बेचैन नेताओं का राजनीतिक माइग्रेन
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बेचैन नेताओं का राजनीतिक माइग्रेन

mjअच्छे भारतीय शादियों के लिए हमेशा समय निकाल ही लेते हैं, लेकिन अंतिम संस्कार की प्रक्रिया काफी जल्दी में पूरी की जाती है। मतदान की पूरी प्रक्रिया छह सप्ताह तक चलने वाली है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से निकलने वाले नतीजे हमें छह घंटे के भीतर ही हासिल हो जाएंगे। हम लंबे अर्से से जिसका इंतजार कर रहे थे, वह इंतजार शनिवार को समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही तनाव के एक दौर की समाप्ति हो जाएगी, लेकिन नए सिरदर्द की शुरुआत भी हो जाएगी। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि पत्थरों के कारीगर को भारतीय राजनेताओं के सिर बनाने चाहिए थे। सिरदर्द को रोकने के लिए इसके अलावा और कोई चारा नजर नहीं आता।

ऐसे में एक सवाल यह जरूर पूछा जा सकता है कि आखिर मैं पंद्रहवें लोकसभा चुनाव की अंतिम क्रिया की अभी से बात क्यों कर रहा हूं जबकि अभी भी एक चरण का मतदान बाकी है। इस पांचवें चरण में 86 सीटें दांव पर लगी हैं, जो चतुर्थ चरण की 85 सीटों से भी एक ज्यादा हैं। लेकिन मेरा तर्क यह है कि यदि चुनाव नतीजों के बारे में कोई संदेह नहीं है तो फिर चुनाव कमोबेश खत्म ही तो माने जाएंगे। मेरा मानना है कि द्रमुक उम्मीदवारों के बेहद निकटवर्ती रिश्तेदारों और कट्टर कार्यकर्ताओं को छोड़कर तमिलनाडु मंे कोई भी यह मानने को तैयार नहीं होगा कि इस बार द्रमुक खेमा जीतने की स्थिति में है।

राज्य में द्रमुक के प्रमुख साझेदार कांग्रेस के माथे पर भी चिंता की रेखाएं साफ देखी जा सकती हैं जिसे मालूम है कि उसे वहां बड़ा नुकसान होने जा रहा है। गृह मंत्री पी चिदंबरम के चेहरे पर हताशा के चिह्न् नजर आ रहे हैं। उनके लिए गहन निराशा की बात इसलिए भी है क्योंकि दिल्ली में जहां कांग्रेस सरकार बनाती नजर आ रही है, लेकिन उस सरकार में चिदंबरम शामिल नहीं होंगे। कांग्रेस की दुविधा को राहुल गांधी के उस परोक्ष संदेश में पढ़ा जा सकता है जो उन्होंने जयललिता को भेजा है। यह संदेश भले ही 16 मई के बाद तालमेल के सुर मिलाने में काम आए, लेकिन मतदान से पहले तो यह उन 14 कांग्रेसी उम्मीदवारों के लिए कर्कश संगीत जैसा ही है जो संसद में पहुंचने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

जहां तक पंजाब का सवाल है, वहां अकाली दल की स्थिति अच्छी नहीं है। अकाली नेता दबाव में हैं। अपने कंप्यूटरों पर चुनावी आंकड़ांे के साथ माथापच्ची करने वाले इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि अकालियों को नुकसान होने वाला है और उनके पक्ष में मिले-जुले नतीजे आ सकते हैं। लेकिन जिस एक राज्य में चुनावी परिदृश्य अब भी जीवंत बना हुआ है, वह है पश्चिम बंगाल जहां तय नहीं हो पा रहा है कि चुनावी ऊंट किस तरफ बैठेगा? दाएं बैठेगा या बाएं। मतदान को लेकर ऐसा सिद्धांत प्रचलित है कि यदि बहुत ज्यादा मतदान हुआ तो इसका मतलब है कि मतदाताओं में सत्ता पक्ष के प्रति गुस्सा है और वह उसी गुस्से को अभिव्यक्त करने के लिए मतदान केंद्रों पर पहुंचा है। लेकिन ऐसे सिद्धांत पश्चिम बंगाल में काम नहीं आते जहां पार्टी कैडर को एक साथ जुटाया जा सकता है। वामदलों को अच्छी तरह से मालूम है कि वर्ष 1984 के बाद से यह उनके लिए कठिनतम चुनाव है और इसलिए वह बूथ प्रबंधन की अधिकतम कोशिश करेंगे। वाम दल कोशिश करेंगे कि पांचवें और अंतिम चरण के मतदान में अपने अधिक से अधिक समर्थकों से वोट डलवाए जाएं।

