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियां ही इस बीमारी से मुक्त कही जा सकती हैं।
सार्वजनिक प्रचार पर लगाई बंदिशों के चलते मीडिया में प्रचार पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। चुनाव आयोग ने बिना किसी राष्ट्रीय बहस के टेलीविजन पर राजनीतिक प्रचार की छूट दी है। बाकी दुनिया में इस प्रयोग ने लोकतंत्र को धनतंत्र में तब्दील कर दिया है। अपने ही किसी दूसरे संगठन के नाम पर उम्मीदवार और दल विज्ञापन जारी करते हैं।
यह बिना किसी छानबीन के टेलीविजन के परदे पर पहुंच जाता है। इस बार पार्टियों और उम्मीदवारों के विज्ञापन खबरों की शक्ल में खबरों के पन्नों पर जगह ले रहे हैं। अगर कोई पार्टी या उम्मीदवार अखबारों के विज्ञापन का पैकेज नहीं खरीदता तो उसके चुनाव प्रचार की खबरों को पूरी तरह गुल कर दिया जाता है।
छोटे-छोटे नियम, कानून की खाल उधेड़ने की जगह अगर चुनाव आयोग मीडिया की इस डकैती की छानबीन करता तो निष्पक्ष चुनाव में ज्यादा मदद मिलती।
गांव से वापस आते वक्त मैं बीएसपी उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि देख रहा था। उनमें भी ३क् फीसदी करोड़पति हैं। कहा जा रहा है कि बीएसपी के कई उम्मीदवारों ने भी ३क् से ४क् करोड़ रुपए खर्च कर डाले हैं। वहां भी थैलीशाहों का प्रभुत्व होता जा रहा है। अगली बार जब गांव जाऊंगा तो राम अवतार भाई साब से इसके बारे में जरूर पूछूंगा।
-लेखक जाने-माने चुनाव विश्लेषक हैं।