मतदान के पैटर्न से दो उल्लेखनीय पहलू उभरते हैं। पहला, इस बार हिंसा बहुत कम हुई है जिससे मतदाता को वोट देने में कोई डर महसूस नहीं हुआ। इसका श्रेय मतदाताओं और चुनाव आयोग दोनों को जाता है। दूसरा, इस बार महिला मतदाता बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकली हैं। ऐसा कभी-कभार ही होता है। महिलाएं हल्ला-गुल्ला किए बगैर शांति के साथ मतदान करती हैं। वामदलों को मुस्लिम मतों के ट्रेंड में बदलाव से चिंता हो रही है और वे महिलाओं को स्वतंत्र मतदाता के रूप में नहीं समझकर गलत आकलन कर सकते हैं। दूसरे चरण में राज्य में 75 फीसदी मतदान हुआ है जो एक रिकॉर्ड होना चाहिए।

समय को लेकर अच्छी चीज यह है कि यह गुजरता जाता है। लोकतंत्र के कर्णधारों के लिए व्याकुल होने का वक्त आने ही वाला है। इसमें केवल एक सप्ताह का ही समय शेष है। अगले चरण के समीकरण बनने शुरू हो गए हैं। जरूरी नहीं है कि केंद्र में यूपीए या एनडीए को ही चुनने की अनिवार्यता हो। वामदलों की कोशिश तो यही होगी कि पश्चिम बंगाल मंे अगले विधानसभा चुनाव से पहले येन-केन-प्रकारेण कांग्रेस और ममता बनर्जी के बीच गठबंधन को समाप्त करवाया जाए। इसका सबसे अच्छा रास्ता तो यही होगा कि केंद्र में कांग्रेस को समर्थन दिया जाए। इससे ममता बनर्जी एनडीए की ओर जाने को विवश होंगी। लेकिन तब क्या होगा यदि कांग्रेस ममता के साथ अपने गठबंधन पर बने रहने का फैसला करती है और वामदलों को एनडीए का समर्थन करने की चुनौती देती है? इससे पूरे खेल में कुछ मजेदार पहलू उभरकर सामने आएंगे।

एक सवाल यह भी है कि यदि नवीन पटनायक उड़ीसा में सरकार बनाने लायक सीटें नहीं ला पाते हैं तो क्या वे अपने नए मित्र प्रकाश करात के साथ बने रहेंगे? वे कांग्रेस को समर्थन देने का कह सकते हैं, लेकिन इससे उनकी वह पहचान खत्म होने का खतरा पैदा हो जाएगा जो उन्होंने कांग्रेस की कीमत पर बनाई है। चंद्रबाबू नायडु आंध्रप्रदेश को तबाह करने का कांग्रेस पर आरोप लगाते हैं तो क्या वे देश को तबाह करने में मदद करने के लिए केंद्र में कांग्रेस को समर्थन देंगे? निश्चित रूप से तीसरा मोर्चा यही चाहेगा कि कांग्रेस उन्हें सरकार बनाने के लिए समर्थन दे। लेकिन क्या कांग्रेस ऐसे मंत्रिमंडल का समर्थन करेगी जो उसकी आर्थिक और विदेश नीतियों को बदलने को उद्धत हो? इस विचार में कुछ दम हो सकता है कि कांग्रेस और भाजपा ने फैसला कर लिया है कि वे केंद्र में किसी भी कामचलाऊ सरकार का समर्थन नहीं करेंगे। मई का उत्तरार्ध सिरदर्द की समस्या को माइग्रेन में बदल सकता है। लेखक पाक्षिक पत्रिका ‘कोवर्ट’ के चेयरमैन हैं।



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